भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ५७ उसके बाद सारभूत रस के दो भाग होते हैं, एक स्थूल और दूसरा सूक्ष्म, उसमें से स्थूल भाग उदर में रहता हुआ मेद को पुष्ट करता है तथा वहाँ से व्यान वायु से प्रेरित होकर स्रोतों के मार्ग से जाकर सूक्ष्म (पतली) हड्डियों में भी स्थित मेद को पुष्ट करता है और सूक्ष्म भाग व्यानवायु से प्रेरित होकर धमनी और शिराओं के द्वारा शरीरारम्भक हड्डी को जाता है, उसके बाद हड्डी की अग्नि से पुनः पकाया जाता हुआ पाँच अहोरात्र और डेढ़ दण्ड तक हड्डियों ही में ठहरता है, उसके बाद पकाये जाते हुये उस सारभूत से जो मल निकलता है वही व्यान वायु से प्रेरित होकर शिराओं के मार्ग से आकर अङ्गुलियों में नख और शरीर में रोम हो जाता है। ततः सारभूतस्य रसस्य द्वौ भागौ भवतः स्थूलः सूक्ष्मश्च। तत्र स्थूलो¹ भागोऽस्थीनि पुष्णाति ततः सूक्ष्मो² भागो व्यानवायुना प्रेरितः स्रोतोमार्गैरमज्जस्थानानि स्थूलास्थ्यभ्यन्तराणि याति। ततो मज्जाग्निना पुनः पच्यमानः पञ्चाहोरात्रात् सार्द्धदण्डञ्च यावन्मज्जन्येत्र तिष्ठति, ततः पच्यमानात्तस्मान्मलं निर्गच्छति। तच्च व्यानवायुना प्रेरितं शिरामार्गैनयनयोरागत्य नेत्रविट् त्वक्षु स्नेहश्च भवति। उसके बाद सारभूत रस के दो भाग होते हैं, एक स्थूल और दूसरा सूक्ष्म उसमें से स्थूल भाग हड्डियों को पुष्ट करता है, उसके बाद भाग व्यानवायु से प्रेरित होकर स्रोतों के मार्ग से मज्जा के स्थान मोटी हड्डियों के भीतरी भाग को जाता है, उसके बाद मज्जा की अग्नि से फिर पकाया जाता हुआ पाँच अहोरात्र और डेढ़ दण्ड तक मज्जा ही में ठहरता है, उसके बाद पकाये जाते हुये उससे जो मल निकलता है, वह व्यानवायु से प्रेरित होकर शिराओं के मार्ग से आकर नेत्रों में नेत्र का मल (कीचड़) और त्वचाओं में स्नेह (चिकनाहट) हो जाता है। ततः सारभूतस्य रसस्य द्वौ भागौ भवतः स्थूलः सूक्ष्मश्च, तत्र स्थूलो भागो मज्जानं पुष्णाति ततः सूक्ष्मो व्यानवायुना प्रेरितो धमनीभिः शिराभिश्च शुक्रस्य स्थानं सकलं शरीरं गत्वा शरीरारम्भकेण शुक्रेण सह मिश्रितो भवति। ततः शुक्रस्याग्निना पुनः पच्यते पच्यमाने तस्मिन्मलं नास्ति। सहि सहस्रधाध्मातसुवर्णवत्। इत्युत्तरोपदिश्यते- उसके बाद सारभूत रस के दो भाग होते हैं, एक स्थूल और दूसरा सूक्ष्म, उसमें से स्थूल भाग मज्जा को पुष्ट करता है और सूक्ष्म भाग व्यानवायु से प्रेरित होकर धमनी और शिराओं के द्वारा शुक्र के स्थान सम्पूर्ण शरीर में जाकर शरीरारम्भक शुक्र के साथ मिल जाता है। उसके बाद शुक्र के अग्नि से पुनः पकाया जाता है और पकते हुये उसमें फिर मल नहीं रहता है, क्योंकि वह हजार बार के तपाये हुये सोने के समान निर्मल हो जाता है, इसी बात को आगे के श्लोकों में कहते हैं। स्वाग्निभिः पच्यमानेषु मज्जान्तेषु रसादिषु। षट्सु धातुषु जायन्ते मलानि मुनयो जगुः ।।१७९।। यथा सहस्रधा ध्माते न मलं किल काञ्चने। तथा रसे मुहुः पक्वे न मलं शुक्रताङ्गते ।।१८०।। ‘अपने-अपने अग्नियों से पकते हुये रस से लेकर मज्जा तक छः धातुओं में मल निकलता है’ ऐसा मुनियों ने कहा है। जिस प्रकार हजार बार तपाये हुए सुवर्ण में मल नहीं रहता, उसी प्रकार बारंबार परिपक्व होने से जब आहाररस शुक्रत्व को प्राप्त हो जाता है तब उसमें भी मल नहीं रहता है ।।१७९-१८०।। ततः सारभूतस्य रसस्य द्वौ भागौ भवतः स्थूलः सूक्ष्मश्च। तत्र स्थूलो भागः शरीरारम्भकं शुक्रं याति, सूक्ष्मः स्नेहभागं ओजस्तस्य लक्षणमाह- ओजः सर्वशरीरस्थं स्निग्धं शीतं स्थिरं सितम्। सोमात्मकं शरीरस्य बलपुष्टिकं मतम् ।।१८१।। १. 'सूक्ष्म' इति पाठान्तरम् सङ्गतम्। २. 'स्थूल' इति पाठान्तरमसङ्गतम्। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA