भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ षष्ठं धूमपानादिविधिप्रकरणम् १०६१ अथ द्वितीयकालस्य विषयानाह- भैषज्यं विगुणेऽपाने भोजनाग्रे प्रशस्यते। अरुचौ चित्रभोज्यैश्च मिश्रं रुचिरमाहरेत् ।।२४०।। समानवाते विगुणे मन्देऽग्नावतिदीपनम्। दद्याद्भोजनमध्ये च भैषज्यं कुशलो भिषक् ।।२४१।। व्यानकोपे तु भैषज्यं भोजनान्ते समाहरेत्। हिक्काऽऽक्षेपकम्पेषु पूर्वमन्ते च भोजनात् ।।२४२।। द्वितीय काल—अपान वायुके दुष्ट होने पर दिन के भोजन से कुछ पहले औषधि लेनी चाहिये। अरुचि में भोजन के विचित्र पदार्थों के साथ खाने में रुचि होती है। यदि रोगी की नाभि में रहने वाली समान वायु दूषित हो और मन्दाग्नि हो तो बुद्धिमान् वैद्य अग्निदीपक ओषधियों को भोजन के मध्य में खिलावे। यदि सर्व शरीर में व्यापक व्यान वायु बिगड़ी हो तो भोजन के अन्त में ओषधि खिलानी चाहिये। हिचकी, आक्षेपक वायु या कम्प वायु की अधिकता हो तो भोजन के पहले और पीछे भी ओषधि खिलानी चाहिये ।।२४०-२४२।। अथ तृतीयकालस्य विषयानाह- उदाने कुपिते वाते स्वरभङ्गादिकारिणि। ग्रासग्रासान्तरे देयं भैषज्यं सान्ध्यभोजने ।।२४३।। प्राणे प्रदुष्टे सान्ध्यस्य भुक्तस्यान्ते प्रदीयते। औषधं प्रायशो धीरैः कालोऽयं स्यात्तृतीयकः ।।२४४।। तृतीय काल—स्वरभङ्ग इत्यादि को करने वाले गले में स्थित उदान वायु का यदि कोप हो तो सायङ्काल में भोजन के प्रत्येक ग्रास के साथ ओषधि देनी चाहिये। यदि हृदयस्थित प्राण वायु कुपित हो तो बुद्धिमान् वैद्य को चाहिये कि प्रायः सायंकाल के भोजन के पश्चात् ओषधि का सेवन करावे ।।२४३-२४४।। अथ चतुर्थकालस्य विषयानाह- मुहुर्मुहुश्च तृट्छर्दिहिक्काश्वासगरेषु च। सायञ्च भेषजं दद्यादिति कालश्चतुर्थकः ।।२४५।। चतुर्थ काल—प्यास, वमन, हिचकी, श्वास अथवा विषजन्य पीड़ा होने पर अन्न के साथ या बारम्बार और सायंकाल में ओषधि का सेवन करावें ।।३४५।। अथ पञ्चमकालस्य विषयानाह- ऊर्ध्वजत्रुविकारेषु लेखने बृंहणे तथा। पाचने शमने देयमनन्नं भेषजं निशि ।।२४६।। पञ्चम काल—ऊर्ध्व जत्रुगत विकार में एवं लेखनक्रिया, बृंहणक्रिया, पाचनक्रिया तथा शमनक्रियाओं में रात्रि में बिना भोजन किये ही ओषधि सेवन करानी चाहिये ।।२४६।। अथ निरन्नकोष्ठ ओषधिसेवनगुणानाह- वीर्याधिकं भवति भेषजमन्नहीनं हन्यात्तदामयमसंशयमाशु चैव। तद्बालवृद्धयुवतीमृदुभिश्च पीतं ग्लानिं परां नयति चाशु बलक्षयञ्च ।।२४७।। निरन्न कोष्ठ ओषधि सेवन के गुण—बिना भोजन किये जिस ओषधि का सेवन करता है उस ओषधि की शक्ति अधिक होती है। तथा वह ओषधि अवश्य तथा रोग को नष्ट करती है। किन्तु यदि बालक, वृद्ध, युवती स्त्रियों अथवा मृदु प्रकृति वाले मनुष्य निरन्नकोष्ठ (खाली पेट) ओषधि का सेवन करें तो उन्हें तुरन्त ग्लानि होती है तथा शरीर के बल का नाश होता है।। अथान्नेन सहौषधसेवनगुणानाह- शीघ्रं विपाकमुपयाति बलं न हिंस्यादन्नावृतं न च मुहुर्वदनान्निरेति। एतद्धितं स्थविरबालकृशाङ्गनाभ्यः प्राग्भोजनाद्यदशितं किल तच्च तद्वत् ।।२४८।। औषधशेषे भुक्तं भोजनशेषे यदौषधं पीतम्। न करोति गदीपशमम्प्रकोपयत्यन्यरोगांश्च ।।२४९।।