भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 105, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ें५२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे यत आह वाग्भटः- ‘सन्युक्षितः समानेन पचत्यामाशयस्थितम्। औदर्योऽग्निर्यथाबाह्यः स्थालीस्थं तोयतण्डुलम्' इति ।। ३७।। वाग्भट ने भी कहा है कि—बाहर (रसोई की अग्नि जैसे बटुलोई में रखे हुये जल से युक्त चावल को पकाता है उसी भाँति उदर की अग्नि (जठराग्नि) भी समान वायु से फूँक पाने पर तेज हो कर आमाशय में स्थित अन्न को पकाता है ।।३७।। ❖ अथ स एवाहारः प्राणवायुना प्रेरितस्ततः किञ्चित् स्खलितः पाचकाख्यपित्तोष्मणेषद्विपक्वोडम्लरसो भवति। इसके बाद वही आहार प्राणवायु से प्रेरित होकर वहाँ से (आमाशय से) कुछ खसक कर पाचक नामक पित्त की ऊष्मा (गर्मी) से कुछ पक जाने पर खट्टा हो जाता है ।। ❖ उक्तं च—अथ पाचकपित्तेन विदग्धं चाम्लतां व्रजेत् ।। ३८ ।। कहा भी है कि—माधुर्य को प्राप्त करके प्राण वायु से प्रेरित होने के बाद, पाचक पित्त से आहार विदग्ध (कुछ पक्का कुछ कच्चा) हो कर खट्टा हो जाता है ।। ३८ ।। ❖ पाचकपित्तेन पाचकपित्तस्योष्मणा ।। ३८ ।। ‘पाचकपित्तेन' का अर्थ है पाचक पित्त की गर्मी से ।। ३८।। ❖ ततः स एवाहारो नाभिमण्डलाधिष्ठानेन समाननाम्ना वायुना प्रेरितो ग्रहणीमभि नीयते ।। १६६ ।। उसके बाद वही आहार नाभिमण्डल में रहनेवाले समान वायु से प्रेरित होकर ग्रहणों की ओर जाता है ।। १६६ ।। ग्रहणीलक्षणमाह- ❖ षष्ठी पित्तधरा नाम या कला परिकीर्त्तिता । आमपक्वाशयान्तःस्था ग्रहणी साऽभिधीयते ।। १६७ ।। ग्रहणी का लक्षण—आमाशय और पक्वाशय के मध्य में स्थित, पित्तधरा नाम की जो छठी कला मुनियों ने कही है, वह ग्रहणी कहलाती है ।। १६७ ।। ❖ पित्तधरा=पाचकाख्यं पित्तं यदग्न्यधिष्ठानं तद्धारयति ।। १६७ ।। ‘पित्तधरा' का अर्थ है अग्नि का अधिष्ठान (वासस्थान), जो पाचक नामक पित्त है उस को धारण करने वाली है ।। १६७।। तत्र ग्रहण्यामामाशयपक्वाशयमध्यवर्त्तिपाचकाख्यपित्ताधिष्ठानेनाग्निनाऽऽहारः पच्यते स कटुश्च भवतीत्याह¹- ‘ग्रहण्यां पच्यते कोष्ठे वह्निना जायते कटुः' इति ।। १६८ ।। 'ग्रहणी में कोष्ठस्थित अग्नि से आहार पकता है तथा कटु हो जाता है' ।। १६८।। ❖ अयमर्थः । आहारो ग्रहण्यां कोष्ठवह्निना ग्रहणीस्थितपाचकपित्तेन वह्निना पच्यते पच्यमानः स ग्रहणीस्थितस्य कटुरसस्य योगात् कटुर्भवति ।। १६८ ।। तात्पर्य यह है कि—आहार ग्रहणी में जाने पर कोष्ठस्थित अग्नि से पचता है और पचता हुआ वह आहार ग्रहणी में स्थित कटुरस युक्त पित्त के संयोग से कटु हो जाता है ।। १६८।। १. 'भवति तथाचे'ति पाठान्तरम्।