भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे रस से जो मल निकलता है वह पित्त कहलाता और वह पित्त समान नामक वायु से प्रेरित होकर धमनी-मार्ग से जाकर शरीराम्भक पाचक नामक पित्त को पुष्ट करता है । ततः सारभूतस्याहाररसस्य द्वौ भागौ भवतः स्थूलः सूक्ष्मश्च, स्थूलो१ भागोरञ्जकाख्येन२ पित्तेन३ रक्तीकृतः शरीरारम्भकं रक्तं (पोषयन्४) व्यानवायुना प्रेरितो धमनीभिः सञ्चरन् सकलशरीरगतानि रुधिराणि पुष्णाति । ततः सूक्ष्मो५ भागो व्यानवायुना प्रेरितो धमनीभिः शिराभिश्च शरीरारम्भकाणि मांसानि याति । ततो मांसाग्निना पुनः पच्यमानः पञ्चाहोरात्रात् सार्द्धदण्डञ्च यावन्मांसेष्वेव तिष्ठति । ततः पच्यमानात्तस्मान्मलं निर्गच्छति । तद्व्यानवायुना क्षिप्तं कर्णावागत्य कर्णविट् भवति । उसके बाद सारभूत उसी आहार-रस के दो भाग होते हैं, एक स्थूल और दूसरा सूक्ष्म, उसमें स्थूलभाग रञ्जकनामक पित्त के द्वारा रँगा जाने पर रक्तरूप होकर शरीरारम्भक रक्त को पुष्ट करता हुआ व्यान-वायु से प्रेरित होकर धमनियों के द्वारा संचार करता हुआ सम्पूर्ण शरीरस्थित रुधिर को पुष्ट करता है, उसके बाद सूक्ष्म भाग व्यान वायु से प्रेरित होकर धमनी और शिराओं के द्वारा शरीरारम्भक मांस में जाता है, उसके बाद मांस में स्थित अग्नि के द्वारा पुनः-पुनः पकाया जाता हुआ पाँच अहोरात्र और १॥ डेढ़ दण्ड तक मांस ही में स्थित रहता है, उसके बाद मांसाग्नि से पकाये जाते हुये उससे जो मल निकलता है, वह व्यान वायु से प्रेरित होने पर दोनों कानों में आकर कान का मैल होता है । ततः सारभूतस्य रसस्य द्वौ भागौ भवतः । स्थूलः सूक्ष्मश्च । ततः स्थूलो६ भागो मांसानि पुष्णाति । ततः सूक्ष्मो७ भागो व्यानवायुना प्रेरितो धमनीभिः शरीरारम्भकस्य भेदसः स्थानमुदरं याति ततो मेदसोऽग्निना पुनः पच्यमानः पञ्चाहोरात्रात् सार्द्धदण्डं च यावन्मेदस्येव तिष्ठति । ततः पच्यमानात् तस्मान्मलो निर्गच्छति प्रस्वेदरूपः । स चः शीतः स्रोतस्येव तिष्ठति शरीरोष्मणा तप्तश्चेत्तदा व्यानवायुना प्रेरितः शिरामार्गेर्लोमकूपेभ्यो बहिर्याति 'जिह्वादन्तक्षामेढ्रादिमलञ्च मेदोमलमि' त्येके । उसके बाद सारभूत उसी आहार-रसके दो भाग होते हैं, एक स्थूल और दूसरा सूक्ष्म, उसमें से स्थूल भाग मांस को पुष्ट करता है और सूक्ष्म भाग व्यान-वायु से प्रेरित होकर धमनियों के द्वारा शरीरारम्भक मेद के स्थान उदर में जाता है, उसके बाद मेद की अग्नि से फिर पकाया जाता हुआ वह पञ्च अहोरात्र और डेढ़ दण्ड तक उसी मेद में ठहरता है, उसके बाद मेद की अग्नि से पकाये जाते हुये उससे प्रस्वेद रूप (पसीना-रूपी) मल निकलता है और वह शीत (ठण्डा) रहने पर तो स्रोतों ही में रहता है और शरीर की गर्मी से तप्त होने पर पिघल जाने से व्यान वायु से प्रेरित होकर शिराओं के मार्ग से रोमकूपों (रोएँ के छिद्रों) से बाहर निकलता है 'जीभ, दाँत, काँख और मूत्रेन्द्रिय के मल को भी कोई २ मेद का मल कहते हैं' किन्तु यह सभी लोगों का मत नहीं है । ततः सारभूतरसस्य द्वौ भागौ भवतः स्थूलः सूक्ष्मश्च, तत्र स्थूलो८ भागो मेदः पुष्णाति, उदरे तिष्ठन् (९व्यानवायुना प्रेरितः स्रोतोमार्गैः सूक्ष्मास्थिस्थितान्यपि मेदांसि पुष्णाति । सूक्ष्मो भागो) व्यानवायुना प्रेरितो धमनीभिः शिराभिश्च शरीरारम्भकाण्यस्थीनि याति । ततोऽस्थ्यग्निना पुनः पच्यमानः पञ्चाहोरात्रात्सार्द्धदण्डञ्च यावदस्थिष्वेव तिष्ठति । ततः पच्यमानात् तस्मान्मलो निर्गच्छति । स च व्यानवायुना प्रेरितः १०शिरामार्गेर्गत्वाऽङ्गुलिषु नखास्तनौ लोमानि भवन्ति । १. 'सूक्ष्म' इति पाठान्तरं चिन्त्यम् । २. 'रञ्जकाग्निने'ति पाठान्तरम् । ३. 'पित्तेन स' इति पाठान्तरम् । ४. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः । ५. 'स्थूल' इति पाठान्तरं चिन्त्यम् । ६. 'सूक्ष्म' इति पाठान्तरमसङ्गतम् । ७. 'स्थूल' इति पाठान्तरं चिन्त्यम् । ८. 'सूक्ष्म' इति पाठान्तरं चिन्त्यम् । ९. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः । १०. 'शिराभिर्मार्गेणागत्यागत्ये'ति पाठान्तरम् ।