भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे जो शेष भाग होता है वह पुरीष (विष्ठा) कहलाता है और वही पुरीष समान वायु के द्वारा पहुँचाये जाने पर मलाशय में जाकर ठहरता है ॥१७२-१७३॥ तत्र १मलाशयस्थेनापानवायुना प्रेरितं मूत्रं मेढ्रभगमार्गेण पुरीषं गुदमार्गेण शरीराद् बहिर्याति । उक्तञ्च- मूत्रञ्चोपस्थमार्गेण पुरीषं गुदमार्गतः । अपानवायुना क्षिप्तं बहिर्याति शरीरतः ॥१७४॥ मूत्र और पुरीषोत्सर्ग में कारण- 'अपान वायु से प्रेरित होने पर उपस्थमार्ग से मूत्र और गुदा मार्ग से पुरीष शरीर के बाहर निकलता है ॥१७४॥ ❖ उपस्थः = शिश्नो भगञ्च ॥१७४॥ 'उपस्थ' का अर्थ 'लिङ्ग और योनि' समझना चाहिये ॥१७४॥ रसस्तु समानवायुना प्रेरितो धमनीमार्गेण शरीरारम्भकस्य रसस्य स्थानं हृदयं गत्वा तेन सह मिश्रितोभवति । उक्तञ्च- रसस्तु हृदयं याति समानमरुतेरितः । स तु व्यानेन विक्षिप्तः सर्वान् धातून् विवर्द्धयेत् ॥१७५॥ केदारेषु यथा कुल्याः पुष्णन्ति विविधौषधीः । तथा कलेवरे धातून् सर्वान् वर्द्धयते रस ॥१७६॥ आहार रस का कार्य-समान वायु से प्रेरित होकर रस हृदय में जाता है और वहाँ से व्यान वायु के द्वारा फेके जाने पर रस सम्पूर्ण धातुओं को बढ़ाता है। जिस प्रकार खेतों में स्थित अनेक प्रकार के धान्यादि ओषधियों को कुल्या (नहरें) पुष्ट किया करती हैं, उसी भाँति रस भी शरीर में सब धातुओं को बढ़ाता रहता है ॥१७५-१७६॥ रसस्तु तत्र तत्र त्रिधा विभज्यते । उक्तञ्च चरके- स्थूलःसूक्ष्मस्तन्मलश्च तत्र तत्र त्रिधारसः । स्वं स्थूलोऽशः परं सूक्ष्मस्तन्मलो याति तन्मलम् ।। आहार से उत्पन्न हुआ रस क्रम से शरीरारम्भ रसरक्तादि प्रत्येक धातुओं में जाकर प्रत्येक धातुओं के स्थानों में स्थूल, सूक्ष्म और तन्मल (रस का मल) इस प्रकार से तीन अंशों में विभक्त हो जाता है और इनमें से स्थूलांश अपने स्थान में रहता है, सूक्ष्मांश दूसरे धातु में जाता है तथा रस का मलांश धातुओं के मल में जाता है ॥१७७॥ ❖ अयमर्थः । स्थूलोऽशः स्वं याति यथास्थितस्तिष्ठति, सूक्ष्मस्त्वंशः परं द्वितीयं धातुं याति, तन्मलो=रसादिमलः, तन्मलं=शरीरारम्भकं तत्तद्धातुमलं यातीत्यर्थः ॥१७७॥ स्पष्टार्थ यह है कि रस का स्थूल भाग अपने स्थान में रहता है अर्थात् रस जिस धातु में जाता है स्थूल भाग उसी धातु में रह जाता है और सूक्ष्म भाग दूसरे रक्तादि धातुओं में जाता है और उसका मल भाग अर्थात् रसादिकों का मल भाग उसके मल को अर्थात् शरीराम्भक तत्तद्घातुओं के मल को जाता है ॥१७७॥ यथा लौकिकाग्निनेक्षुरसः पच्यते तथा शरीरारम्भकस्य रसस्याग्निनाऽऽहाररसः पच्यते । पच्यमानः स पञ्चाहोरात्रात् सार्द्धदण्डमेकञ्च यावत् प्राक्तनरसधातावेव तिष्ठति । उक्तं च सुश्रुते-'स खलु रसस्त्रीणि त्रीणि कलासहस्राणि पञ्चदश कला एकैकस्मिन् धातावुपतिष्ठते' । अत्र कलानां विंशतिर्मुहूर्तः, स च दण्डद्वयात्मकः ('इत्यभिप्रेत्याह)-तथा च भोजः- धातौ रसादौ मज्जान्ते प्रत्येकं क्रमतो रसः । अहोरात्रात्स्वयं पञ्च सार्द्धदण्डं च तिष्ठति ॥१७८॥ जिस प्रकार लोक की अग्नि से ईख का रस पकता है उसी प्रकार शरीर के आरम्भक रस के अग्नि से आहार का १. 'मलाशयेने'ति पाठान्तरं प्रामादिकम्। २. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः ।