भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
अथ षष्ठं धूमपानादिविधिप्रकरणम् १०४३ अथ द्रवस्वेदविधिमाह- द्रवस्वेदस्तु वातघ्नद्रव्यक्वाथेन पूरिते। कटाहे कोष्ठके वाऽपि सूपविष्टोऽवगाहयेत् ।।६९।। सौवर्णं राजतं वापि ताम्रं लौहञ्च दारुजम्। कोष्ठकं तत्र कुर्वीतोच्छ्राये षड्विंशदङ्गुलम्। आयामे वा तदेव स्याच्चतुष्कोणन्तुिक्कणम् ।।७०।। द्रवस्वेद की विधि-वातनाशक द्रव्यों के क्वाथ से गले तक भरे हुए कराह अथवा कोष्ठक (टब) में रोगी को स्थिर बैठा कर यदि स्नान करवाकर जो स्वेद दिया जाता है वह द्रवस्वेद कहलाता है। सोना, चाँदी, तामा, लोहा अथवा लकड़ी का टब बनवाना चाहिये जो ऊँचाई और चौड़ाई में २६ अङ्गुल का हो एवं चिकनी तथा चौकौर भी हो ।।६९-७०।। अयमर्थः-प्रथयतो वातघ्नद्रव्यक्वाथेन कण्ठपूरिते कोष्ठके कटाहे वा सूपविष्टस्तिष्ठेत् ।।६९-७०।। वातनाशक द्रव्यों के क्वाथ से गले तक भरे हुये कराह अथवा टब में सुस्थिर बैठकर स्नान करने द्वारा स्वेद लेना प्रथम द्रवस्वेद है ।।६९-७०।। पक्षान्तरमाह- नाभेः षडङ्गुलं यावन्मग्नं क्वाथस्य धारया। कोष्णाया सिक्तस्तिष्ठेत्स्निग्धतनूर्नरः ।।७१।। द्रवस्वेद की दूसरी विधि-अथवा रोगी को उक्त टब में नाभि से ऊपर छ अङ्गुल तक क्वाथ में डूबा हुआ बैठावे और किंचिद गर्म-गर्म क्वाथ की धारा उसके कन्धों पर गिरावे एवं टब में बैठने के पहले तेल की मालिश कर दे ।।७१।। ❖ अथवा नाभेः षडङ्गुलमूर्ध्वं यावत् क्वाथे मग्न उपविष्टः । पश्चात् क्वाथस्य धारया स्कन्धयोः सिच्यमानस्तिष्ठेद् । यावत् कोष्ठकं परिपूर्णं भवतीत्यर्थः । क्वाथपक्षे प्रथमतः स्नेहाभ्यक्ततनुरुप-विशेत् ।।७१।। यहाँ इसका अर्थ यह समझना चाहिये कि-अथवा नाभि से ६ अङ्गुल ऊपर तक क्वाथ में डूबा हुआ टब में बैठे, उसके बाद क्वाथ की धारा से दोनों कन्धों के ऊपर सींचा जाता हुआ तब तक बैठा रहे जब तक टब पूर्ण रीति से भर न जाय। क्वाथ के पक्ष में पहले तेल की मालिश शरीर में कर ले'तब टब में बैठे ।।७१।। मुहूर्त्तैकं समारम्य यावत्स्यात्तच्चतुष्टयम्। तावत्तदवगाहेत यावदारोग्यनिश्चयः ।।७२।। एक मुहूर्त्त (२ घड़ी=४८ मिनट) से लेकर ४ मुहूर्त्त (लगभग ३ । घण्टे) तक उक्त रीति से द्रवस्वेद दिया जाना चाहिये अथवा जब तक आरोग्य लाभ न हो तब तक देना चाहिये ।।७२।। एवं तैलेन दुग्धेन सर्पिषा स्वेदयेन्नरम्। एकान्तरो द्वयन्तरो वा युक्तः स्नेहोऽवगाहने ।।७३।। इसी प्रकार तेल, दूध अथवा घी से रोगी को द्रवस्वेद देना चाहिये। किन्तु उक्त रीति से स्नान करने में स्नेह (घी वा तेल) का प्रतिदिन उपयोग करना उचित नहीं होता। अतः एक दिन वा दो दिन का अन्तर देकर स्नेहद्वारा स्नान करना चाहिए ।।७३।। ❖ एतावता क्वाथो दुग्धञ्च नित्यमेव युज्यते । स्नेहस्तु दिनमेकं द्वे वा दिने गमयित्वा युक्तः । अग्निमान्द्याशङ्कयेति भावः ।।७३।। यहाँ यह भी समझना चाहिये कि-ऐसा कहने से अर्थात् स्नेह का नाम लेने से उक्त रीति से स्नान करने में क्वाथ तथा दूध का नित्य ही उपयोग किया जाय तो योग्य होता है। स्नेह का उपयोग तो एक या दो दिन बिता कर करना उचित है। क्योंकि यदि ऐसा न किया जाय तो प्रतिदिन स्नेह का उपयोग करने से अग्नि मन्द होने की आशंका हो जाती है ।।७३।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA
१०४४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे सिरामुखैर्लोमकूपैर्धमनीभिश्च तर्पयेत्। शरीरं बलमाधत्ते युक्तः स्नेहोऽवगाहने ॥७४॥ जलसिक्तस्य वर्द्धन्ते यथा मूलेऽङ्कुरादयः। तथैव धातुवृद्धिर्हि स्नेहसिक्तस्य जायते ॥७५॥ नातः परतरः कश्चिदुपायो वातनाशनः। शीतशूलव्युपरमे स्तम्भगौरवनिग्रहे ॥७६॥ दीप्तेऽग्नौ मार्दवे जाते स्वेदनाद्विरतिर्मता ।।॥७७॥ उक्त रीति से स्नान करने में स्नेह (घी वा तेल) का उपयोग करने से वह सिराओं के मुख, रोमकूप तथा धमनियों के द्वारा अन्दर प्रविष्ट होकर शरीर को तर्पित करता है तथा शरीर में बल उत्पन्न करता है। जिस तरह वृक्ष के मूलभाग में जल सींचने से अंकुर आदि बढ़ते हैं उसी तरह स्नेह से सींचे हुये (स्नान किये हुये) रोगी के धातुओं की वृद्धि होती है इससे बढ़ कर और दूसरा कोई उपाय वातसम्बन्धी पीड़ा दूर करने के लिये नहीं है। शीत तथा शूल के नष्ट हो जाने पर तथा शरीर की स्तब्धता (जकड़ जाना) और गुरुता (भारी हो जाने) के दूर हो जाने पर एवं अग्नि के प्रदीप्त तथा शरीर के कोमल हो जाने पर ही स्वेद देने से विरत होना उचित होता है ॥७४-७७॥ अथ मूर्द्धतैलविधिमाह- अभ्यङ्गः परिषेकश्च पिचुर्बस्तिरिति क्रमात्। मूर्द्धतैलं चतुर्द्धा स्याद्बलवत्तद्यथोत्तरम् ॥७८॥ मूर्द्धतैल (सिर में तेल डालने) की विधि-(१) अभ्यङ्ग, (२) परिषेक, (३) पिचु, (४) बस्ति इस प्रकार मूर्द्धतैल के ४ भेद होते हैं और ये क्रम से एक दूसरे की अपेक्षा उत्तरोत्तर बलवान् होते हैं ॥७८॥ ❖ अभ्यङ्गः=तैलेन शिरसो मर्दनम्। परिषेकः=शिरसि धारापातनम्। पिचुः=तैलाक्तं तूलं 'फोहा' इति लोके। बस्तिर्वक्ष्यमाणः ॥७८।। यहाँ तेल से सिर मालिश करना 'अभ्यङ्ग', सिर के ऊपर तेल की धारा गिराना 'परिषेक', सिर के ऊपर तेल से भीगी हुई रूई अर्थात् लोकप्रसिद्ध 'फोहा' रखना 'पिचु' समझना चाहिये। और 'बस्ति' का विवरण आगे जो दिया जायगा उससे समझ लेना चाहिये ॥७८॥ त्रयोऽभ्यङ्गादयः पूर्वे प्रसिद्धाः सर्वतः स्मृताः। शिरोबस्तिविधिश्चात्र प्रोच्यते सुज्ञसम्मतः ॥७९॥ शिरोबस्तिश्चर्मणः स्याद् द्विमुखो द्वादशाङ्गुलः। शिःप्रमाणस्तं बद्ध्वा मस्तके माषपिष्टकैः ॥८०॥ सन्धिरोधं विधायाशु स्नेहैः कोष्णैः प्रपूरयेत्। तावद्धार्यस्तु यावत्स्यान्नासाकर्णमुखस्रुतिः ॥८१॥ वेदनोपशमो वाऽपि मात्राणां वा सहस्रकम्। स्वजानुनः करावर्त्तं कुर्याच्छोटिकया युतम् ॥८२॥ एषा मात्रा भवेदेका सर्वत्रैवैष निश्चयः। विना भोजनमेवात्र शिरोबस्तिः प्रशस्यते ॥८३॥ प्रयोज्यस्तु शिरोबस्तिः पञ्च सप्त दिनानि वा। विमोच्य शिरसो बस्तिं गृह्णीयाच्च समन्ततः ॥८४॥ ऊर्ध्वकार्यं ततः कोष्णे नीर स्नानं समाचरेत्। अनेन दुर्जया रोगा वातजा यान्ति संक्षयम्। शिरःकम्पादयस्तेन सर्वकालेषु युज्यते ॥८५॥ इनमें से पहले के अभ्यङ्गादि (अभ्यङ्ग, परिषेक, पिचु) तीन सर्वत्र प्रसिद्ध ही हैं अतः उनका व्याख्यान न करके यहाँ केवल शिरोबस्ति (सिर में तेल से बस्ति देने) की विधि कहते हैं, जो विद्वानों को अभिमत है। शिरोबस्ति चमड़े की बनानी चाहिये अर्थात् वह टोपी के आकार की १२ अंगुल ऊँची सिर के नाम की बनानी चाहिये इसके दोनों तरफ मुख होना चाहिये, तत्पश्चात् उसे रोगी के सिर में बाँध कर सन्धियों को उरद के आटा को जल में सान कर उसी से खूब बन्द कर देना चाहिये और तत्काल किंचिद् गर्म स्नेह (तेल) से पूर्वोक्त टोपी को भर देना चाहिये। यही शिरोबस्ति देने की विधि है। तब तक सिर पर उसे रहने देना चाहिये जब तक नाक, कान तथा मुख से पानी न झरने लगे अथवा जब तक पीड़ा की शान्ति न हो, या जब तक १००० (एक हजार) मात्रा का काल पूरा न हो। यहाँ सर्वत्र निश्चित एक मात्रा का काल उसे समझना चाहिये। जो अपने जानु (घुटना) पर एक वार हाथ फिरा कर चुटकी बजाने में काल लगता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ षष्ठं धूमपानादिविधिप्रकरणम् १०४५ यह शिरोबस्ति उसी समय दी जाती है तब रोगी भोजन न किया हो। इसका प्रयोग ५ या ७ दिन तक नित्य किया जाता है। शिरोबस्ति ले चुकने के बाद उक्त टोपी को सावधानी से उतार कर तेल को सिर के चारों तरफ से बंटोर कर अलग कर देना चाहिये जिसमें इधर-उधर फैलने न पावे। इसके बाद किंचिद् गर्म जल से रोगी के शरीर के ऊपरी भाग को अच्छी तरह से धुला दे। इस प्रकार यदि शिरोबस्ति का प्रयोग किया जाय तो उससे दुर्जय वातसम्बन्धी शिरः कम्प (सिर का काँपना) इत्यादि रोग दूर हो जाते हैं। अतएव इसका प्रयोग सभी समयों में करना चाहिये ।।७९-८५।। पञ्च सप्त दिनानि वेत्युत्त्वा सर्वकालेष्विति शिरःकम्पादिरोगानुवृत्तौ ज्ञेयम् ।।७९-८५।। यहाँ 'पाँच या सात दिन तक शिरोबस्ति देनी चाहिये' ऐसा कह करके भी जो 'सभी समयों में इसका प्रयोग करना चाहिये' यह पुनः कहा गया उसका भाव यह समझना चाहिये कि-शिरःकम्प आदि रोग जब तक बने रहें तब तक देना चाहिये अतः अन्त में ५ या ७ दिन की अवधि का नियम तोड़ दिया गया ।।७९-८५।। अथ कर्णपूरणविधिमाह- स्वेदयेत्कर्णदेशन्तु किञ्चिन्नुः पार्श्वशायिनः। मूत्रैः स्नेहै रसैरुष्णैः श्रोत्ररन्ध्रं प्रपूरयेत् ।।८६।। कर्णञ्च पूरितं रक्षेच्छतं पञ्च शतानि वा। सहस्रं वापि मात्राणां श्रोत्रकण्ठशिरोगदे ।।८७।। मूत्राद्यैः पूरणं कर्णे भोजनात्प्राक्प्रशस्यते। तैलाद्यैः पूरणं कर्णे भास्करेऽस्तमुपागते ।।८८।। कर्णपूरण (कान में तेल डालने) की विधि-रोगी को प्रथम एक करवट सुला कर उसके कान के भाग का किञ्चित् स्वेदन करे तत्पश्चात् गर्म किये हुये मूत्र, स्नेह (घी का तेल) या स्वरस इनमें से योग्यतानुसार किसी से उसके कान से छिद्र को भर दे। यदि कान-सम्बन्धी रोग से युक्त हो तो सौ मात्रा तक, कण्ठसम्बन्धी रोग वाला हो तो पाँच सौ मात्रा तक तथा सिरसम्बन्धी रोग से पीड़ित हो तो एक हजार मात्रा तक उक्त मूत्रादि औषधियों को उसके कान में पड़ा रहने दे, अर्थात् तब तक गिरने से बचाता रहे। यदि रोगी के कान में मूत्र आदि डालना हो तो उसके भोजन करने के पहले ही डालना उत्तम होता है। स्नेह आदि डालना हो तो सूर्य के अस्त हो जाने पर ही उचित होता है ।।८६-८८।। तद्यथा- कर्णे शूलाकुले कोष्णं बस्तमूत्रं ससैन्धवम्। निक्षिपेत्तेन शाम्यन्ति शूलपाकादिजा रुजः ।।८९।। शृङ्गवेरञ्च मधुकं सैन्धवं तैलमेव च। कदुष्णं कर्णयोर्देयमेतत्स्याद्वेदनाऽपहम् ।।९०।। पीतार्कपत्रमाज्येन लिप्तं वह्नौ प्रतापयेत्। तद्रसः श्रवणे 'क्षिप्तः कर्णशूलहरः परः ।।९१।। कान के शूल (दर्द) से व्याकुल रोगों के कान में बकरे का मूत्र सेंधानमक का चूर्ण मिला कर डालना हो तो उसे भोजन के प्रथम ही डालना चाहिये। इसके प्रयोग करने से कर्णशूल (कान का दर्द), कर्णपाक (कान का पक जाना) आदि कान के रोग नष्ट हो जाते हैं। यदि अदरख का रस, शहद (या मुलेठी का चूर्ण) और सेंधा नमक के चूर्ण को किञ्चिद् गर्म करके कानों में डालना हो तो सूर्य के अस्त होने पर डालना चाहिये। इसका प्रयोग कान की पीड़ा को शान्त करने वाला होता है। आक के पीले पत्तों के ऊपर चारों तरफ घी का लेप करके और आग पर तपा कर यदि उनका रस कान में डालना हो तो सूर्य के अस्त होने पर डालना चाहिये। इसका प्रयोग कान के शूल (दर्द) को दूर करने में श्रेष्ठ होता है ।।८९-९१।। अथ लेपविधिमाह- आलेपस्य तु नामानि लेपो लेपनलिप्तकौ। दोषघ्नो विषहा वर्ण्यः स च लेपस्त्रिधा मतः ।। त्रिप्रमाणश्चतुर्भागत्रिभागावर्द्धाङ्गुलोन्नतः। आर्द्रों व्याधिहरः स स्याच्छुष्की दूषयति च्छविम् ।। लेप की विधि-आलेप, लेप, लेपन तथा लिप्तक, लेप के ये चार नाम हैं। दोषघ्न (दोष को नष्ट करने वाला), विषहा (विष-नाशक) और वर्ण्य (वर्ण को उत्तम करने वाला) इस प्रकार लेप के तीन भेद हैं। चौथाई अङ्गुल ऊँचा (१/
१०४६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ४ अङ्गुल), तिहाई अङ्गुल ऊँचा (१/३ अङ्गुल) और आधा अङ्गुल ऊँचा (१/२ अङ्गुल) इस प्रकार लेप की ऊँचाई के भेद से लेप का प्रमाण तीन प्रकार का होता है। गीला लेप रोगनाशक तथा सूखा लेप कान्ति को नष्ट करने वाला होता है ॥९२-९३॥ ❖ चतुर्भागत्रिभागादर्द्धाङ्गुलोन्नतः, एवं त्रिप्रमाणः ॥९३॥ यहाँ 'लेप का प्रमाण तीन प्रकार का होता है' यह जो कहा है वह इस प्रकार से समझना चाहिये कि-'(१) चौथाई अङ्गुल का, (२) तिहाई अङ्गुल का, (३) आधा अङ्गुल का ऊँचा लेप' ॥९२-९३॥ दोषघ्नो लेपो यथा- शोथघ्नीदारुसिद्धार्थशुण्ठीशोभाञ्जनत्वचाम्। आरनालेन पिष्टानां प्रलेपः सर्वशोथहा ॥९४॥ दोषघ्न लेप-गदहपुरना, देवदारु, सरसों, सोंठ और सहजन की छाल इन पाँच ओषधियों को कांजी में पीस कर लेप करने से सभी प्रकार की सूजन नष्ट हो जाती है। यह दोषघ्न लेप है ॥९४॥ ❖ शोथघ्नी=पुनर्नवा ॥९४॥ यहाँ पर 'शोथघ्नी' से 'गदहपुर्ना' समझना चाहिये ॥९४॥ शिरीषं मधुयष्टी च तगरं रक्तचन्दनम्। एला मांसी निशायुग्मं कुष्ठं बालकमेव च ॥९५॥ इति सञ्चूर्ण्य लेपोऽयं पञ्चमांशघृतप्लुतः। जलेन क्रियते सुज्ञैर्दशाङ्ग इति संज्ञितः ॥९६॥ वीसर्पघ्न विस्फोटाञ्छोथदुष्टव्रणाञ्जयेत् ॥९७॥ दशाङ्गलेप-शिरीष की छाल, मुलहठी, तगर, लाल चन्दन, इलायची, जटामांसी, हल्दी, दारुहल्दी, कूठ और नेत्रबाला इन पदार्थों का चूर्ण बना कर उसमें १/५ भाग घी डाल कर पानी से लेप करे। इससे विसर्प, विस्फोटक, सूजन और दुष्ट व्रणों का क्षय होता है। विद्वान् लोग इसको दशाङ्ग लेप कहते हैं ॥९५-९७॥ विषहा लेपो यथा- अजादुग्धतिलैर्लेपो नवनीतेन संयुतः। शोथमारुष्करं हन्ति लेपो वा कृष्णमार्त्तिकः ॥९८॥ विषहा लेप-बकरी के दूध में तिल पीस कर और उसमें भैंस का मक्खन मिला कर लेप करने से अथवा काली मिट्टी का लेप करने से मिलावे इत्यादि से हुई सूजन नष्ट होती है। इस लेप को वैद्य लोग विषहा लेप कहते हैं ॥९८॥ ❖ नवनीतेनात्र माहिषेणार्दिकेन। कृष्णमार्त्तिकः=कृष्णमृत्तिकाकृतः ॥९८॥ यहाँ 'नवनीत' पद से 'भैंस का मक्खन कल्क के आधे भाग बराबर' यह अर्थ समझना चाहिये तथा 'कृष्णमार्त्तिक' का 'काली मिट्टी का' यह अर्थ समझना चाहिये ॥९८॥ अपरः कृमिविषापहलेपो यथा- लाङ्गल्यतिविषाऽलावूक्षालिनीबीजमूलकैः। लेपो धान्याम्बुसम्पिष्टः कीटबिस्फोटनाशनः ॥९९॥ दूसरा कृमिसम्बन्धी विष को नष्ट करने वाला लेप-कलिहारी, अतीस, कड़वी तोंबी, घियातरोई के बीज और मूली को कांजी में पीस कर लेप करने से विषैले कीड़ों से उत्पन्न हुआ विस्फोट नष्ट होता है ॥९९॥ मुखकान्तिदो लेपो यथा- रक्तचन्दनमञ्जिष्ठालोध्रकुष्ठप्रियङ्गवः। वटाङ्कुरा मसूराश्च व्यङ्गघ्ना मुखकान्तिदाः ॥१००॥ मुखकान्तिदायक लेप-लाल चन्दन, मजीठ, लोध, कूठ, प्रियङ्गु, वट के अंकुर और मसूर का लेप करने से मुख के ऊपर की झांई नष्ट होती है और मुख की कान्ति उत्तम होती है ॥१००॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ षष्ठं धूमपानादिविधिप्रकरणम् १०४७ अथ लेपविधिश्चैव प्रोच्यते सुज्ञसम्मतः । आलेपश्च प्रदेहश्च द्वौ भेदौ तस्य भाषितौ ।।१०१।। चर्माद्रं माहिषं यद्वत्तन्नोन्नतं सा मितिस्तयोः । शौतस्तनुविशोषी च प्रलेपः पित्तहन्मतः ।।१०२।। आर्द्रो घनस्तथोष्णः स्यत्प्रदेहः श्लेष्मवातहा। न रात्रौ लेपनं कुर्याच्छुष्यमाणं न धारयेत् ।। शुष्यमाणमुपेक्षेत प्रदेहं पीडनं प्रति ।।१०३।। लेप के दो भेद-आलेप और प्रदेह कहे गये हैं। इन दोनों की मुटाई भैंस के गीले चमड़े के बराबर रखनी चाहिये। जो लेप शीतल, पतला और जल्द सूख जाने वाला होता है वह 'प्रलेप' कहलाता है। प्रलेप से पित्त नष्ट होता है। जो लेप तुरन्त नहीं सूखता एवं गाढ़ा और गरम रहता है वह 'प्रदेह' कहलाता है। प्रदेह से वात और कफ नष्ट होता है। रात्रि में लेप नहीं करना चाहिये और न सूखे हुप लेप को शरीर पर धारण करना चाहिये। किन्तु पीडन-संज्ञक प्रदेह अर्थात् फोड़ा इत्यादि को बैठाने के लिये जो लेप किया जाता है उसे रहने देना चाहिये ।।१०३।। तमसा पिहितो ह्युष्मा लोमकूपमुखे स्थितः । विना लेपेन निर्याति रात्रौ नालेपयेदतः ।। रोमकूपों के मुख में रहने वाली गरमी रात्रि के अन्धकार से ढक जाती है इस लिये रात्रि में प्रलेप नहीं करना चाहिये। यदि लेप किया होता है तो वह गर्मी रोमों के अन्दर रह जाती है जिससे रोग उत्पन्न हो जाने की आशङ्का रहती है ।।१०४।। ❖ तमसा=रात्र्यन्धकारेण ।।१०४।। यहाँ 'तमसा' पद का 'रात्रि के अन्धकार से' यह अर्थ समझना चाहिये ।।१०४।। रात्रावपि प्रलेपादिव्रणे देयो विचक्षणैः । अपाकिन्यतिगम्भीरे रक्तश्लेष्मसमुद्भवे ।।१०५।। जो व्रण न पकता हो, अत्यन्त गम्भीर हो तथा रुधिर और कफ से उत्पन्न हुआ हो उस पर विद्वान् वैद्य को रात्रि में भी लेपादि करना चाहिये ।।१०५।। प्रलेपो यथा- मधुकं चन्दनं मूर्वा नलमूलञ्च पर्पटम् । उशीरं बालकं पद्मं प्रलेपः पित्तशोथहृत् ।।१०६।। प्रलेप—मुलहठी, चन्दन, मूर्वा, खस की जड़, पित्तपापड़ा, खश, सुगन्धवाला और कमल इनका प्रलेप पित्तजन्य सूजन को नष्ट करता है ।।१०६।। प्रदेहो यथा- बीजपूरजटा हिंस्रा देवदारु महौषधम् । रास्नाऽरणिः प्रदेहोऽयं वातशोथविनाशनः ।।१०७।। प्रदेह—बिजौरे की जड़, जटामांसी, देवदारु, सोंठ, रासन और अरनी इनका प्रदेह वातजन्य शोथ को नष्ट करता है ।।१०७।। ❖ अरणिः=अग्निमन्थः ।।१०७।। यहाँ 'अरणि' पद का 'अग्निमन्थ अर्थात् अरनी' अर्थ समझना चाहिये ।।१०७।। कृष्णापुराणपिण्याकशिग्रुत्वक्सिकताशिवाः । गोमूत्रपिष्टः कोष्णोऽयं प्रदेहः श्लेष्मशोथहा ।। पीपल, पुरानी खली, सहजन की छाँड़, खांड और हरड़ की गोमूत्र में पीसकर किञ्चित् उष्ण प्रदेह करने से कफसम्बन्धी शोथ नष्ट हो जाता है ।।१०८।। अथ शोणितस्रावण (फस्त) विधिमाह- शोणितं स्रावयेज्जन्तोरामयं प्रसमीक्ष्य च । प्रस्थं प्रस्थार्द्धमेव वा प्रस्थार्द्धार्द्धमथापि वा ।।१०९।। शरत्काले स्वभावेन शोणित स्रावयेन्नरः । त्वग्दोषग्रन्थिशोथाद्या नश्यन्ति रुधिरोद्भवाः ।।११०।।
१०४८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे व्यभ्रे वर्षासु विध्येत शीते ग्रीष्मे शरद्यपि । मध्याह्ने शीतकाले च रुधिरं स्रावयेद् बुधः ।। १९१ ।। अनुष्णाशीतं मधुरं स्निग्धं रक्तञ्च वर्णतः । शोणितं गुरु विस्रं स्याद् विदाहश्चास्य पित्तवत् ।। १९२ ।। विस्रता द्रवता रागश्चलनं विलयस्तथा । भूम्यादिपञ्चभूतानामेते रक्तेगुणाः स्मृताः ।। १९३ ।। रक्ते दुष्टे भवेच्छोथो रक्तमण्डलमेव च । व्यथा दाहश्च पाकश्च कण्डूश्च पिडकोद्गमः ।। १९४ ।। वृद्धे रक्ताङ्गनेत्रत्वं सिराणां पूर्णता तथा । गात्राणां गौरवं निद्रा मोहो दाहश्च जायते ।। १९५ ।। शोणित स्राव (फस्त) की विधि-रोगी के रोग को देख कर तदनुसार एक प्रस्थ (६ ।। पल), आधा प्रस्थ (३ । पल) अथवा चौथाई प्रस्थ (६ । तोला) रक्त निकाले । शरदृतु में मनुष्य को स्वभावतः रक्त निकलवाना चाहिये, इससे रुधिरदोष से उत्पन्न हुये चर्म रोग, गाँठ, सूजन आदि विकार नष्ट हो जाते हैं । जिस दिन आकाश में बादल न हो, वर्षाऋतु में, ग्रीष्मऋतु में, शरद् ऋतु में, मध्याह्न के समय और शीतकाल में विद्वान् वैद्य रोग तथा रोगी पर ध्यान देकर रुधिर निकाले । रुधिर अनुष्णाशीत (उष्णता, शीतलता रहित), स्वाद में मधुर, वर्ण में लाल, भारी, चिकना, कच्चे मांस के समान गन्धवाला तथा पित्त के सदृश दाहशक्ति वाला होता है । रुधिर में जो गन्ध है वह पृथिवी का गुण है, द्रवता जल का गुण है, रक्तता तेज का गुण है, चलन वायु का गुण है और शब्द आकाश का गुण है इस प्रकार रक्त में पाँचों महाभूतों के गुण हैं । रक्त के दुष्ट होने पर शोथ, लाल चकत्ते, शरीर में पीड़ा, दाह, शरीर का पक जाना, खुजली और फुन्सियाँ होती हैं । शरीर में रक्त के बढ़ जाने पर अङ्ग तथा नेत्र लाल हो जाते हैं, सिरायें रक्त से भरकर फूल जाती हैं, अङ्गों में भारीपन, निद्रा, मोह और दाह उत्पन्न होने लगता है । क्षीणेऽस्रे मधुराकाङ्क्षा मूर्च्छा च त्वचि रूक्षता । शैथिल्यं च शिराणां स्याद्वातादुन्मार्गगामिता ।। १९६ ।। शरीर में रक्त की कमी होने पर मधुर पदार्थों के खाने की इच्छा, मूर्च्छा, त्वचा में रूक्षता, एवं रक्तक्षीणताजन्य वात से सिराओं का शिथिल हो जाना तथा अयोग्य मार्ग में चलना ये सब लक्षण उत्पन्न होते हैं ।। १९६ ।। ❖ वाताद्रक्तक्षयजनितात् ।। १९६ ।। यहाँ 'वाताद्' पद का 'रक्तक्षीणता जन्य वात से' यह अर्थ समझना चाहिये ।। १९६ ।। अरुणं फेनिलं रूक्षं परुषं तनु शीघ्रगम् । आस्कन्दि सूचीनिस्तोदि रक्तं स्याद्वातदूषितम् ।। १९७ ।। पित्तेन पीतं हरितं नीलं श्यावं च विस्रकम् । अस्वादूष्णं मक्षिकाणां पिपीलीनामनिष्टकम् ।। १९८ ।। शीतलं बहुलं स्निग्धं गैरिकोदकसन्निभम् । मांसपेशीप्रभं स्कन्दि मन्दगं कफदूषितम् ।। १९९ ।। द्विदोषदुष्टं संसृष्टं त्रिदुष्टं पूतिगन्धकम् । सर्वलक्षणसंयुक्तं काञ्जिकाभं च जायते ।। १२० ।। विषदुष्टं भवेच्छ्यावं नासिकोन्मार्गं तथा । विस्रं काञ्जिकसंकाशं सर्वकुष्ठकरं तथा ।। १२१ ।। वातादि से दूषित रक्तों के लक्षण-वात से दूषित हुआ रक्त-लाल, झाग युक्त, रूक्ष, कठोर, पतला, शीघ्र चलने वाला, आस्कन्दी तथा सूई चुभने की सी पीड़ा करने वाला होता है । पित्त से दूषित हुआ रक्त-शीतल, अत्यन्त स्निग्ध, गेरू के पानी के समान कान्ति वाला, मांस की पेशियों के समान घनीभूत एवं मन्दगामी होता है । दो दोषों से दूषित रक्त-जिन-जिन दोषों से दूषित होता है उन-उन दोषों के लक्षणों से युक्त होता है । तीन दोषों से दूषित रक्त- दुर्गन्धयुक्त, हर एक दोषों के लक्षणों से मिला हुआ, काञ्जी के समान होता है । विष से दूषित रक्त-काला, नाक की राह से निकलने वाला, कच्चे मांस के समान गन्ध वाला, काञ्जी के समान तथा सर्व प्रकार के कुष्ठों को उत्पन्न करने वाला होता है ।। १९७-१२१ ।। अथ शुद्धरक्तस्य लक्षणमाह- इन्द्रगोपप्रभं ज्ञेयं प्रकृतिस्थमसंहतम् ।। १२२ ।। शुद्ध रक्त के लक्षण-जो शुद्ध रक्त होता है वह इन्द्रगोप (बीरबहूटी) कीड़े के समान देखने में लाल तथा पतला होता है ।। १२२ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ षष्ठं धूमपानादिविधिप्रकरणम् १०४९ अथ रक्तस्रावस्य विषयानाह- शोथे दाहेऽङ्गपाके च रक्तवर्णेऽसृजः स्रुतौ ।। वातरक्ते तथा कुष्ठे सपीडे दुर्जयेऽनिले । पाण्डुरोगे श्लीपदे च विषदुष्टे च शोणिते ।। १२३ ।। ग्रन्थ्यर्बुदापचीक्षुद्ररोगाधिमन्थकाभिधे । विदारीस्तनरोगेषु गात्राणां सादगौरवे ।। १२४ ।। रक्ताभिष्यन्दतन्द्रायां पूतिघ्राणास्यदाहके । यकृत्प्लीहविसर्पेषु विद्रधौ पिडकोद्गमे ।। १२५ ।। कर्णौष्ठघ्राणवक्त्राणां पाके दाहे शिरोरुजि । उपदंशे रक्तपित्ते रक्तस्रावः प्रशस्यते ।। १२६ ।। रक्तस्राव के विषय-शोथ, दाह, अङ्गों का पकना तथा लाल रङ्ग का होना, नाक आदि से रक्त का गिरना, वातरक्त, कुष्ठ, पीड़ा के सहित वायु का दुर्जय होना, पाण्डुरोग, फीलपाँव, विष से रक्त का दूषित हो जाना, गाँठ, अर्बुद, अपची नामक गले की गाँठ, क्षुद्ररोग, अधिमन्थ, विदारी, स्तनसम्बन्धी रोग, अङ्गों में शिथिलता तथा गुरुता होना, रक्तसम्बन्धी अभिष्यन्द, तन्द्रा, नाक से दुर्गन्ध निकलना, मुख में दाह होना, यकृत्, प्लीहा, विसर्प, विद्रधि, पिडका (फुंसी) निकलना, कान, ओठ, नाक या मुख का पकना या इनमें दाह होना, सिरदर्द, उपदंश (गर्मी) तथा रक्त पित्त इन सब रोगों में रोगी का रक्त निकालना उत्तम होता है ।।१२३-१२६।। अथ रक्तस्रावस्य साधनान्याह- एषु रोगेषु शृङ्गैर्र्वा जलौकाऽलाबुकैरपि । अथवापि सिरामोक्षैः कारयेद्रक्तपातनम् ।। १२७ ।। रक्तस्राव के साधन-उपर्युक्त सब रोगों में सींग, जोंक या तुम्बी लगवाकर अथवा सिरामोक्षण कराकर (नस कटवा कर) रक्त निकालना चाहिये ।।१२७।। अथ सिरामोक्षणानर्हजमानाह- न कुर्व्वीत सिरामोक्षं कृशस्यातिव्यवायिनः । क्लीवस्य भीरोर्गर्भिण्याः सूतायाः पाण्डुरोगिणः ।। पञ्चकर्मविशुद्धस्य पीतस्नेहस्य चार्र्शसाम् । सर्वाङ्गशोथयुक्तानामुदरश्वासकासिनाम् ।। १२९ ।। आघातात्स्रुतरक्तस्य सिरामोक्षो न शस्यते ।। १३१ ।। सिरामोक्षण के अयोग्य जन-जो लोग कृश शरीर वाले अथवा अधिक मैथुन करने वाले हों या नपुंसक वा डरपोक हों अथवा जो गर्भिणी या प्रसूता स्त्री हो किं वा जो पाण्डु रोगी हों या वमनादि पञ्चकर्म द्वारा शुद्ध हुए हों वा स्नेहपान किये हों वा जो अर्श (बवासीर), सर्वाङ्गशोथ, उदररोग, श्वास, खाँसी, वमन तथा अतीसार इनमें से किसी से युक्त हों या जिनको अधिक स्वेदन दिया जा चुका हो अथवा जो १६ वर्ष से कम या ७० वर्ष से अधिक अवस्था वाले हों किं वा जिनका चोट आदि लगने से रक्त निकल गया हो, ऐसे लोगों का सिरामोक्षण करना उचित नहीं होता है ।।१२८-१३१।। ❖ आघातात् स्रुतरक्तस्य=रक्तपित्तादिना च गतरक्तस्य ।। १२८-१३१।। यहाँ 'जिन्हें चोट आदि लगने से रक्त निकल गया हो' ऐसा कहने से 'रक्तपित्त आदि से भी जिनका रक्त निकल गया हो' उनका भी बोध करना चाहिये ।। १२८-१३१।। एषां चात्ययिके रोगे जलौकाभिर्वनिहरेत् । तथा च विषजुष्टानां सिरामोक्षो न शस्यते ।। १३१ ।। गोशृङ्गेण जलौकाभिरलावूभिरपि त्रिधा । वातपित्तकफैर्दुष्टं शोणितं स्रावयेद् बुधः ।। १३३ ।। द्विदोषाभ्यान्तु दुष्टं यत्त्रिदोषैरपि दूषितम् । शोणितं स्रावयेद्युक्त्या सिरामोक्षैः पदैस्तथा ।। १३४ ।। गृह्णाति शोणितं शृङ्गंदशाङ्गुलमितं बलात् । जलौका हस्तमात्रं तु तुम्बी तु द्वादशाङ्गुलम् ।।१३५।। पदमङ्गुलमात्रस्य सिरा सर्वाङ्गशोधिनी । शीते निरन्ने मूर्च्छान्निद्राभीतिमदश्रमैः ।। १३६ ।। युक्तानां न स्रवेद्रक्तं तथा विण्मूत्रसङ्गिनाम् । शोणिते चाप्रवृत्ते तु कुष्ठत्रिकटुसैन्धवैः ।। १३७ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
१०५० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे मर्दयेद् व्रणवक्त्रञ्च तेन रक्तं प्रवर्त्तते । तस्मान्न शीते नात्युष्णो नास्विन्ने नातितापिते ।।१३८।। पीत्वा यवागूं तृप्तस्य स्रावयेच्छोणितं बुधः । अतिस्विन्नस्योष्णकाले तथैवातिसिराव्यधात् ।।१३९।। अतिप्रवर्त्तते रक्तं तत्र कुर्यात्प्रतिक्रियाम् । अतिप्रवृत्ते रक्ते तु लोध्रसर्जरसाञ्जनैः ।।१४०।। यवगोधूमचूर्णैश्च धवधन्वनगैरिकैः । सर्पनिर्मोकचूर्णैर्वा भस्मना क्षौमवस्त्रयोः ।।१४१।। मुखं व्रणस्य बद्ध्वा च शीतैश्चोपचरेद् व्रणम् । विध्येदूर्ध्वसिरां तावद्दहेत्क्षारेण वह्निना ।।१४२।। व्रणं कषायः सन्धत्ते रक्तं स्कन्धयते हिमम् । व्रणास्यं पाचयेत्क्षारो दाहः सङ्कोचयेत्सिराः ।।१४३।। रक्ते दुष्टेऽवशिष्टेऽपि व्याधिर्नैव प्रकुप्यति । अतो रक्षेत्सावशेषं रक्ते नातिस्रुतिर्हिता ।।१४४।। इन सब रोगों में यदि रक्त निकालना अत्यन्त आवश्यक हो तो जोंक के द्वारा ही निकालना चाहिये । विष से युक्त रोगी को भी सिरामोक्षण करना उचित नहीं है । विद्वान् वैद्य को उचित है कि वह वात, पित्त तथा कफ से दूषित रुधिर को क्रम से गौ के सींग, जोंक तथा तुम्बी; इन तीन साधनों से निकाले । दो दोषों से या तीन दोषों से यदि रुधिर दूषित हो तो उसे युक्तिपूर्वक गौ के सींग आदि से या सिरामोक्षण से या पछना लगाने के द्वारा निकाल दे । सींगी-बलपूर्वक १० अङ्गुल तक का रक्त खींच लेती है, जोंक-एक हाथ तक का, तुम्बी-१२ अङ्गुल तक का, पछना-लगाना-एक अङ्गुल तक का एवं सिरामोक्षण-सर्वाङ्ग का रक्त निकाल कर शुद्ध करता है । शीतकाल में तथा अन्न भोजन न करने पर रक्तस्राव भलीभाँति नहीं होता है । मूर्च्छा, निद्रा, भय, मद तथा श्रम से युक्त होने पर या मल तथा मूत्र के वेग का अवरोध होने पर भी रुधिरस्राव भलीभाँति नहीं होता है । ऐसी अवस्था में कूट, सोंठ, पीपर, मरिच, सेंधा नमक का बारीक चूर्ण घाव के मुख पर रगड़ देने से रक्तस्राव उत्तम रीति से होने लगता है । अतएव जब अत्यन्त शीत अथवा अत्यन्त गर्मी पड़ती हो तब रक्तस्राव कराना उचित नहीं होता है । जिसे स्वेद न दिया गया हो तथा जिसका शरीर अत्यन्त तप्त किया हो उसे भी रक्तस्राव कराना निषिद्ध है । रोगी को यवागू पिलाकर तृप्त कर चुकने के बाद बुद्धिमान वैद्य रक्त निकालना प्रारम्भ करें । अत्यन्त स्वेदन जिसका हुआ हो या गर्मी की ऋतु हो अथवा अत्यन्त जिसके सिराओं का वेध हुआ हो अर्थात् अधिक नस कटा हो उसे अत्यन्त रुधिर बहने लगता है, उस समय उसे रोकने के लिये उपाय करना चाहिये । उपाय- अधिक रक्त का प्रवाह होने पर लोध, राल, रसौत के चूर्ण से वा जौ तथा गेहूँ के आटा से किंवा धाय, धामिन तथा गेरू के चूर्ण से अथवा साँप की केंचुल के चूर्ण से या महीन सूती वस्त्र वा रेशमी वस्त्र के भस्म से व्रण के मुख को रूँध कर शीतल उपचार करे । जिस सिरा से रक्त अधिक बह रहा हो उससे ऊपर की सिरा का पुनः वेध कर दे अर्थात् काट दे अथवा रक्त निकलने वाले स्थान को क्षारद्वारा या अग्निद्वारा जला दे । बिधे हुये स्थान पर कषाय रसयुक्त ओषधि का प्रयोग करने से व्रण का मुख बन्द हो जाता है । शीतल उपचार से रक्त जम जाता है । क्षार का प्रयोग करने से व्रण का मुख पक जाता है । जलाने से सिराओं का मुख सङ्कुचित हो जाता है । यदि उक्त रीति से रक्त निकालने पर भी कुछ दूषित रक्त अवशिष्ट रह जाय तो उससे व्याधि पुनः प्रकुपित नहीं हो सकती है, अतः दूषित रक्त का कुछ अवशिष्ट रहना उचित ही होता है, क्योंकि अत्यन्त रक्त का निकलना हितकर नहीं होता ॥ अथातिस्रुतरक्तस्य दोषानाह- आन्ध्यमाक्षेपकं तृष्णां तिमिरं शिरसो रुजः । पक्षाघातं श्वासकासौ हिक्कादाहौ च पाण्डुताम् ।। कुरुतेऽतिस्रुतं रक्तं मरणं वा करोति च ।।१४५।। अधिक रक्त निकलने के दोष-अधिक रक्त निकलने पर अन्धापन, आक्षेपकवात, प्यास, तिमिर रोग, सिर- सम्बन्धी रोग, पक्षाघात, श्वास, हिचकी, दाह तथा पाण्डुरोग ये सब उत्पन्न होते हैं, अन्त में मृत्यु तक भी हो जाती है ।।१४५।। अथासृग्रक्षणे हेतुमाह- देहस्योत्पत्तिरसृजा देहस्तेनैव धार्यते । रक्तं जीवस्य चाधारस्तस्माद्रक्षेदसृग्बुधः ।।१४६।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ षष्ठं धूमपानादिविधिप्रकरणम् १०५१ रुधिर की रक्षा करने का कारण-शरीर की उत्पत्ति रक्त से ही हुई है तथा रक्त ही शरीर को धारण किये रहता है तथा यही जीवन का आधार भी है, अतः बुद्धिमान पुरुष को इसकी रक्षा अवश्य करनी चाहिये ॥१४६॥ अथ स्रुतरक्तस्य कुपिते वायौ चिकित्सामाह- शीतोपचारैः कुपिते स्रुतरक्तस्य मारुते। कोष्णेन सर्पिषा शोथं सव्यथं परिषेचयेत् ।।१४७।। क्षीणस्यैणशशोरभ्रहरिणच्छागमांसजः। रसः समुचितः पाने क्षीरं षष्टिकया हितम् ।।१४८।। रक्त के अधिक निकल जाने पर वायु के कुपित होने की चिकित्सा-रक्त के अधिक निकलने पर उसे बन्द करने के लिये शीतल उपचार करने से वायु के कुपित होने पर पीड़ा युक्त शोथ के ऊपर किंचिद् गर्म-गर्म घृत का सेचन करना चाहिये। रक्तस्राव होने से क्षीण हुये रोगी को काला हरिन, खरगोश, भेड़, हरिन तथा बकरे का मांसरस (सुरुवा) पिलाना एवं साठी चावल के साथ भोजन में दूध देना हितकर होता है ॥१४७-१४८॥ अथ सम्यङ्निःस्रुतरक्तवतो लक्ष्णमाह- पीडाशान्तिर्लघुत्वं च व्याध्युपद्रवसंक्षयः। मनःस्वास्थ्यं भवेच्चिह्नं सम्यङ्निःसारितेऽसृजि। उत्तम रीति से रक्तस्राव के लक्षण-पीड़ा का शान्त होना, शरीर हल्का होना, रोग के उपद्रवों का नाश तथा मन का स्वस्थ होना, ये सब लक्षण रक्त के उचित रीति से निकालने पर प्रकट होते हैं ॥१४९॥ रक्तस्राविणां वर्ज्यविषयानाह- व्यायाममैथुनक्रोधशीतस्नानप्रवातकान्। एकाशनं दिवानिद्रा क्षाराम्लकटुभोजनम् ।।१५०।। शोकं वादामजीर्णञ्च त्यजेदा बलदर्शनात् ।।१५१।। जिसे रक्तस्राव कराया गया है उसके लिये त्याग करने योग्य कार्य-कसरत, मैथुन, क्रोध, शीतल जल से स्नान, अधिक वायु के झोके का सेवन, एक समय भोजन करना, दिन में सोना, खारा, खट्टा तथा कटु रस युक्त पदार्थों का भोजन, शोक, वाद-विवाद (बहस), अजीर्ण (अपरिपक्व भोजन अथवा अजीर्ण होना) इन सबों को रक्तस्राव कराने पर जब तक भलीभाँति शरीर में बल का संचार न हो जाय तब तक के लिये छोड़ देना चाहिये ॥१५०-१५१॥ अथ नेत्रस्वच्छकारिणीः क्रिया आह- सेक आश्चर्योतनं पिण्डी विडालस्तर्पणं तथा। पुटपाकोऽञ्जनं चैभिः कल्पैर्नेत्रमुपाचरेत् ।।१५२।। नेत्र को 'स्वच्छ करने की क्रियायें'-(१) सेक (नेत्र के ऊपर जल आदि का धारा डालना), (२) आश्च्योतन (ओषधियों के रस की बूँदें डालना), (३) पिण्डी (ओषधियों की लुगदी बाँधना), (४) विडाल (लेप करना), (५) तर्पण (तृप्त करने के लिये नेत्रों में घी आदि भरना), (६) पुटपाक (पुटपाक की रीति से परिपक्व ओषधियों का रस नेत्र में डालना), (७) अञ्जन (सुरमे आदि का आँजन देना) इन सब विधानों से नेत्र की चिकित्सा करनी चाहिये ॥१५२॥ तत्रादौ सेकविधिमाह- सेकस्तु सूक्ष्मधाराभिः सर्वस्मिन्नयने हितः। भीलिताक्ष्यस्य भर्त्यस्य प्रदेयश्चतुरङ्गुलः ।।१५३।। स सस्नेहो भवेद्वाते पित्ते रक्ते च रोपणः। लेखनस्तु कफे कार्यस्तस्य मात्राऽभिधीयते ।।१५४।। षड्भिर्वाचां शतैः स्नेह चतुर्भिश्चैव रोपणे। तैस्त्रिभिर्लेखने कार्यः सेको नेत्रप्रसादने ।।१५५।। निमेषोन्मेषणं पुंसामङ्गुल्या छोटिकाऽथ वा। गुवक्षरोच्चारणं वा वाङ्मात्रेयं स्मृता बुधैः ।। सेकस्तु दिवसे कार्यो रात्रौ चात्यन्तिके गदे। एरण्डस्य दलैः पिष्टैः पक्वमाजं पया हितम् ।। सुखोष्णं नेत्रयोः सिक्तं वाताभिष्यन्दनाशनम् ।।१५७।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
१०५२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे सेंक करने की विधि-पलक बन्द किये हुये रोगी के नेत्रों के ऊपर चार अङ्गुल के ऊपर से पतली धार छोड़ते रहने को 'सेंक' कहते हैं, यह सर्वत्र नेत्रों के लिये हितकर होता है। यह सेंक वातजनित नेत्रविकारों में स्नेह (घृतादि) से करना चाहिये और पित्त तथा रक्तजन्य विकारों का रोपणकारक पदार्थों के रस से एवं कफजन्य विकारों में लेखनकारक पदार्थों के रस से सेंक करना चाहिये। स्नेह पदार्थों से यदि सेंक करना हो तो छः सौ वाङ्मात्रा तक, रोपण सेंक में चार सौ वाङ्मात्रा तक एवं लेखन सेंक में तीन सौ वाङ्मात्रा तक सेंक करना चाहिये। उस समय तक सेंक करने से नेत्र स्वच्छ हो जाता है। पण्डितों ने वाङ्मात्रा का काल इस प्रकार कहा है कि पुरुष जितने समय में पलक बन्द कर पुनः खोलता है या चुटकी बजाता है अथवा एक गुरु (आ आदि) अक्षर का उच्चारण करता है, उतने समय को 'वाङ्मात्रा' समझनी चाहिये अर्थात् पलक बन्द आदि करने में जितना समय लगता है, उतने ही समय की एक वाङ्मात्रा होती है। सेंक सर्वदा दिन में ही करना चाहिये, किन्तु यदि प्राण को सङ्कट में डालने वाला रोग हो तो रात्रि में भी कर लेना चाहिये। एरण्ड के पत्तों का कल्क बनाकर उसके साथ बकरी का दूध पकाये, पश्चात् किंचित्-किंचित गर्म रहते ही उक्त दूध से दोनों नेत्रों में सेक (सेवन) करने से वातसम्बन्धी अभिष्यन्द (नेत्र रोग) दूर होता है, अत एव उक्त दूध का सेंक अत्यन्त हितकर होता है ॥१५३-१५७॥ अथाश्च्योतनविधिमाह- क्वाथक्षौद्रासवस्नेहबिन्दूनां यत्तु पातनम्। द्व्यङ्गुलोन्मीलिते नेत्रे प्रोक्तमाश्च्योतनं हितम् ।।१५८।। बिन्दुवोऽष्टौ लेखनेषु रोपणे दश बिन्दवः । स्नेहने द्वादश प्रोक्तास्ते शीते कोष्णरूपिणः ।।१५९।। उष्णे तु शीतरूपाः स्युः सर्वत्रैवैष निश्चयः। वाते तिक्तं तथा स्निग्धं पित्ते मधुरशीतलम् ।।१६०।। कफे तिक्तोष्णरूक्षं च क्रमादाश्च्योतनं हितम् । आश्च्योतनानां सर्वेषां मात्रा स्याद्वाक्छतोन्मिता ।।१६१।। ततः परं लोचनाभ्यां भेषजानामयोगतः । आश्च्योतनं न कर्तव्यं निशायां केनचित्क्वचित् ।।१६२।। आश्च्योतन की विधि-रोगी के नेत्रों को दो अंगुल चौड़ा खोल कर उसमें क्वाथ, शहद, आसव वा स्नेह (घृत) को बूँद-बूँद कर जो डाला जाता है, उसी को 'आश्च्योतन' कहते हैं। यह नेत्ररोग में हितकर होता है। यदि लेखन क्रिया करनी हो तो आश्च्योतन की मात्रा आठ बूँद की है। रोपण किया में दश बूँद की एवं स्नेहन क्रिया में बारह बूँद की आश्च्योतन की मात्रा है। शीत के कारण से यदि नेत्ररोग हुआ तो किञ्चित् किञ्चित् गर्म क्वाथ आदि की बूँदें' डालनी चाहिये और यदि गर्मी के कारण से हुआ हो तो शीतल क्वाथ की बूँदें' डालनी चाहिये। यह नियम सर्वत्र के लिये निश्चित है। वात सम्बन्धी नेत्ररोग में तिक्त रसयुक्त तथा स्नेह पदार्थों का आश्च्योतन हितकर होता है। पित्तसम्बन्धी नेत्ररोग में मधुर रसयुक्त तथा शीतल पदार्थों का आश्च्योतन एवं कफसम्बन्धी नेत्ररोग में तिक्त रसयुक्त, उष्ण तथा रूक्ष पदार्थों का आश्च्योतन हितकर है। प्रत्येक आश्च्योतन की मात्रा जितने समय में १०० गुरु अक्षरों का उच्चारण होता है, उतने समय की जाननी चाहिये। इसके बाद अर्थात् १०० मात्रा का समय बीत जाने पर आश्च्योतन करना नेत्रों के लिये अयोग्य होता है। किसी भी वैद्य को यह उचित नहीं है कि वह रात्रि में कभी भी आश्च्योतन करे ।।१५८-१६२।। तद्यथा- बिल्वादिपञ्चमूलेन बृहत्येरण्डशिग्रुभिः । क्वाथ आश्च्योतने कोष्णो वाताभिष्यन्दनाशनः ।।१६३।। आश्च्योतन की ओषधियाँ जैसे कि बेल आदि पञ्चमूल, कटेरी, एरण्ड तथा सहिजन का क्वाथ बना कर किञ्चित् गर्म रहते ही उसका आश्च्योतन में प्रयोग करना वातसम्बन्धी अभिष्यन्द (नेत्ररोगविशेष) को दूर करने वाला होता है ।।१६३।। अथ पिण्डिकाविधिमाह- युक्तभेषजकल्कस्य पिण्डी कवलमात्रया । वस्त्रखण्डेन सम्बद्धा नेत्रेऽभिष्यन्दनाशिनी ।।१६४।। स्निग्धोष्णा पिण्डिका वाते पित्ते सा शीतला मता । रूक्षोष्णा श्लेष्मणि प्रोक्ता विधिरुक्तो बुधैरयम् ।।१६५।।
अथ षष्ठं धूमपानादिविधिप्रकरणम् १०५३ पिण्डी की विधि-यथायोग्य ओषधियों का कल्क बनाकर उससे एक ग्रास की मात्रा लेकर टिकिया बना ले । पश्चात् उस टिकिये को एक वस्त्र के टुकड़े से आँखों पर बाँध देने को 'पिण्डी' कहते हैं । यह अभिष्यन्द को दूर करने वाली होती है । वात-सम्बन्धी नेत्र रोग में स्निग्ध तथा उष्ण, पित्त सम्बन्धी रोग में शीतल एवं कफ सम्बन्धी नेत्ररोग में रूक्ष तथा उष्ण पिण्डी (टिकिया) बाँधने की विधि पण्डितों ने बताई है ।।१६४-१६५।। सा यथा- एरण्डपत्रमूलत्वङ्निर्मिता वातनाशिनी । धात्रीविरचिता पित्ते शिग्रुपत्रकृता कफे ।। १६६ ।। पिण्डी बनाने की ओषधिया-वात-सम्बन्धी नेत्ररोग में एरण्ड के पत्ते, मूल तथा छिलकों की पिण्डी, पित्तसम्बन्धी नेत्ररोग में आंवले की एवं कफ सम्बन्धी नेत्ररोग में सहजने के पत्तों की पिण्डी बनानी चाहिये ।।१६५।। अथ विडालकविधिमाह- विडालको बहिर्लेपो नेत्रपक्ष्मविवर्जितः । तस्य मात्रा परिज्ञेया मुखालेपविधानवत् ।। १६७ ।। यष्टीगैरिकसिन्धूत्थदार्वीताक्ष्र्यैः । जलपिष्टैर्बहिर्लेपः सर्वनेत्रामयापहः ।। १६८ ।। विडालकविधि-पलकों को छोड़कर नेत्र के बाहरी भाग पर जो ओषधियों का लेप किया जाता है, उसी को 'विडालक' कहते हैं । इस (विडालक) लेप की मात्रा मुख पर जो लेप किया जाता है, उसके समान ही समझनी चाहिये । मुलहठी, गेरू, सेंधानमक, दारु हलदी, रसवत, इन सबों की समान भाग में लेकर जल के साथ पीस कर नेत्र के बाहरी भाग पर लेप करने से सम्पूर्ण नेत्र सम्बन्धी रोग नष्ट होते हैं ।।१६७-१६८।। अथ तर्पणविधिमाह- वातातपरजोहीने वेश्मन्युत्तानशायिनः । अभितो माषचूर्णेन क्लिन्नेन परिपिण्डितौ ।। १६९ ।। समौ दृढावसम्बाधौ कर्त्तव्यौ नेत्रकोशयोः । पूरयेद् घृतमण्डेन विलीनेन सुखोदकैः ।। १७० ।। सर्पिषा शतधौतेन क्षीरजेन घृतेन वा । निमग्नान्यक्षिपक्ष्माणि यावत्स्युस्तावदेव हि ।। १७१ ।। पूरयेन्मीलिते नेत्रे तत उन्मीलयेच्छनैः । भिषग्भिरेष विख्यातस्तर्पणस्योदितो विधिः ।। १७२ ।। तर्पण विधि-जिसमें हवा का झोंका न लगता हो तथा धूप एवं धूलि न आती हो, ऐसे स्वच्छ गृह में रोगी को उत्तान (चित्त) लिटाकर सने हुये उड़द के आटा की सीधी मजबूत मेड़री (घेरा) दोनों नेत्रों के चारों तरफ बना दे, उसके बाद रोगी के आँखों को बन्द करा कर उष्ण जल से पिघलाये हुये घी, सौ बार के धुले हुये घी अथवा दूध से निकाले हुये घी को पिघलाकर इतनी मात्रा में घेरे के अन्दर छोड़े कि जिसमें आँख की पलकें डूब जायें, उसके बाद धीरे से पलक को खुलवा दे । इसी को वैद्यों ने प्रसिद्ध तर्पण की विधि बतलाई है ।।१६९-१७२।। अथ तर्पणार्हनेत्राणां लक्षणान्याह- यद्रूक्षञ्च परिष्वन्दि नेत्रं कुटिलमाविलम् । शीर्णपक्ष्मसिरोत्पातकृच्छ्रोन्मीलनसंयुतम् ।। १७३ ।। तिमिरार्जुनशुक्लाद्यैरभिष्यन्दाधिमन्थकैः । शुष्काक्षिपाकशोथाभ्यां युतं वातविपर्ययैः ।। तन्नेत्रं तर्पयेत्सम्यङ् नेत्ररोगविशारदः ।। १७४ ।। तर्पण के योग्य नेत्रों के लक्षण-जो नेत्र रूक्ष हो गये हों या जिनसे पानी झरता हो वा कुटिल वा मटमैले हो गये हों तथा जिनके पलकों के रोयें गिर गये हों वा जो सिरा (नस) सम्बन्धी उत्पात से युक्त हों अर्थात् जिनकी नसें लाल होकर अत्यन्त पीड़ा करती हों या जिनकी पलकें बड़ी कठिनता से खुलती हों एवं जिन नेत्रों में तिमिर, अर्जुन, शुक्ल, अभिष्यन्द, अधिमन्थ, शुष्कनेत्र, नेत्रपाक, नेत्रशोथ, वातविपर्यय आदि रोग हो गये हों उन सबों में नेत्ररोग के ज्ञाता वैद्यजन भलीभाँति तर्पण विधि करें ।।१७३-१७४।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
१०५४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ रोगभेदेन तर्पणधारणकालभेदमाह- तर्पणं धारयेद्वर्त्मरोगे वाचां शतं बुधः। स्वस्थे कफे सन्धिरोगे वाचां पञ्च शतानि च।। षट्शतानि कफे कृष्णरोगे सप्त शतानि हि। दृष्टिरोगे शतान्यष्टावधिमन्थे सहस्त्रकम् ।।१७६।। सहस्रे वातरोगेषु धार्यमेव हि तर्पणम् ।।१७७।। रोगभेद से तर्पण धारण करने के काल का भेद-वर्त्म (बरौनी) गत रोग में जब तक १०० गुरु अक्षरों का उच्चारण हो तब तक, स्वस्थ कफ तथा सन्धि रोग में ५०० गुरु अक्षरों के उच्चारण तक, कफ में ६०० तक, कृष्ण (काली पुतली) गत रोग में ७०० तक, दृष्टिरोग में ८०० तक, अधिमन्थ तथा वातसम्बन्धी नेत्ररोग में १००० गुरु अक्षरों के उच्चारण तक तर्पण धारण कराना चाहिये ।।१७५-१७७।। पूर्णे चापाङ्गमार्गेण स्रावयित्वाऽक्षि शोधयेत्। स्विन्नेन यवपिष्टेन स्नेहवीर्येरितं ततः ।।१७८।। यथास्वं धूमपानेन कफमस्य विरेचयेत्। एकाहं वा त्र्यहं वापि पञ्चाहं तर्पणं चरेत् ।।१७९।। जब तर्पणधारण करने का काल पूर्ण हो जाय तब नेत्र के प्रान्त (कोर) मार्ग से भरे हुये घृतादि को गिरा दे, उसके बाद गूँदकर गर्म किये हुए जौ के आटे की पिण्डी से नेत्रों को पोंछ कर साफ कर डाले। तत्पश्चात् स्नेह के प्रयोग करने के प्रभाव से बढ़े हुये कफ का यथायोग्य ओषधियों के धूमपान द्वारा विरेचन करे। अर्थात् उसे निकाल देवे। इस भाँति एक दिन, तीन दिन या पाँच दिन तक तर्पण क्रिया करे ।।१७८-१७९।। अथ यथार्थतर्पणचिह्नमाह- तर्पणे तृप्तिलिङ्गानि नेत्रस्यैतानि लक्षयेत्। सुखस्वप्नावबोधत्वं वैशद्यं नेत्रपाटवम् ।। निर्वृतिर्व्याधिशान्तिश्च क्रियालाघवमेव च ।।१८०।। यथार्थ तर्पण के चिह्न-उचित रीति से तर्पण क्रिया होने पर सुखपूर्वक नींद आना तथा सुखपूर्वक जग जाना, नेत्रों में स्वच्छता तथा सामर्थ्य का होना एवं सुख मिलना, नेत्ररोग-शान्ति तथा नेत्रों की क्रिया में लघुता होना; ये सब नेत्रों के तृप्तिबोधक लक्षण प्रकट होते हैं ।।१८०।। ❖ निर्वृतिः=सुखम्। क्रियालाघवं=नेत्रस्य क्रियायां निमेषोन्मेषादौ लघुता ।।१८०।। यहाँ ‘निर्वृति’ पद का ‘सुख मिलना’ तथा ‘क्रियालाघव’ पद का ‘नेत्रों की क्रिया में अर्थात् पलक बन्द करने तथा खोलने में लघुता होना’ यह अर्थ समझना चाहिये ।।१८०।। अथातितर्पितहीनतर्पितयोर्लक्षणं प्रतीकारमयोग्यसमयं चाह- गुर्वाविलमतिस्निग्धमश्रुकण्डूपदेहवत्। घर्षतोदयुतं नेत्रमतितर्पितमादिशेत् ।।१८१।। शास्रावशोषरोगाढ्यमुपदेहसमाकुलम्। रूक्षमस्त्रावमरुणं नेत्रस्याद्धीनतर्पितम् ।।१८२।। अतितर्पित नेत्र के लक्षण-यदि तर्पण क्रिया करने पर नेत्रों में भारीपन, मैलापन तथा अत्यन्त स्निग्धता हो और आँसू बहना, खुजली होना तथा कफ से लिपटा हुआ मालूम पड़ना एवं घिसने के समान या सुई चुभने के समान पीड़ा होना; ये सब लक्षण प्रकट हों तो नेत्रों का अधिक मात्रा में तर्पण हुआ समझना चाहिये। हीनतर्पित नेत्र के लक्षण- यदि तर्पण क्रिया करने पर नेत्रों से पानी झरना, शोथ तथा पीड़ा अधिक होना, कफ से अधिक लिपटा हुआ मालूम पड़ना, रूक्षता, गीलापन न रहना तथा अधिक लाल रहना, ये सब लक्षण प्रकट हों तो तर्पणक्रिया हीनमात्रा में हुई है, यह समझना चाहिये ।।१८१-१८२।। अनयोर्दोषबाहुल्यात्प्रयतेत चिकित्सिते। रूक्षस्निग्धोपचाराभ्यामनयोः स्यात्प्रतिक्रिया ।।१८३।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ षष्ठं धूमपानादिविधिप्रकरणम् १०५५ अतितर्पित तथा हीनतर्पित नेत्रों का प्रतीकार-अतितर्पित तथा हीनतर्पित नेत्रों में दोषों की अधिकता होने से दोनों की चिकित्सा करने में विशेष प्रयत्नशील होना चाहिये। इन दोनों का प्रतीकार-क्रम से अतितर्पित नेत्र का रूक्षताकारक तथा हीनतर्पित नेत्र का स्निग्धताकारक उपचारों से करना चाहिये ॥१८३॥ ❖ अनयोः=अतितर्पितहीनतर्पितयोः ॥१८३॥ यहाँ 'अनयोः' पद का 'अतितर्पित तथा हीनतर्पित नेत्रों में' यह अर्थ समझना चाहिये ॥१८३॥ दुर्दिनात्युष्णशीतेषु चिन्तायां संभ्रमेषु च । अशान्तोपद्रवे चाक्षिण तर्पणं न प्रशस्यते ॥१८४॥ तर्पण क्रिया करने के लिये अयोग्य समय-जब बादल घिरे हुए हों या अत्यन्त गर्मी या सर्दी पड़ती हो वा रोगी के चित्त में चिन्ता या भय हो तथा उपद्रव शान्त होने के पहले नेत्रों में तर्पण क्रिया करना उचित नहीं होता है ॥१८४॥ अथ पुटपाकविधिमाह- द्वे बिल्वे स्निग्धमांसस्य परद्रव्यपलं मतम् । द्रव्यस्य कुडवोन्मानं सर्वमेकत्र पेषयेत् ॥१८५॥ तदेकत्र समालोड्य पत्रैः सुपरिवेष्टितम् । पुटपाकविधानेन तत्पक्त्वा तद्रसं बुधः ॥१८६॥ तर्पणोक्तेन विधिना यथावदवधारयेत् । दृष्टिमध्ये निषेच्यः स्यान्नित्यमुत्तानशायिनः ॥१८७॥ पुटपाक की विधि-स्नेह युक्त मांस २ पल (८ तोला), अन्य ओषधियाँ १ पल (४ तोला), द्रवपदार्थ ४ पल (१६ तोला) लेकर इन सबों को एकत्र पीस डाले पश्चात् गोला बनाकर उसके चारों तरफ पत्ते लपेट कर पुटपाक की विधि से अग्नि में रख पका डाले, उसके बाद वैद्य उक्त परिपक्व ओषधियों का रस निचोड़ कर तर्पण क्रिया में कही हुई विधि के अनुसार नेत्रों में भली प्रकार उक्त रस का प्रयोग करे, अर्थात् रोगी को उत्तान लिटाकर नेत्रों में उक्त रस को डाल कर जब तक उचित हो तब तक पड़ा रहने दे ॥१८५-१८७॥ अथ पुटपाकस्य भेदानाह- स्नेहनो लेखनश्चैव रोपणश्चेति स त्रिधा । हितःस्निग्धोऽतिरूंक्षस्य स्निग्धस्य स तु लेखनः ॥१८८॥ दृष्टेर्बलार्थमितरः पित्तासृग्व्रणवातनुत् ॥१८९॥ पुटपाक के भेद-पुटपाक तीन प्रकार का होता है- (१) स्नेहन, (२) लेखन, (३) रोपण। इनमें स्नेहन पुटपाक अत्यन्त रूक्ष नेत्रों के लिये और लेखन पुटपाक अत्यन्त स्निग्ध नेत्रों के लिये हितकारी होता है एवं रोपण पुटपाक दृष्टिशक्ति को बलवान् करने के लिये तथा पित्त और रक्त संबन्धी नेत्रविकार, व्रण एवं नेत्रगत वात दोष को दूर करने के लिये उत्तम होता है ॥१८८-१८९॥ ❖ इतरः=रोपणः ॥१८८-१८९॥ यहाँ 'इतर' पद का 'रोपण-पुटपाक' अर्थ समझना चाहिये ॥१८८-१८९॥ अथ स्नेहनादिपुटपाकानां धारणकालानाह- स्नेहमांसवसामज्जमेदःस्वाद्वौषधैः कृतः । स्नेहनः पुटपाकः स्याद्वायौं द्वे वाक्छते तु सः ॥१९०॥ जाङ्गलानां यकृन्मांसैर्लेखनद्रव्यसंयुतैः । कृष्णालोहरजस्ताम्रशङ्खविद्रुमसिन्धुजैः ॥१९१॥ समुद्रफेनकासीसस्रोतोऽञ्जदधिमस्तुभिः । लेखनो वाक्शतं तस्य परं धारणमिष्यते ॥१९२॥ स्तन्यजाङ्गलमध्वाज्यतिक्तद्रव्यविपाचितः । लेखनात्रिगुणो धार्यः पुटपाकस्तु रोपणः ॥१९३॥ स्नेहनादि पुटपाकों के धारण काल की अवधि-स्नेह, मांस, वसा, मज्जा, मेद तथा मधुर रस युक्त ओषधियों से बना हुआ जो पुटपाक होता है, वह स्नेहन कहलाता है, इसे २०० गुण अक्षरों के उच्चारण काल तक धारण करना चाहिये। जंगली जीवों का कलेजा तथा मांस, लेखनकारी ओषधियाँ, काले लोहे का सूक्ष्म चूर्ण, तामा, शंख तथा मूँगा CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
का चूर्ण, सेंधा नमक, समुद्रफेन, कसीस, काला सुरमा, बकरी के दही का पानी इन सब से बना हुआ जो पुटपाक होता है, वह लेखन कहलाता है, इसके धारण काल की अवधि १०० गुरु अक्षरों के उच्चारण करने तक की है। स्त्री का दूध, जाङ्गल जीवों का मांस, शहद, गाय का घी तथा पञ्चतिक्तक गणोक्त ओषधियाँ इन सबों से बने हुये पुटपाक को रोपण कहते हैं। इसके धारण काल की अवधि लेखन पुटपाक से तिगुनी है अर्थात् ३०० गुरु अक्षरों के उच्चारण करने तक की है ॥१९०-१९३॥ अथ तिक्तद्रव्याण्याह- निम्बामृतावृषपटोलनिदिग्धिकाभिः स्यात्पञ्चतिक्तक इति प्रथितो गणोऽयम् ॥१९४॥ तिक्तक द्रव्य-नीम, गिलोय, अडूसा, परवल और कटेरी, इनके गण पञ्चतिक्तक नाम से प्रसिद्ध हैं, रोपण पुटपाक में इसी का प्रयोग होता है ॥१९४॥ आचरेत्तर्पणोक्तां तु क्रियां व्यापत्तिदर्शने ॥१९५॥ उचित रीति से पुटपाक का प्रयोग न होने से उत्पन्न हुए रोग दिखाई पड़ने पर पूर्वोक्त तर्पण क्रिया की भाँति चिकित्सा करनी चाहिये ॥१९५॥ ❖ व्यापत्तिदर्शने=मिथ्याकृतपुटपाकजनितव्याधिदर्शने ॥१९५॥ यहाँ 'व्यापत्तिदर्शने' पद का 'उचित रीति से पुटपाक का प्रयोग न होने से उत्पन्न हुये रोग दिखलाई पड़ने पर' यह अर्थ समझना चाहिये ॥१९५॥ अथ तर्पणपुटपाकवतस्त्याज्यविषयानाह- तेजांस्यनिलमाकाशमादर्शं भास्वराणि च । नेक्षेत तर्पिते नेत्रे यश्च वा पुटपाकवान् ॥१९६॥ तर्पण तथा पुटपाक धारण किये हुये लोगों के लिये त्याग करने योग्य कार्य-जिनकी आँखों में तर्पण तथा पुटपाक क्रिया का प्रयोग हुआ हो वे तेज से युक्त पदार्थ, आकाश, दर्पण (शीशा) तथा चमकीली वस्तु की ओर एवं हवा जिस ओर से आती हो उस ओर भी न देखें ॥१९६॥ अथाञ्जनविधिमाह- अथ सम्यक्वदोषस्य प्राप्तमञ्जनमाचरेत् । अञ्जनं क्रियते येन तद् द्रव्यं चाञ्जनं मतम् ।। अञ्जन की विधि-दोषों के पक जाने पर नेत्रों में योग्य अञ्जन लगाना चाहिये । नेत्रों में जो आँजा जाता है वह अञ्जन कहलाता है ॥१९७॥ तद्यथा- रसो वटी तथा चूर्णमिति त्रिविधमञ्जनम् । यथापूर्वं बलं तेषु स्नेहमाहुर्मनीषिणः ॥१९८॥ तत्प्रत्येकं त्रिधा प्रोक्तं लेखनं रोपणं तथा । स्नेहनं चेति लिङ्गानि तेषां विस्तरतः शृणु ।। लेखनं क्षारतीक्ष्णाम्लरसैरञ्जनमुच्यते । नेत्रवर्त्मसिराजालश्रोत्रशृङ्गाटकस्थितम् ॥१९९॥ मुखनासाऽक्षिभिर्दोषमुत्विलश्य स्रावयेच्च तत् । कषायं तिक्तकं चापि सस्नेहं रोपणं मतम् ॥२००॥ स्नेहस्य शैत्याद्धर्ण्य स्याद् दृष्टेश्च बलवर्द्धनम् । मधुरं स्नेहमण्डं तदञ्जनं स्यात्प्रसादनम् ॥२०१॥ दृष्टिदोषप्रसादार्थं स्नेहनार्थञ्च तद्धितम् । हरेणुमात्रावर्त्तिस्तु लेखनी स्यात्प्रमाणतः ॥२०२॥ सार्द्धहरेणुकामिता रोपणी वर्त्तिरिष्यते । क्रियते स्नेहनी वर्त्तिर्द्विहरेणुकमात्रया ॥२०३॥ अञ्जन के तीन भेद हैं। रसरूप, वर्त्तिरूप और चूर्णरूप इनमें चूर्ण से वर्त्ति और वर्त्ति से रस बलवान है। प्रत्येक अञ्जन के लेखन, रोपण तथा स्नेहन, इस भाँति तीन-तीन भेद हैं। इनमें जो खारा, तीक्ष्ण तथा खट्टे रस वाला अञ्जन
अथ षष्ठं धूमपानादिविधिप्रकरणम् १०५७ होता है वह लेखन अञ्जन कहलाता है । यह अञ्जन नेत्रों में, पलकों में, सिराओं में, कान में और कपाल की हड्डी में स्थित दोषों को स्थान से गिरा कर मुख, नाक और नेत्रों से निकाल देता है । कषाय, कटु रस वाला और स्नेहयुक्त जो अञ्जन होता हैं; वह रोपण कहलाता है । यह स्नेह-स्निग्ध तथा शीतल होने के कारण वर्ण को उत्तम करता है और दृष्टि के बल को बढ़ाता है । मधुर रस वाला तथा स्नेहयुक्त जो अञ्जन होता है वह प्रसादन कहलाता है । स्नेहन अञ्जन दृष्टि- दोष को शुद्ध करने के लिये तथा दृष्टि को स्निग्ध करने के लिये उपयोगी है । लेखनी वर्त्ति एक मटर के बराबर और रोपणी वर्त्ति डेढ़ मटर के बराबर तथा स्नेहनी वर्त्ति दो मटर के बराबर बनानी चाहिये ।।१९८-२०३।। रसाञ्जनस्य मात्रा तु पिष्टवर्त्तिमिता मता । चूर्णं तु लेखनं वैद्यैर्द्विशलाकं प्रदीयते ।। रोपणं त्रिशलाकं स्याच्चतस्रः स्नेहनाञ्जने ।।२०४।। रसरूप अञ्जन की मात्रा एक पिष्टवर्त्ति के बराबर बनानी चाहिये । यदि वैद्य को लेखन चूर्ण आँजना हो तो दो सलाई आँजना चाहिये । रोपण चूर्ण तीन सलाई और स्नेहन चूर्ण चार सलाई आँजना चाहिये ।।२०४।। ❖ चतस्रः शलाकाः स्नेहनाञ्जने चूर्णे ।।२०४।। यहाँ 'चतस्रः स्नेहनाञ्जने' पदों का 'स्नेहन चूर्ण चार सलाई आँजनी चाहिये' यह अर्थ समझना चाहिये ।।२०४।। मुखयोर्मुकुलाकारा कलायपरिमण्डला । अष्टाङ्गुला शलाका स्यादश्मजा धातुजाऽथ वा ।।२०५।। अञ्जन लगाने की सलाई-दोनों सिरों में कली के समान आकार वाली, आगे के भाग में मटर के समान गोल, आठ अंगुल लम्बी, पत्थर की या धातु की होनी चाहिये ।।२०५।। ❖ कलायपरिमण्डला=अग्रे कलायवद्वर्त्तुला ।।२०५।। यहाँ 'कलायपरिमण्डला' पद का 'आगे के भाग में मटर के समान गोल' यह अर्थ करना चाहिये ।।२०५।। ताम्रलोहाश्मसञ्जाता शलाका लेखने मता । सुवर्णरजतोद्भूता स्नेहने समुदाहृता ।।२०६।। अङ्गुली च मृदुत्वेन रोपणे सम्प्रयुज्यते । कृष्णभागावधिं लिम्पेदपाङ्गं यावदञ्जनम् ।।२०७।। हेमन्ते शिशिरे चैव मध्याह्नेऽञ्जनमिष्यते । पूर्वाह्ने वाऽपराह्ने वा ग्रीष्मे शरदि चेष्यते ।।२०८।। वर्षास्वनभ्रे नात्युष्णे वसन्ते तु सदैव हि । अथ वा सर्वदा प्रातः सायं वाऽञ्जनमाचरेत् ।।२०९।। नातिशीतोष्णवाताभ्रवेलायां तत्प्रयुज्यते । श्रान्तेऽथ रुदिते भीते पीतमद्ये नवज्वरे ।।२१०।। अजीर्णे वेगघाते च नाञ्जनं सम्प्रयुज्यते । रागोपदेहौ तिमिरं शूलं संरम्भमेव च ।।२११।। निद्राक्षयञ्च कुरुते निषिद्धे युक्तमञ्जनम् ।।२१२।। यदि लेखन चूर्ण लगाना हो तो ताँबे की या लोहे की अथवा पत्थर की सलाई होनी चाहिये । स्नेहन चूर्ण आँजना हो तो सोने की अथवा चाँदी की सलाई होनी चाहिये । रोपण चूर्ण आँजना हो तो अंगुली से आँजना चाहिये क्योंकि अङ्गुली कोमल होती है । अञ्जन लगाना हो तो काली पुतली के नीचे से नेत्र के कोने तक आँजे । हेमन्त और शिशिर ऋतु में मध्याह्न के समय अञ्जन आँजना चाहिये । ग्रीष्म ऋतु और शरद् ऋतु में पूर्वाह्न समय अथवा अपराह्न समय में अञ्जन आँजना चाहिये । वर्षा ऋतु में जिस समय बादल न हो और बहुत गरमी न हो उस समय आँजना चाहिये । वसन्त ऋतु में जब इच्छा हो तब अञ्जन लगावे । अथवा सर्वदा प्रातः-सायं अञ्जन लगाना चाहिये । अत्यन्त शीतलता, उष्णता, वायु तथा बादल के समय अञ्जन नहीं लगाना चाहिये । थका हुआ, रुदन किया हुआ, डरा हुआ, मदिरा पीया हुआ, नवीन ज्वरवाला, अजीर्ण युक्त और जिसने मलमूत्र के वेग को रोका हो; इन सब को अञ्जन नहीं लगाना चाहिये । यदि उपर्युक्त व्यक्ति अञ्जन लगायें तो उनके नेत्रों में लाली होती है, नेत्रों में सूजन आ जाती है, तिमिर, शूल तथा दोषों का कोप होता है और निद्रा का नाश होता है ।।२०६-२१२।। ७० भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
१०५८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ लेखनकारिणी वर्त्तिमाह- शङ्खनाभिर्बिभीतस्य मज्जा पथ्या मनःशिला । पिप्पली मरिचं कुष्ठं वचा चेति समांशकम् ।।२१३।। छागक्षीरेण सम्पेष्य वर्त्ति कुर्याद्यवोन्मिताम् । हरेणुमात्रां सम्पिष्य जलैः कुर्याद्यथाऽञ्जनम् ।।२१४।। तिमिरं मांसवृद्धिञ्च काचं पटलमर्बुदम् । रात्र्यन्धं वार्षिकं पुष्पं वर्त्तिश्चन्द्रोदया हरेत् ।।२१५।। इति चन्द्रोदया वर्त्तिर्लेखनी । लेखनकारिणी वर्त्ति—शंख की नाभि, बहेड़े की मींगी, हरड़, मैनशिल, पीपरि, काली मिर्च, कूठ और वच समान भाग लेकर बकरी के दूध में पीस कर जौ के समान बत्ती बनावे । इस बत्ती को पानी में घिसकर योग्य रीति से आँजने से तिमिर, मांसवृद्धि, काच, पटल, अर्बुद, रतौंधी और एक वर्ष का फूला नष्ट हो जाता है । इस बत्ती का नाम चन्द्रोदया वर्त्ति है । यह लेखन कारिणी है ॥२१२-२१५॥ अशीतिस्तिलपुष्पाणि षष्टिः पिप्पलितण्डुलाः । जातीपुष्पाणि पञ्चशन्मरिचानि तु षोडश ।।२१६।। सूक्ष्मं पिष्ट्वाऽम्बुना वर्त्तिः कृता कुसुमिकाऽभिधा । तिमिरार्जुनशुक्लानां नाशिनी मांसवृद्धिनुत् । एतस्या अञ्जने प्रोक्ता मात्रा सार्धहरेणुका ।।२१७।। रोपणकारिणी वर्त्ति—८० तिल के फूल, ६० पीपल के बीज, ५० चमेली के फूल और १६ दाने मिर्च पानी में बारीक पीस कर जो बत्ती बनाई जाती है, वह कुसुमिका वर्त्ति कहलाती है । यह वर्त्ति-तिमिर, अर्जुन तथा फूल और मांसवृद्धि को दूर करती है । इस वर्त्ति की आँजने में डेढ़ मटर के बराबर मात्रा कही गई है । यह कुसुमिका वर्त्ति रोपणकारिणी है ॥२१६-२१७॥ अथ स्नेहनकारिणी वर्त्तिमाह- धात्र्यक्षपथ्याबीजानि एकद्वित्रिगुणानि च । पिष्ट्वा वर्त्ति मलैः कुर्यादञ्जनं द्विहरेणुकम् ।।२१८।। नेत्रस्रावं हरत्याशु वातरक्तरुजं तथा ।।२१९।। स्नेहनकारिणी वर्त्ति—आँवले की मींगी १ भाग, बहेड़े की मींगी २ भाग, हर्रे की मींगी ३ भाग, इनको पानी में पीसकर दो मटर के बराबर नेत्रों में लगायें । इसके प्रयोग से नेत्रों से पानी गिरना तथा वातरक्तजन्य विकार नष्ट हो जाते हैं ॥२१८-२१९॥ अथ लेखनकारिणी रसक्रियामाह- तुत्थमाक्षिकसिन्धूत्थाः सिताशङ्खमनःशिलाः । गैरिकं सिन्धुफेनञ्च मरिचं चेति चूर्णयेत् ।।२२०।। संयोज्य मधुना कुर्यादञ्जनार्थं रसक्रियाम् । वर्त्मरोगार्मतमिरकाचशुक्लहरीं पराम् ।।२२१।। लेखनकारिणी रसक्रिया—नीलाथोथा (तूतिया), सोनामाखी, सेंधामनक, शक्कर, शंख का चूर्ण, मैनशिल, गेरू, समुद्रफेन और काली मिर्च; इनको खूब पीसकर मधु में मिलाकर आँजने से पलकों के रोग, अर्म, तिमिर, काच और शुक्ल रोग का बहुत शीघ्र नाश होता है ॥२२०-२२१॥ अथ रोपणी रसक्रियामाह- रसाञ्जनं सर्जरसो जातिपुष्पं मनःशिला । समुद्रफेनो लवणं गैरिकं मरिचं तथा ।।२२२।। एतत्समांशं मधुना पिष्टं प्रक्लिन्नवर्त्मने । अञ्जनं क्लेदकण्डूघ्नं पक्ष्मणाञ्च प्ररोहणम् ।।२२३।। रोपणी रसक्रिया—रसौत, राल, चमेली के फूल, मैनशिल, समुद्रफेन, सेंधा नमक, गेरू और कालीमिर्च; इन सबको समान भाग लेकर शहद में खूब बारीक पीसकर पलकों पर लगाने से पलकों का गीलापन तथा खुजली नष्ट होती है और पलकों के गिरे बाल फिर से उगने लगते हैं ॥२२२-२२३॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ षष्ठं धूमपानादिविधिप्रकरणम् १०५९ अथ स्नेहनकारिणीं रसक्रियामाह- कतकस्य फलं घृष्ट्वा मधुना नेत्रमञ्जयेत् । ईषत्कर्पूरसहितं स्मृतं नेत्रप्रसादनम् ।। २२४ ।। स्नेहनकारिणी रसक्रिया-निर्मली के फल तथा थोड़े कपूर को शहद में घिसकर आँजने से नेत्र स्निग्धतापूर्वक स्वच्छ हो जाते हैं ।। २२४ ।। अथ लेखनचूर्णमाह- दक्षाण्डत्वक्शिलाकाचशङ्खचन्दनसैन्धवैः । अञ्जनं हरते नित्यं सर्वानक्षिगदान्बलात् ।। २२५ ।। लेखन चूर्ण-मुरगे के अण्डे का छिलका, मैनशिल, काच, शंख, चन्दन तथा सेंधानमक का चूर्ण करके नित्य आँजने से लाचार होकर सम्पूर्ण नेत्रविकार नष्ट हो जाते हैं ।। २२५ ।। ❖ दक्षः=कुक्कुटः । तथा च निघण्टुः- 'कृकवाकुस्तथा दक्षः कालज्ञोऽथ शिखण्डिकः' इति ।। २२५ ।। यहाँ 'दक्ष' पद का 'कुक्कुट' अर्थात् 'मुरगा' अर्थ समझना चाहिये। क्योंकि निघण्टु में 'कृकवाकु' आदि मुरगे के संस्कृत नामों के मध्य में 'दक्ष' का पाठ है ।। २२५ ।। अथ रोपणचूर्णमाह- शिलायां रसकं पिष्ट्वा सम्यगाप्लाव्य वारिणा । गृह्णीयात्तज्जलं सर्वं त्यजेच्चूर्णमधोगतम् ।। २२६ ।। शुष्कं तच्च जलं सर्वं पर्पटीसन्निभं भवेत् । विचूर्ण्य भावयेत्सम्यक्त्रिवेलं त्रिफलारसैः ।। २२७ ।। कर्पूरस्य रजस्तत्र दशांशेन निक्षिपेत् । अञ्जयेन्नयनं तेन सर्वदोषप्रशान्तये । २१८ ।। समस्तनेत्ररोगघ्नं चूर्णमेतन्न संशयः ।। २२८ ।। रोपण चूर्ण-पत्थर के खरल में खपरिया को घोंट कर पानी में भलीभाँति भिगो दें, तत्पश्चात् उसके ऊपर के जल को निथार ले तथा नीचे के चूर्ण को फेंक दे इस जल को सुखावे जब यह पपड़ी के समान हो जाय तब उसका चूर्ण कर ले फिर हर्रा, बहेड़ा और आँवले की तीन भावना दे और फिर दशमांश कपूर का चूर्ण मिला दे। इस चूर्ण के आँजने से सम्पूर्ण दोषों की शान्ति होती है तथा नेत्रों के सम्पूर्ण रोग निःसन्देह नष्ट हो जाते हैं ।। २२६-२२८ ।। अथ स्नेहनचूर्णमाह- अग्नितप्तं हि सौवीरं निषिञ्चेत्रिफलारसैः । सप्तवेलं तथा स्तन्यैः स्त्रीणां सिक्तं विचूर्णितम् ।। २२९ ।। अञ्जयेत्तेन नयने प्रत्यहं चक्षुषोर्हितम् । सर्वानक्षिविकारांस्तु हन्यादेतन्न संशयः ।। २३० ।। स्नेहन चूर्ण-सफेद सुरमे को अग्नि में तपा तपा कर सात बार स्त्री के दूध में बुझावे। इस प्रकार यह शुद्ध सुरमे का अञ्जन नेत्रों को हितकारी होता है तथा नेत्रसम्बन्धी सम्पूर्ण विकारों का निःसन्देह नाश करता है ।। २२९-२३० ।। ❖ सौवीरं=श्वेतमञ्जनम् ।। २२९-२३० ।। यहाँ 'सौवीर' पद का 'सुफेद सुरमा' अर्थ समझना चाहिये ।। २२९-२३० ।। अथ प्रत्यञ्जनसेवनविधिमाह- गतदोषमपेताश्रु प्रपश्यत्सम्पगम्भसि । प्रक्षाल्याक्षि यक्षाल्याक्षि यथादोषं कार्यं प्रत्यञ्जनं ततः ।। २३१ ।। न वा निर्वातदोषेऽक्षिधावनं सम्प्रयोजयेत् । प्रत्यञ्जनं तत्र दद्याच्चूर्णं तीक्ष्णप्रसादनम् ।। २३२ ।। प्रत्यञ्जन सेवन विधि-नेत्रों के दोष दूर होने के पश्चात् आँसू निकल जाने पर तथा नेत्रों में देखने की शक्ति आ जाने पर नेत्रों को जल से धो डालना चाहिये। तत्पश्चात् दोषों को निःशेष करने के लिये उसी दोष के अनुसार प्रत्यञ्जन
१०६० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे (पुनः अञ्जन) करे । नेत्रों के दोष जबतक दूर न हो जायँ नेत्रों को न धोवे । धोने के पश्चात् नेत्रों में प्रत्यञ्जन आँजने से तीक्ष्ण औषधियों के प्रयोग से हुआ नेत्रों का ताप नष्ट हो जाता है ॥२३१-२३२॥ अथ नयनामृतचूर्णमाह, तद्यथा- शुद्धे नागे द्रुते तुल्यं शुद्धं सूतं विनिक्षिपेत् । कृष्णाञ्जनं तयोस्तुल्यं सर्वमेकत्र चूर्णयेत् ।।२३३।। दशमांशेन कर्पूरं तस्मिंश्चूर्णे विनिक्षिपेत् । एतत्प्रत्यञ्जनं नेत्रगद जिन्नयनामृतम् ।।२३४।। इति नयनामृतं प्रत्यञ्जनम् । नयनामृत चूर्ण-शुद्ध शीसे को पिघला कर उसमें उसके बराबर ही शुद्ध पारा डाले तथा इन दोनों के बराबर काला सुरमा डाले तत्पश्चात् इन सबका एकत्र चूर्ण करके उसमें उसका दशवां भाग कर्पूर डाले । इसका नेत्रों में प्रत्यञ्जन करने से नेत्र के रोग निःशेष हो जाते हैं । इनको 'नयनामृताञ्जन' कहते हैं ॥२३३-२३४॥ ❖ कृष्णाञ्जनं=स्रोतोऽञ्जनम् । तथा च मदनपालः- 'स्रोतोऽञ्जनन्तु तद्विद्यादञ्जनाभं यदञ्जनम्' ।।२३३-२३४।। यहाँ 'कृष्णाञ्जन' का 'काला सुरमा' अर्थ समझना चाहिये । क्योंकि मदनपाल निघण्टु में लिखा है कि—जो सुरमा काजल के समान काला होता है वह स्रोतोञ्जन अर्थात् काला सुरमा कहलाता है ॥२३३-२३४॥ अथ दृष्टिस्र्वच्छकारिणीं शलाकामाह- त्रिफलाभृङ्गशुण्ठीनां रसैस्तद्वच्च सर्पिषा । गोमूत्रमध्वजाक्षीरैः सिक्तो नागः प्रतापितः ।।२३५।। तच्छलाका हरत्येव सर्वान्नेत्रभवानादान् ।।२३६।। दृष्टि को स्वच्छ करने वाली शलाका-शुद्ध सीसे को बार-बार तपा कर त्रिफला के रस में, घी में, गोमूत्र में, शहद में और बकरी के दूध में बुझावे । फिर इस सीसे की सलाई बना कर नेत्रों में फेरने से नेत्रसम्बन्धी सम्पूर्ण रोग नष्ट हो जाते हैं ॥२३५-२३६॥ इति भेषजानां विधानानि । अथ भेषजभक्षणसमयः । तस्य पाञ्चविध्यमाह- भैषज्यमभ्यवहरेत्प्रभाते प्रायशो बुधः । कषायांस्तु विशेषेण तत्र भेदस्तु दर्शितः ।।२३७।। ज्ञेयः पञ्चविधः कालो भैषज्यग्रहणे नृणाम् । किञ्चित्सूर्योदये जाते तथा दिवसभोजने ।। सायन्तने भोजने च मुहुश्चापि तथा निशि ।।२३८।। औषध खाने के पाँच समय-बुद्धिमान् पुरुष को चाहिये कि ओषधियों को प्रायः प्रातःकाल में खावे, उसमें यदि क्वाथ पीना हो तो प्रातःकाल में ही पीवे । औषध खाने के समय पाँच हैं- (१) कुछ सूर्योदय होने के पश्चात्, (२) दिन में भोजन करने के समय, (३) सायंकाल के भोजन करने के समय, (४) बारम्बार तथा (५) रात्रि में । इस प्रकार मनुष्यों के ओषधि खाने के पाँच समय हैं ॥ तत्र प्रथमकालस्य विषयानाह- प्रायः पित्तकफोद्रेके विरेकवमनार्थयोः । लेखनार्थे च भैषज्यं प्रभातेऽनन्नमाहरेत् ।।२३९।। ओषधि सेवन का प्रथम काल-पित्त तथा कफ की अधिकता में विरेचन, वमन तथा लेखन करना हो तो प्रातःकाल बिना भोजन किये ओषधि का उपयोग करना चाहिये ॥२३९॥
अथ षष्ठं धूमपानादिविधिप्रकरणम् १०६१ अथ द्वितीयकालस्य विषयानाह- भैषज्यं विगुणेऽपाने भोजनाग्रे प्रशस्यते। अरुचौ चित्रभोज्यैश्च मिश्रं रुचिरमाहरेत् ।।२४०।। समानवाते विगुणे मन्देऽग्नावतिदीपनम्। दद्याद्भोजनमध्ये च भैषज्यं कुशलो भिषक् ।।२४१।। व्यानकोपे तु भैषज्यं भोजनान्ते समाहरेत्। हिक्काऽऽक्षेपकम्पेषु पूर्वमन्ते च भोजनात् ।।२४२।। द्वितीय काल—अपान वायुके दुष्ट होने पर दिन के भोजन से कुछ पहले औषधि लेनी चाहिये। अरुचि में भोजन के विचित्र पदार्थों के साथ खाने में रुचि होती है। यदि रोगी की नाभि में रहने वाली समान वायु दूषित हो और मन्दाग्नि हो तो बुद्धिमान् वैद्य अग्निदीपक ओषधियों को भोजन के मध्य में खिलावे। यदि सर्व शरीर में व्यापक व्यान वायु बिगड़ी हो तो भोजन के अन्त में ओषधि खिलानी चाहिये। हिचकी, आक्षेपक वायु या कम्प वायु की अधिकता हो तो भोजन के पहले और पीछे भी ओषधि खिलानी चाहिये ।।२४०-२४२।। अथ तृतीयकालस्य विषयानाह- उदाने कुपिते वाते स्वरभङ्गादिकारिणि। ग्रासग्रासान्तरे देयं भैषज्यं सान्ध्यभोजने ।।२४३।। प्राणे प्रदुष्टे सान्ध्यस्य भुक्तस्यान्ते प्रदीयते। औषधं प्रायशो धीरैः कालोऽयं स्यात्तृतीयकः ।।२४४।। तृतीय काल—स्वरभङ्ग इत्यादि को करने वाले गले में स्थित उदान वायु का यदि कोप हो तो सायङ्काल में भोजन के प्रत्येक ग्रास के साथ ओषधि देनी चाहिये। यदि हृदयस्थित प्राण वायु कुपित हो तो बुद्धिमान् वैद्य को चाहिये कि प्रायः सायंकाल के भोजन के पश्चात् ओषधि का सेवन करावे ।।२४३-२४४।। अथ चतुर्थकालस्य विषयानाह- मुहुर्मुहुश्च तृट्छर्दिहिक्काश्वासगरेषु च। सायञ्च भेषजं दद्यादिति कालश्चतुर्थकः ।।२४५।। चतुर्थ काल—प्यास, वमन, हिचकी, श्वास अथवा विषजन्य पीड़ा होने पर अन्न के साथ या बारम्बार और सायंकाल में ओषधि का सेवन करावें ।।३४५।। अथ पञ्चमकालस्य विषयानाह- ऊर्ध्वजत्रुविकारेषु लेखने बृंहणे तथा। पाचने शमने देयमनन्नं भेषजं निशि ।।२४६।। पञ्चम काल—ऊर्ध्व जत्रुगत विकार में एवं लेखनक्रिया, बृंहणक्रिया, पाचनक्रिया तथा शमनक्रियाओं में रात्रि में बिना भोजन किये ही ओषधि सेवन करानी चाहिये ।।२४६।। अथ निरन्नकोष्ठ ओषधिसेवनगुणानाह- वीर्याधिकं भवति भेषजमन्नहीनं हन्यात्तदामयमसंशयमाशु चैव। तद्बालवृद्धयुवतीमृदुभिश्च पीतं ग्लानिं परां नयति चाशु बलक्षयञ्च ।।२४७।। निरन्न कोष्ठ ओषधि सेवन के गुण—बिना भोजन किये जिस ओषधि का सेवन करता है उस ओषधि की शक्ति अधिक होती है। तथा वह ओषधि अवश्य तथा रोग को नष्ट करती है। किन्तु यदि बालक, वृद्ध, युवती स्त्रियों अथवा मृदु प्रकृति वाले मनुष्य निरन्नकोष्ठ (खाली पेट) ओषधि का सेवन करें तो उन्हें तुरन्त ग्लानि होती है तथा शरीर के बल का नाश होता है।। अथान्नेन सहौषधसेवनगुणानाह- शीघ्रं विपाकमुपयाति बलं न हिंस्यादन्नावृतं न च मुहुर्वदनान्निरेति। एतद्धितं स्थविरबालकृशाङ्गनाभ्यः प्राग्भोजनाद्यदशितं किल तच्च तद्वत् ।।२४८।। औषधशेषे भुक्तं भोजनशेषे यदौषधं पीतम्। न करोति गदीपशमम्प्रकोपयत्यन्यरोगांश्च ।।२४९।।
१०६२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अन्न के साथ ओषधि सेवन के गुण-अन्न में मिलाकर जिस ओषधि का सेवन किया जाता है वह तुरन्त पच जाती है, बल का नाश नहीं करती तथा मुख से बारम्बार निकलती भी नहीं है। वृद्ध, बालक, दुर्बल शरीर बालों को तथा स्त्रियों को इस प्रकार ओषधि का सेवन कराना हितकर है। भोजन के पहले जो ओषधि सेवन की जाती है वह गुणों में उसके सदृश ही होती है अर्थात् भोजन के साथ खाई हुई ओषधि के समान ही गुण करती है। ओषधि कुछ शेष रहने पर भोजन करे या भोजन कुछ शेष रहने पर ओषधि का सेवन करे तो वह ओषधि रोगों को निवृत्त नहीं करती तथा अन्य रोगों को कुपित करती है ।। २४८-२४९ ।। ❖ तद्वद् = अन्नावृतवद्, भेषजमिति शेषः । पीतमित्युपलक्षणं लीढादिकं च ।। २४८- २४९ ।। यहाँ 'तद्वत्' पद का 'उसके सदृश ही होती है अर्थात् भोजन के साथ खाई हुई ओषधि के समान ही गुण करती है' यह अर्थ समझना चाहिये । और 'ओषधि' पद को प्रकरणवश ऊपर से समझना चाहिये । यहाँ 'पीतम्' पद उपलक्षण है अतः 'पीवे या खाये' सभी का बोध करना चाहिये, इसी से सेवन करे, यह अर्थ किया गया है ।। २४८-२४९ ।। अथौषधपाकापाकयोश्चिह्नमाह- अनुलोमोऽनिलः स्वास्थ्यं क्षुत्तृष्णासुमनस्कताः । लघुत्वमिन्द्रियोद्गारशुद्धिर्जीर्णौषधाकृतिः ।। २५० ।। बलमो दाहोऽङ्गसदनं भ्रममूर्च्छाशिरोरुजाः । अरतिर्बलहानिश्च सावशेषौषधाकृतिः ।। २५१ ।। ओषधि के पाकापाक (पचने न पचने) का लक्षण-रोगी की यदि ओषधि पच जाती है तो वायु का अनुलोमन होता है, स्वस्थता आती है, भूख तथा प्यास लगती है, मन में प्रसन्नता होती है, शरीर में लघुता होती है और डकार शुद्ध आती है तथा यदि रोगी को ओषधि नहीं पची होती है तो ग्लानि, दाह, अङ्ग में पीड़ा, भ्रम, मूर्च्छा, सिर में दर्द, अरुचि तथा बलक्षय होता है ।। २५०-२५१ ।। अथ चरकोक्तौषधसेवनविधिमाह- देवान्गुरूस्तथा विप्रान्पूजयित्वा प्रणम्य च । आशिषश्च समादाय श्रद्धया भेषजं भजेत् ।। २५२ ।। रसायनमिवर्षीणां देवानाममृतं यथा । सुधेवोत्तमनागानां भैषज्यमिदमस्तु ते ।। २५३ ।। ब्रह्मदक्षाश्विरुद्रेन्द्रभूचन्द्रार्कनिलानलाः । देवाश्च सौषधिग्रामा भूमिदेवाश्च पान्तु वः ।। २५४ ।। औषधं हेमरजतमृद्भाजनपरिस्थितम् । पिबेदाप्तजनस्याग्रे प्रसन्नवदनेक्षणः ।। २५५ ।। प्रशान्तस्तूपविश्याथ पीत्वा पात्रमधोमुखम् । निक्षिप्याचम्य सलिलं ताम्बूलाद्यपयोजयेत् ।। २५६ ।। चरकोक्त ओषधि सेवन विधि-देवता, गुरु तथा ब्राह्मण की पूजा करने के बाद प्रणाम करके उनका आशीर्वाद लेकर श्रद्धा से ओषधि का सेवन करे और गुरु तथा ब्राह्मण रोगी को यह आशीर्वाद दें कि-जिस प्रकार रसायन ऋषियों को तथा अमृत देवताओं और नागों को रोगरहित तथा बलवान करता है उसी प्रकार यह ओषधि तुम्हें रोगरहित तथा बलवान बनावे । और ब्रह्मा, दक्ष, अश्विनीकुमार, रुद्र, इन्द्र, पृथ्वी, चन्द्रमा, सूर्य, वायु, अग्नि आदि देवता ओषधियों का समूह तथा ब्राह्मण तुम्हारी रक्षा करें । तदुपरान्त रोगी अपने मुख तथा नेत्रों को प्रसन्न रखता हुआ शान्तरूप से बैठ कर अपने प्रेमी तथा भले मनुष्यों के आगे सोने, चाँदी अथवा मिट्टी के पात्र में रखी हुई ओषधि का सेवन करे । ओषधियों के लेने के पश्चात् ओषधि के पात्र को पृथ्वी पर औंधा डाल कर रख दे तत्पश्चात् जल से आचमन करके पान इत्यादि का सेवन करे ।। इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमन्मिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे परिभाषादिप्रकरणे षष्ठं धूमपानादिविधिप्रकरणं समाप्तम् ।। ६ ।।