भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०४२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथोपनाहस्वेदविधिमाह- अथोपनाहस्वेदञ्च कुर्याद्वातहरौषधैः । प्रदिह्य देहं वातार्त्तं क्षीरमांसेरसादिभिः ॥ ६१॥ अम्लपिष्टैः सलवणैः सुखोष्णैः स्नेहसंयुतैः । अथ ग्राम्यानूपमांसैर्जीवनीयगणेन च ॥ ६२॥ दधिसौवीरकक्षीरवीरतर्वादिना तथा । कुलत्थमाषगोधूमैरतसीतिलसर्षपैः ॥ ६३ ॥ शतपुष्पादेवदारुशेफालीस्यूलजीरकैः । एरण्डमूलजीरैश्च रास्नामूलकशिग्रुभिः ॥६४॥ मिसिकृष्णाकुठेरैश्च लवणैरम्लसंयुतैः । प्रसारण्यश्वगन्धाभ्यां बलाभिर्दशमूलकैः ॥ ६५॥ गुडूच्या वानरीबीजैैर्यथालाभसमाहृतैः । क्षुण्णैः स्विन्नैश्च वस्त्रेण बद्धैः संस्वेदयेन्नरम् ॥६६॥ महाशाल्वणसंज्ञोऽयं योगः सर्वानिलार्त्तिहृत् ।। ६७ ।। उपनाहस्वेद की विधि-वातनाशक द्रव्यों को कांजी या छाछ आदि अम्ल पदार्थों के द्वारा पीस कर उसमें सेन्धा नमक, स्नेह (घी या तेल), दूध, मां सरस (सुरुवा) मिला कर गर्म करके सहन करने योग्य होने पर रोगी के जिस अङ्ग में वात की पीड़ा होती हो वहाँ पर पूर्वोक्त कल्क का लेप करके जो स्वेद दिया जाता है वह 'उपनाहस्वेद' कहलाता है। इस प्रकार ग्राम में रहने वाले तथा आनूप (जल के समीप या जल में रहने वाले) जीवों के मांस द्वारा, जीवनीय गण में कहे हुए द्रव्यों के द्वारा, दही, दूध तथा सौवीर के साथ वीरतर्वादि १ गण में कहे हुये (शर, नील तथा पीत फूल की कटसरैया, दाभ, बांदा, गोंदपटेर, नल, कुश, काश, पाखानभेद, अरणी, मूर्वा, हुरहुर, सोनापाठा, कोरैया, नीलकमल, ब्राह्मी, गोखरू) द्रव्यों के द्वारा एवं कुलथी, उड़द, गेहूँ, अलसी, तिल, सरसों, सौंफ, देवदारु, निर्गुण्डी, कलौंजी, एरण्ड की जड़, जीरा, रास्ना, मूली, सहजन, जटामांसी, पीपल, वनतुलसी, गन्धप्रसारणी, असगन्ध, बलचतुष्टय (चार प्रकार की बला), दशमूल, गुरुच, कौंच के बीज, इन सबों में जितने मिल सकें उन सबों को सिल पर पीस कर उसमें पञ्चलवण (पाँचों नमक) तथा अम्ल पदार्थ कांजी आदि मिला कर गर्म कर ले तत्पश्चात् उसे कपड़े में बाँध कर जो स्वेद दिया जाता है वह भी एक प्रकार का 'ऊष्मस्वेद' कहलाता है। इस योग का नाम 'महाशाल्वण' है अर्थात् इसे 'महाशाल्वण' संज्ञक उपनाह स्वेद कहते हैं। यह सम्पूर्ण वातसम्बन्धी पीड़ा को दूर करने वाला होता है ॥६१-६७॥ ❖ अस्यायमर्थः = उपनाहस्वेदञ्च कुर्यात् । केन प्रकारेण ? इत्याकाङ्क्षायां तत्प्रकारमाह-वातहरौषधैः । कथम्भूतैः ? अम्लपिष्टैः = अम्लेन काञ्जिकतक्रादिना पिष्टैः । सलवणैः । स्नेहसंयुतैः । क्षीरमां सरसान्वितैः । सुखोष्णैः । वातार्त्तं देहं प्रदिह्य प्रलिप्य स्वेदयेदित्यर्थः ॥ यहाँ खण्डान्वय से इसका अर्थ यह समझना चाहिये कि उपनाह स्वेद करे । 'किस प्रकार करे' ऐसी आकाङ्क्षा होने पर उपनाह स्वेद के प्रकार को कहते हैं-वातनाशक द्रव्यों से, ये किस प्रकार के हों ? तो वे अम्लपदार्थ कांजी, छाछ आदि से पिसे हुए हों तथा सेंधानमक और स्नेह (घी तेल) से युक्त हों एवं दूध, सुरुवा आदि से युक्त तथा सहने योग्य गर्म हों, इस प्रकार के द्रव्यों से वात से पीड़ित अङ्गों को प्रलिप्त करके स्वेदन देना चाहिये ॥ ६१-६७॥ अथवाऽम्लेन सम्पिटैः कोष्णैः सूक्ष्मपटस्थितैः । भेषजैः स्वेदयेत् किं वा स्विन्नै कोष्णैः पटस्थितैः ।। अथवा वातनाशक द्रव्यों को अम्लपदार्थ कांजी आदि के साथ पीस कर गर्म कर पतले कपड़े में रख सहने योग्य गर्म रहते स्वेद दिया जाय किंवा कुटे हुये औषध द्रव्यों को उबाल कर सहने योग्य गर्म रहते कपड़े में रख कर यदि इससे स्वेद दिया जाय तो वह उपनाह स्वेद कहलाता है ॥ १. वीरतरुसहचरद्वयदर्भक्ष्मादनीगुन्द्रानलकुशकाशाश्मभेदकाग्निमन्थमोरटावसिरभल्लूककुरुण्टकेन्दीवरकपोतवङ्गाः श्वदंष्ट्रा चेति। गणोऽयं वातघ्नः । अश्मरीशर्करामूत्रकृच्छ्राघातरुजाहरश्च । (सु.सू. ३८ अ.) CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA