भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०५८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ लेखनकारिणी वर्त्तिमाह- शङ्खनाभिर्बिभीतस्य मज्जा पथ्या मनःशिला । पिप्पली मरिचं कुष्ठं वचा चेति समांशकम् ।।२१३।। छागक्षीरेण सम्पेष्य वर्त्ति कुर्याद्यवोन्मिताम् । हरेणुमात्रां सम्पिष्य जलैः कुर्याद्यथाऽञ्जनम् ।।२१४।। तिमिरं मांसवृद्धिञ्च काचं पटलमर्बुदम् । रात्र्यन्धं वार्षिकं पुष्पं वर्त्तिश्चन्द्रोदया हरेत् ।।२१५।। इति चन्द्रोदया वर्त्तिर्लेखनी । लेखनकारिणी वर्त्ति—शंख की नाभि, बहेड़े की मींगी, हरड़, मैनशिल, पीपरि, काली मिर्च, कूठ और वच समान भाग लेकर बकरी के दूध में पीस कर जौ के समान बत्ती बनावे । इस बत्ती को पानी में घिसकर योग्य रीति से आँजने से तिमिर, मांसवृद्धि, काच, पटल, अर्बुद, रतौंधी और एक वर्ष का फूला नष्ट हो जाता है । इस बत्ती का नाम चन्द्रोदया वर्त्ति है । यह लेखन कारिणी है ॥२१२-२१५॥ अशीतिस्तिलपुष्पाणि षष्टिः पिप्पलितण्डुलाः । जातीपुष्पाणि पञ्चशन्मरिचानि तु षोडश ।।२१६।। सूक्ष्मं पिष्ट्वाऽम्बुना वर्त्तिः कृता कुसुमिकाऽभिधा । तिमिरार्जुनशुक्लानां नाशिनी मांसवृद्धिनुत् । एतस्या अञ्जने प्रोक्ता मात्रा सार्धहरेणुका ।।२१७।। रोपणकारिणी वर्त्ति—८० तिल के फूल, ६० पीपल के बीज, ५० चमेली के फूल और १६ दाने मिर्च पानी में बारीक पीस कर जो बत्ती बनाई जाती है, वह कुसुमिका वर्त्ति कहलाती है । यह वर्त्ति-तिमिर, अर्जुन तथा फूल और मांसवृद्धि को दूर करती है । इस वर्त्ति की आँजने में डेढ़ मटर के बराबर मात्रा कही गई है । यह कुसुमिका वर्त्ति रोपणकारिणी है ॥२१६-२१७॥ अथ स्नेहनकारिणी वर्त्तिमाह- धात्र्यक्षपथ्याबीजानि एकद्वित्रिगुणानि च । पिष्ट्वा वर्त्ति मलैः कुर्यादञ्जनं द्विहरेणुकम् ।।२१८।। नेत्रस्रावं हरत्याशु वातरक्तरुजं तथा ।।२१९।। स्नेहनकारिणी वर्त्ति—आँवले की मींगी १ भाग, बहेड़े की मींगी २ भाग, हर्रे की मींगी ३ भाग, इनको पानी में पीसकर दो मटर के बराबर नेत्रों में लगायें । इसके प्रयोग से नेत्रों से पानी गिरना तथा वातरक्तजन्य विकार नष्ट हो जाते हैं ॥२१८-२१९॥ अथ लेखनकारिणी रसक्रियामाह- तुत्थमाक्षिकसिन्धूत्थाः सिताशङ्खमनःशिलाः । गैरिकं सिन्धुफेनञ्च मरिचं चेति चूर्णयेत् ।।२२०।। संयोज्य मधुना कुर्यादञ्जनार्थं रसक्रियाम् । वर्त्मरोगार्मतमिरकाचशुक्लहरीं पराम् ।।२२१।। लेखनकारिणी रसक्रिया—नीलाथोथा (तूतिया), सोनामाखी, सेंधामनक, शक्कर, शंख का चूर्ण, मैनशिल, गेरू, समुद्रफेन और काली मिर्च; इनको खूब पीसकर मधु में मिलाकर आँजने से पलकों के रोग, अर्म, तिमिर, काच और शुक्ल रोग का बहुत शीघ्र नाश होता है ॥२२०-२२१॥ अथ रोपणी रसक्रियामाह- रसाञ्जनं सर्जरसो जातिपुष्पं मनःशिला । समुद्रफेनो लवणं गैरिकं मरिचं तथा ।।२२२।। एतत्समांशं मधुना पिष्टं प्रक्लिन्नवर्त्मने । अञ्जनं क्लेदकण्डूघ्नं पक्ष्मणाञ्च प्ररोहणम् ।।२२३।। रोपणी रसक्रिया—रसौत, राल, चमेली के फूल, मैनशिल, समुद्रफेन, सेंधा नमक, गेरू और कालीमिर्च; इन सबको समान भाग लेकर शहद में खूब बारीक पीसकर पलकों पर लगाने से पलकों का गीलापन तथा खुजली नष्ट होती है और पलकों के गिरे बाल फिर से उगने लगते हैं ॥२२२-२२३॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA