भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 104, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ५१ ❖ आमाशयमाह चरकः- 'नाभिस्तनान्तरे जन्तोराहुरामाशयं बुधाः' ।। ३१ ।। आमाशय का स्थान—'प्राणियों के नाभि और स्तन के मध्य में आमाशय रहता है ॥ ३१॥ ❖ अत्र विशेषमाह- 'नाभेर्वितस्तिमात्रं च कण्ठदेशात् षडङ्गुलम् । उरसस्तद्विजानीयात् शेषे तु हृदयं मतम् ।। ३२ ।। उरो रक्ताशयस्तस्मादधः श्लेष्माशयः स्मृतः । आमाशयस्तु तदधस्तदधो दहनाशयः' ।। ३३ ।। इति 'नाभि से एक बालिश्त (बीता) ऊपर से लेकर और कण्ठस्थल से छः अङ्गुल नीचे तक उरःस्थल (छाती) और उसके नीचे का भाग हृदय कहलाता है । उरःस्थल में रक्ताशय रहता है, उसके नीचे श्लेष्माशय, उसके नीचे आमाशय और उसके नीचे अग्न्याशय का भाग समझना चाहिये ॥३२-३३॥ प्राणानिलेरित इति । हृदयाधिष्ठानेन प्राणनाम्ना वायुना मुखं गतेनान्तः प्रवेशितः । तथा च सुश्रुतः- यो वायुः प्राणनामाऽसौ मुखं गच्छति देहधृक् । सोऽन्नं प्रवेशयत्यन्तः प्राणांश्चाप्यवलम्बते ।। ३४ ।। 'प्राणानिलेरितः' का भाव यह है कि—हृदय में रहने वाला प्राणनामक वायु मुख तक जाकर वहाँ पर स्थित अन्न- ग्रास को आमाशय में प्रवेश करता है । इसी विषय में सुश्रुत भी कहते हैं कि—देह को धारण करनेवाला प्राणनामक वायु जो मुख की ओर जाता रहता है वह अन्न को उदर में प्रवेश करता है और प्राणियों का अवलम्बन करता रहता है अर्थात् रक्षा किया करता है ॥३४॥ ❖ क्लेदननामा कफः क्लेदयति क्लेदनात्संहतं भिनत्ति च । उक्तं च सुश्रुते- क्लेदनः क्लेदयत्यन्नं संहतं च भिनत्त्यतः' इति ।। ३५ ।। प्राण वायु द्वारा आमाशय में पहुँचाये गये उसी अन्न को क्लेदन नामक कफ क्लिन्न (गीला) करता है और क्लिन्न करने से इकट्ठे हुए अन्न को अलग-अलग करता है । यही विषय सुश्रुत में भी कहा है कि—'क्लेदन कफ अन्न को क्लिन्न करता है और इसी से संहत (इकट्ठे हुए) अन्न को भिन्न भिन्न कर देता है ॥३५॥ ❖ स आहारः षड्सोऽप्यामाशये माधुर्य लभते, आमाशयस्थस्य मधुरस्य कफस्य योगात् । वह आहार पहले चाहे मीठा खट्टा आदि ६ रसों से किसी भी रस से युक्त क्यों न हो किन्तु आमाशय में पहुँचने पर आमाशय में स्थित मधुर रस से युक्त कफ के साथ योग हो जाने में मीठी ही हो जाता है । ❖ उक्तञ्च श्लेष्मस्वरूपम्- श्लेष्मा श्वेतो गुरुः स्निग्धः पिच्छिलः शीतलस्तथा । तमोगुणाधिक स्वादुर्विदग्धो लवणो भवेत् ।। फेनभावञ्च लभते जठरानलतेजसा। इति ।। ३६ ।। कफ का स्वरूप—कफ श्वेत, गुरु (वजनदार), स्निग्ध (चिकना), पिच्छिल (फिसलने वाला), शीतल, अधिक तमोगुण वाला, स्वादु (मधुर) और विदग्ध होने से लवण (नमकीन) होता है और जठराग्नि के तेज से आमाशय में स्थित माधुर्य को प्राप्त हुआ वह फेन युक्त हो जाता है ॥३६॥