भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 1167 में से

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अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ५५ रस पकता है और पकता हुआ वह रस पाँच अहोरात्र (रातदिन) १॥ डेढ़ दण्ड तक प्रथम जो रस धातु अर्थात् शरीरारम्भक रस धातु है उसी में रहता है, इसी बात को सुश्रुत में भी कहा है कि-वही रस (आहार से उत्पन्न रस) एक-एक धातु में (शरीरारम्भक प्रत्येक रसादि धातु में) तीन हजार पन्द्रह (३०१५) कला परिमित काल तक रहता है । २० कला का एक मुहूर्त्त होता है तथा एक मुहूर्त्त दो दण्ड का होता है अतः उसमें अर्थात् ३०१५ कला में पाँच अहोरात्र डेढ़ दण्ड होता है । इन्हीं सब अभिप्रायों को लेकर भोज ने भी कहा है कि— 'शरीरारम्भक रस धातु से लेकर मज्जाधातु तक प्रत्येक धातु में क्रम क्रम से जाकर रस प्रत्येक धातु में पाँच अहोरात्र डेढ़ दण्ड तक रहता है ।।१७८।। ❖ प्रत्येकमेकैकस्मिन्नित्यर्थः ।।१७८।। 'प्रत्येकम्' का अर्थ 'एक-एक धातु में' समझना चाहिये ।।१७८।। ततो यथा पच्यमानादिक्षुरसान्मलो निर्गच्छति तथा पच्यमानादाहाररसान्मलो निर्गच्छति स कफः । उक्तं च सुश्रुते- कफः पित्तं मलः खेषु प्रस्वेदो नखरोम च । नेत्रविट् त्वक्षु च स्नेहो धातूनां क्रमशो मलाः ।।३९।। धातुओं के मल—'कफ, पित्त, कर्णादि स्रोतों का मल, पसीना, नख, लोम, नेत्रमल और त्वचाओं के स्नेह, ये क्रम से धातुओं के मल हैं' ।।३९।। खेषु मलः=कर्णादि स्रोतोमलः ।।३९।। 'खेषु मलः' का अर्थ 'कर्णादि स्रोतों का मल' समझना चाहिये ।।३९।। स च कफःप्राणानिलप्रेरितो धमनीमार्गेण शरीरारम्भकंकलेदनाख्यं कफं गत्वा पुष्णाति, ततः सारभूतस्याहाररसस्य द्वौ भागौ भवतःस्थूलः सूक्ष्मश्च तत्र स्थूलो¹ भागः शरीरारम्भकं रसं पोषयति सकलशरीराधिष्ठानेन व्यानवायुना प्रेरितो धमनीभिः सञ्चरन् पोषणस्नेहनजठरानलोष्मकृतसन्तापनिवारणादिभिर्गुणैः सकलशरीरं पुष्णाति । ततः सूक्ष्मो² भागः प्राणवायुना प्रेरितो धमनीमार्गेण शरीरारम्भकस्य रक्तस्य स्थानं यकृत्प्लीहरूपं गत्वा तेन सह मिलितो भवति । ततः प्राक्तनस्य रक्तस्याग्निना पुनः पच्यमानः पञ्चाहोरात्रात्सार्द्धदण्डञ्च यावत् प्राक्तनरक्तधातावेव तिष्ठति । ततो यथा अग्निना पुनः पुनः पच्यमानादिक्षुविकाराद्वारं वारं मलं निर्गच्छति तथा पुनः पुनः पच्यमानादाहाररसात् प्रतिबारं मलं निर्गच्छति । तत्र रक्ताग्निना पच्यमानामलं पित्तं निर्गच्छति । तच्च पित्तं समानवायुना प्रेरितं धमनीमार्गेण शरीरारम्भकं पाचकाख्यं पित्तं गत्वा पुष्णाति । वह कफ प्राण वायु से प्रेरित होकर धमनी मार्ग से शरीरारम्भक क्लेदन नामक कफ को जाकर पुष्ट करता है, उसके बाद सारभूत आहारजात रस के दो भाग होते हैं एक स्थूल और दूसरा सूक्ष्म, उसमें स्थूल भाग शरीरारम्भक रस को पुष्ट करता है तथा सम्पूर्ण शरीर में रहनेवाले व्यान नामक वायु से प्रेरित होकर धमनियों के द्वारा सञ्चार करता हुआ अर्थात् बह करके पोषण, स्नेहन तथा जठरानल की गर्मी से उत्पन्न हुये सन्ताप के निवारण आदि गुणों से सम्पूर्ण शरीर को पुष्ट करता है । उसके बाद सूक्ष्मभाग प्राणवायु से प्रेरित होकर धमनियों द्वारा शरीरारम्भक (शरीर को बनाने वाले) रक्त के स्थान पर अर्थात् यकृत् और प्लीहारूप रक्त के स्थान पर जाकर रक्त के साथ मिल जाता है । उसके बाद प्राचीन रक्त के अग्नि से पुनः पकता हुआ पाँच अहोरात्र (दिन-रात) और डेढ़ दण्ड तक उसी प्राचीन रक्तसंज्ञक धातु में स्थित रहता है । उसके बाद जैसे लोक में अग्नि से पुनः-पुनःपकाये जाते हुये ईख के रस से बारबार मल निकलता है, वैसे ही पुनः पुनः पकाये जाते हुये आहार के रस से भी प्रति बार मल निकलता है । उसमें रक्त की अग्नि से पकाये जाते हुये आहार १. 'सूक्ष्म' इति पाठान्तरं प्रामादिकम् । २. 'स्थूल' इति पाठान्तरं प्रामादिकम् ।

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