भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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१०६० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे (पुनः अञ्जन) करे । नेत्रों के दोष जबतक दूर न हो जायँ नेत्रों को न धोवे । धोने के पश्चात् नेत्रों में प्रत्यञ्जन आँजने से तीक्ष्ण औषधियों के प्रयोग से हुआ नेत्रों का ताप नष्ट हो जाता है ॥२३१-२३२॥ अथ नयनामृतचूर्णमाह, तद्यथा- शुद्धे नागे द्रुते तुल्यं शुद्धं सूतं विनिक्षिपेत् । कृष्णाञ्जनं तयोस्तुल्यं सर्वमेकत्र चूर्णयेत् ।।२३३।। दशमांशेन कर्पूरं तस्मिंश्चूर्णे विनिक्षिपेत् । एतत्प्रत्यञ्जनं नेत्रगद जिन्नयनामृतम् ।।२३४।। इति नयनामृतं प्रत्यञ्जनम् । नयनामृत चूर्ण-शुद्ध शीसे को पिघला कर उसमें उसके बराबर ही शुद्ध पारा डाले तथा इन दोनों के बराबर काला सुरमा डाले तत्पश्चात् इन सबका एकत्र चूर्ण करके उसमें उसका दशवां भाग कर्पूर डाले । इसका नेत्रों में प्रत्यञ्जन करने से नेत्र के रोग निःशेष हो जाते हैं । इनको 'नयनामृताञ्जन' कहते हैं ॥२३३-२३४॥ ❖ कृष्णाञ्जनं=स्रोतोऽञ्जनम् । तथा च मदनपालः- 'स्रोतोऽञ्जनन्तु तद्विद्यादञ्जनाभं यदञ्जनम्' ।।२३३-२३४।। यहाँ 'कृष्णाञ्जन' का 'काला सुरमा' अर्थ समझना चाहिये । क्योंकि मदनपाल निघण्टु में लिखा है कि—जो सुरमा काजल के समान काला होता है वह स्रोतोञ्जन अर्थात् काला सुरमा कहलाता है ॥२३३-२३४॥ अथ दृष्टिस्र्वच्छकारिणीं शलाकामाह- त्रिफलाभृङ्गशुण्ठीनां रसैस्तद्वच्च सर्पिषा । गोमूत्रमध्वजाक्षीरैः सिक्तो नागः प्रतापितः ।।२३५।। तच्छलाका हरत्येव सर्वान्नेत्रभवानादान् ।।२३६।। दृष्टि को स्वच्छ करने वाली शलाका-शुद्ध सीसे को बार-बार तपा कर त्रिफला के रस में, घी में, गोमूत्र में, शहद में और बकरी के दूध में बुझावे । फिर इस सीसे की सलाई बना कर नेत्रों में फेरने से नेत्रसम्बन्धी सम्पूर्ण रोग नष्ट हो जाते हैं ॥२३५-२३६॥ इति भेषजानां विधानानि । अथ भेषजभक्षणसमयः । तस्य पाञ्चविध्यमाह- भैषज्यमभ्यवहरेत्प्रभाते प्रायशो बुधः । कषायांस्तु विशेषेण तत्र भेदस्तु दर्शितः ।।२३७।। ज्ञेयः पञ्चविधः कालो भैषज्यग्रहणे नृणाम् । किञ्चित्सूर्योदये जाते तथा दिवसभोजने ।। सायन्तने भोजने च मुहुश्चापि तथा निशि ।।२३८।। औषध खाने के पाँच समय-बुद्धिमान् पुरुष को चाहिये कि ओषधियों को प्रायः प्रातःकाल में खावे, उसमें यदि क्वाथ पीना हो तो प्रातःकाल में ही पीवे । औषध खाने के समय पाँच हैं- (१) कुछ सूर्योदय होने के पश्चात्, (२) दिन में भोजन करने के समय, (३) सायंकाल के भोजन करने के समय, (४) बारम्बार तथा (५) रात्रि में । इस प्रकार मनुष्यों के ओषधि खाने के पाँच समय हैं ॥ तत्र प्रथमकालस्य विषयानाह- प्रायः पित्तकफोद्रेके विरेकवमनार्थयोः । लेखनार्थे च भैषज्यं प्रभातेऽनन्नमाहरेत् ।।२३९।। ओषधि सेवन का प्रथम काल-पित्त तथा कफ की अधिकता में विरेचन, वमन तथा लेखन करना हो तो प्रातःकाल बिना भोजन किये ओषधि का उपयोग करना चाहिये ॥२३९॥