भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 1110, कुल 1167 में से

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अथ षष्ठं धूमपानादिविधिप्रकरणम् १०५९ अथ स्नेहनकारिणीं रसक्रियामाह- कतकस्य फलं घृष्ट्वा मधुना नेत्रमञ्जयेत् । ईषत्कर्पूरसहितं स्मृतं नेत्रप्रसादनम् ।। २२४ ।। स्नेहनकारिणी रसक्रिया-निर्मली के फल तथा थोड़े कपूर को शहद में घिसकर आँजने से नेत्र स्निग्धतापूर्वक स्वच्छ हो जाते हैं ।। २२४ ।। अथ लेखनचूर्णमाह- दक्षाण्डत्वक्शिलाकाचशङ्खचन्दनसैन्धवैः । अञ्जनं हरते नित्यं सर्वानक्षिगदान्बलात् ।। २२५ ।। लेखन चूर्ण-मुरगे के अण्डे का छिलका, मैनशिल, काच, शंख, चन्दन तथा सेंधानमक का चूर्ण करके नित्य आँजने से लाचार होकर सम्पूर्ण नेत्रविकार नष्ट हो जाते हैं ।। २२५ ।। ❖ दक्षः=कुक्कुटः । तथा च निघण्टुः- 'कृकवाकुस्तथा दक्षः कालज्ञोऽथ शिखण्डिकः' इति ।। २२५ ।। यहाँ 'दक्ष' पद का 'कुक्कुट' अर्थात् 'मुरगा' अर्थ समझना चाहिये। क्योंकि निघण्टु में 'कृकवाकु' आदि मुरगे के संस्कृत नामों के मध्य में 'दक्ष' का पाठ है ।। २२५ ।। अथ रोपणचूर्णमाह- शिलायां रसकं पिष्ट्वा सम्यगाप्लाव्य वारिणा । गृह्णीयात्तज्जलं सर्वं त्यजेच्चूर्णमधोगतम् ।। २२६ ।। शुष्कं तच्च जलं सर्वं पर्पटीसन्निभं भवेत् । विचूर्ण्य भावयेत्सम्यक्त्रिवेलं त्रिफलारसैः ।। २२७ ।। कर्पूरस्य रजस्तत्र दशांशेन निक्षिपेत् । अञ्जयेन्नयनं तेन सर्वदोषप्रशान्तये । २१८ ।। समस्तनेत्ररोगघ्नं चूर्णमेतन्न संशयः ।। २२८ ।। रोपण चूर्ण-पत्थर के खरल में खपरिया को घोंट कर पानी में भलीभाँति भिगो दें, तत्पश्चात् उसके ऊपर के जल को निथार ले तथा नीचे के चूर्ण को फेंक दे इस जल को सुखावे जब यह पपड़ी के समान हो जाय तब उसका चूर्ण कर ले फिर हर्रा, बहेड़ा और आँवले की तीन भावना दे और फिर दशमांश कपूर का चूर्ण मिला दे। इस चूर्ण के आँजने से सम्पूर्ण दोषों की शान्ति होती है तथा नेत्रों के सम्पूर्ण रोग निःसन्देह नष्ट हो जाते हैं ।। २२६-२२८ ।। अथ स्नेहनचूर्णमाह- अग्नितप्तं हि सौवीरं निषिञ्चेत्रिफलारसैः । सप्तवेलं तथा स्तन्यैः स्त्रीणां सिक्तं विचूर्णितम् ।। २२९ ।। अञ्जयेत्तेन नयने प्रत्यहं चक्षुषोर्हितम् । सर्वानक्षिविकारांस्तु हन्यादेतन्न संशयः ।। २३० ।। स्नेहन चूर्ण-सफेद सुरमे को अग्नि में तपा तपा कर सात बार स्त्री के दूध में बुझावे। इस प्रकार यह शुद्ध सुरमे का अञ्जन नेत्रों को हितकारी होता है तथा नेत्रसम्बन्धी सम्पूर्ण विकारों का निःसन्देह नाश करता है ।। २२९-२३० ।। ❖ सौवीरं=श्वेतमञ्जनम् ।। २२९-२३० ।। यहाँ 'सौवीर' पद का 'सुफेद सुरमा' अर्थ समझना चाहिये ।। २२९-२३० ।। अथ प्रत्यञ्जनसेवनविधिमाह- गतदोषमपेताश्रु प्रपश्यत्सम्पगम्भसि । प्रक्षाल्याक्षि यक्षाल्याक्षि यथादोषं कार्यं प्रत्यञ्जनं ततः ।। २३१ ।। न वा निर्वातदोषेऽक्षिधावनं सम्प्रयोजयेत् । प्रत्यञ्जनं तत्र दद्याच्चूर्णं तीक्ष्णप्रसादनम् ।। २३२ ।। प्रत्यञ्जन सेवन विधि-नेत्रों के दोष दूर होने के पश्चात् आँसू निकल जाने पर तथा नेत्रों में देखने की शक्ति आ जाने पर नेत्रों को जल से धो डालना चाहिये। तत्पश्चात् दोषों को निःशेष करने के लिये उसी दोष के अनुसार प्रत्यञ्जन

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