भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ षष्ठं धूमपानादिविधिप्रकरणम् १०४३ अथ द्रवस्वेदविधिमाह- द्रवस्वेदस्तु वातघ्नद्रव्यक्वाथेन पूरिते। कटाहे कोष्ठके वाऽपि सूपविष्टोऽवगाहयेत् ।।६९।। सौवर्णं राजतं वापि ताम्रं लौहञ्च दारुजम्। कोष्ठकं तत्र कुर्वीतोच्छ्राये षड्विंशदङ्गुलम्। आयामे वा तदेव स्याच्चतुष्कोणन्तुिक्कणम् ।।७०।। द्रवस्वेद की विधि-वातनाशक द्रव्यों के क्वाथ से गले तक भरे हुए कराह अथवा कोष्ठक (टब) में रोगी को स्थिर बैठा कर यदि स्नान करवाकर जो स्वेद दिया जाता है वह द्रवस्वेद कहलाता है। सोना, चाँदी, तामा, लोहा अथवा लकड़ी का टब बनवाना चाहिये जो ऊँचाई और चौड़ाई में २६ अङ्गुल का हो एवं चिकनी तथा चौकौर भी हो ।।६९-७०।। अयमर्थः-प्रथयतो वातघ्नद्रव्यक्वाथेन कण्ठपूरिते कोष्ठके कटाहे वा सूपविष्टस्तिष्ठेत् ।।६९-७०।। वातनाशक द्रव्यों के क्वाथ से गले तक भरे हुये कराह अथवा टब में सुस्थिर बैठकर स्नान करने द्वारा स्वेद लेना प्रथम द्रवस्वेद है ।।६९-७०।। पक्षान्तरमाह- नाभेः षडङ्गुलं यावन्मग्नं क्वाथस्य धारया। कोष्णाया सिक्तस्तिष्ठेत्स्निग्धतनूर्नरः ।।७१।। द्रवस्वेद की दूसरी विधि-अथवा रोगी को उक्त टब में नाभि से ऊपर छ अङ्गुल तक क्वाथ में डूबा हुआ बैठावे और किंचिद गर्म-गर्म क्वाथ की धारा उसके कन्धों पर गिरावे एवं टब में बैठने के पहले तेल की मालिश कर दे ।।७१।। ❖ अथवा नाभेः षडङ्गुलमूर्ध्वं यावत् क्वाथे मग्न उपविष्टः । पश्चात् क्वाथस्य धारया स्कन्धयोः सिच्यमानस्तिष्ठेद् । यावत् कोष्ठकं परिपूर्णं भवतीत्यर्थः । क्वाथपक्षे प्रथमतः स्नेहाभ्यक्ततनुरुप-विशेत् ।।७१।। यहाँ इसका अर्थ यह समझना चाहिये कि-अथवा नाभि से ६ अङ्गुल ऊपर तक क्वाथ में डूबा हुआ टब में बैठे, उसके बाद क्वाथ की धारा से दोनों कन्धों के ऊपर सींचा जाता हुआ तब तक बैठा रहे जब तक टब पूर्ण रीति से भर न जाय। क्वाथ के पक्ष में पहले तेल की मालिश शरीर में कर ले'तब टब में बैठे ।।७१।। मुहूर्त्तैकं समारम्य यावत्स्यात्तच्चतुष्टयम्। तावत्तदवगाहेत यावदारोग्यनिश्चयः ।।७२।। एक मुहूर्त्त (२ घड़ी=४८ मिनट) से लेकर ४ मुहूर्त्त (लगभग ३ । घण्टे) तक उक्त रीति से द्रवस्वेद दिया जाना चाहिये अथवा जब तक आरोग्य लाभ न हो तब तक देना चाहिये ।।७२।। एवं तैलेन दुग्धेन सर्पिषा स्वेदयेन्नरम्। एकान्तरो द्वयन्तरो वा युक्तः स्नेहोऽवगाहने ।।७३।। इसी प्रकार तेल, दूध अथवा घी से रोगी को द्रवस्वेद देना चाहिये। किन्तु उक्त रीति से स्नान करने में स्नेह (घी वा तेल) का प्रतिदिन उपयोग करना उचित नहीं होता। अतः एक दिन वा दो दिन का अन्तर देकर स्नेहद्वारा स्नान करना चाहिए ।।७३।। ❖ एतावता क्वाथो दुग्धञ्च नित्यमेव युज्यते । स्नेहस्तु दिनमेकं द्वे वा दिने गमयित्वा युक्तः । अग्निमान्द्याशङ्कयेति भावः ।।७३।। यहाँ यह भी समझना चाहिये कि-ऐसा कहने से अर्थात् स्नेह का नाम लेने से उक्त रीति से स्नान करने में क्वाथ तथा दूध का नित्य ही उपयोग किया जाय तो योग्य होता है। स्नेह का उपयोग तो एक या दो दिन बिता कर करना उचित है। क्योंकि यदि ऐसा न किया जाय तो प्रतिदिन स्नेह का उपयोग करने से अग्नि मन्द होने की आशंका हो जाती है ।।७३।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA