भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 1113

१०६२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अन्न के साथ ओषधि सेवन के गुण-अन्न में मिलाकर जिस ओषधि का सेवन किया जाता है वह तुरन्त पच जाती है, बल का नाश नहीं करती तथा मुख से बारम्बार निकलती भी नहीं है। वृद्ध, बालक, दुर्बल शरीर बालों को तथा स्त्रियों को इस प्रकार ओषधि का सेवन कराना हितकर है। भोजन के पहले जो ओषधि सेवन की जाती है वह गुणों में उसके सदृश ही होती है अर्थात् भोजन के साथ खाई हुई ओषधि के समान ही गुण करती है। ओषधि कुछ शेष रहने पर भोजन करे या भोजन कुछ शेष रहने पर ओषधि का सेवन करे तो वह ओषधि रोगों को निवृत्त नहीं करती तथा अन्य रोगों को कुपित करती है ।। २४८-२४९ ।। ❖ तद्वद् = अन्नावृतवद्, भेषजमिति शेषः । पीतमित्युपलक्षणं लीढादिकं च ।। २४८- २४९ ।। यहाँ 'तद्वत्' पद का 'उसके सदृश ही होती है अर्थात् भोजन के साथ खाई हुई ओषधि के समान ही गुण करती है' यह अर्थ समझना चाहिये । और 'ओषधि' पद को प्रकरणवश ऊपर से समझना चाहिये । यहाँ 'पीतम्' पद उपलक्षण है अतः 'पीवे या खाये' सभी का बोध करना चाहिये, इसी से सेवन करे, यह अर्थ किया गया है ।। २४८-२४९ ।। अथौषधपाकापाकयोश्चिह्नमाह- अनुलोमोऽनिलः स्वास्थ्यं क्षुत्तृष्णासुमनस्कताः । लघुत्वमिन्द्रियोद्गारशुद्धिर्जीर्णौषधाकृतिः ।। २५० ।। बलमो दाहोऽङ्गसदनं भ्रममूर्च्छाशिरोरुजाः । अरतिर्बलहानिश्च सावशेषौषधाकृतिः ।। २५१ ।। ओषधि के पाकापाक (पचने न पचने) का लक्षण-रोगी की यदि ओषधि पच जाती है तो वायु का अनुलोमन होता है, स्वस्थता आती है, भूख तथा प्यास लगती है, मन में प्रसन्नता होती है, शरीर में लघुता होती है और डकार शुद्ध आती है तथा यदि रोगी को ओषधि नहीं पची होती है तो ग्लानि, दाह, अङ्ग में पीड़ा, भ्रम, मूर्च्छा, सिर में दर्द, अरुचि तथा बलक्षय होता है ।। २५०-२५१ ।। अथ चरकोक्तौषधसेवनविधिमाह- देवान्गुरूस्तथा विप्रान्पूजयित्वा प्रणम्य च । आशिषश्च समादाय श्रद्धया भेषजं भजेत् ।। २५२ ।। रसायनमिवर्षीणां देवानाममृतं यथा । सुधेवोत्तमनागानां भैषज्यमिदमस्तु ते ।। २५३ ।। ब्रह्मदक्षाश्विरुद्रेन्द्रभूचन्द्रार्कनिलानलाः । देवाश्च सौषधिग्रामा भूमिदेवाश्च पान्तु वः ।। २५४ ।। औषधं हेमरजतमृद्भाजनपरिस्थितम् । पिबेदाप्तजनस्याग्रे प्रसन्नवदनेक्षणः ।। २५५ ।। प्रशान्तस्तूपविश्याथ पीत्वा पात्रमधोमुखम् । निक्षिप्याचम्य सलिलं ताम्बूलाद्यपयोजयेत् ।। २५६ ।। चरकोक्त ओषधि सेवन विधि-देवता, गुरु तथा ब्राह्मण की पूजा करने के बाद प्रणाम करके उनका आशीर्वाद लेकर श्रद्धा से ओषधि का सेवन करे और गुरु तथा ब्राह्मण रोगी को यह आशीर्वाद दें कि-जिस प्रकार रसायन ऋषियों को तथा अमृत देवताओं और नागों को रोगरहित तथा बलवान करता है उसी प्रकार यह ओषधि तुम्हें रोगरहित तथा बलवान बनावे । और ब्रह्मा, दक्ष, अश्विनीकुमार, रुद्र, इन्द्र, पृथ्वी, चन्द्रमा, सूर्य, वायु, अग्नि आदि देवता ओषधियों का समूह तथा ब्राह्मण तुम्हारी रक्षा करें । तदुपरान्त रोगी अपने मुख तथा नेत्रों को प्रसन्न रखता हुआ शान्तरूप से बैठ कर अपने प्रेमी तथा भले मनुष्यों के आगे सोने, चाँदी अथवा मिट्टी के पात्र में रखी हुई ओषधि का सेवन करे । ओषधियों के लेने के पश्चात् ओषधि के पात्र को पृथ्वी पर औंधा डाल कर रख दे तत्पश्चात् जल से आचमन करके पान इत्यादि का सेवन करे ।। इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमन्मिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे परिभाषादिप्रकरणे षष्ठं धूमपानादिविधिप्रकरणं समाप्तम् ।। ६ ।।