भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ षष्ठं धूमपानादिविधिप्रकरणम् १०५५ अतितर्पित तथा हीनतर्पित नेत्रों का प्रतीकार-अतितर्पित तथा हीनतर्पित नेत्रों में दोषों की अधिकता होने से दोनों की चिकित्सा करने में विशेष प्रयत्नशील होना चाहिये। इन दोनों का प्रतीकार-क्रम से अतितर्पित नेत्र का रूक्षताकारक तथा हीनतर्पित नेत्र का स्निग्धताकारक उपचारों से करना चाहिये ॥१८३॥ ❖ अनयोः=अतितर्पितहीनतर्पितयोः ॥१८३॥ यहाँ 'अनयोः' पद का 'अतितर्पित तथा हीनतर्पित नेत्रों में' यह अर्थ समझना चाहिये ॥१८३॥ दुर्दिनात्युष्णशीतेषु चिन्तायां संभ्रमेषु च । अशान्तोपद्रवे चाक्षिण तर्पणं न प्रशस्यते ॥१८४॥ तर्पण क्रिया करने के लिये अयोग्य समय-जब बादल घिरे हुए हों या अत्यन्त गर्मी या सर्दी पड़ती हो वा रोगी के चित्त में चिन्ता या भय हो तथा उपद्रव शान्त होने के पहले नेत्रों में तर्पण क्रिया करना उचित नहीं होता है ॥१८४॥ अथ पुटपाकविधिमाह- द्वे बिल्वे स्निग्धमांसस्य परद्रव्यपलं मतम् । द्रव्यस्य कुडवोन्मानं सर्वमेकत्र पेषयेत् ॥१८५॥ तदेकत्र समालोड्य पत्रैः सुपरिवेष्टितम् । पुटपाकविधानेन तत्पक्त्वा तद्रसं बुधः ॥१८६॥ तर्पणोक्तेन विधिना यथावदवधारयेत् । दृष्टिमध्ये निषेच्यः स्यान्नित्यमुत्तानशायिनः ॥१८७॥ पुटपाक की विधि-स्नेह युक्त मांस २ पल (८ तोला), अन्य ओषधियाँ १ पल (४ तोला), द्रवपदार्थ ४ पल (१६ तोला) लेकर इन सबों को एकत्र पीस डाले पश्चात् गोला बनाकर उसके चारों तरफ पत्ते लपेट कर पुटपाक की विधि से अग्नि में रख पका डाले, उसके बाद वैद्य उक्त परिपक्व ओषधियों का रस निचोड़ कर तर्पण क्रिया में कही हुई विधि के अनुसार नेत्रों में भली प्रकार उक्त रस का प्रयोग करे, अर्थात् रोगी को उत्तान लिटाकर नेत्रों में उक्त रस को डाल कर जब तक उचित हो तब तक पड़ा रहने दे ॥१८५-१८७॥ अथ पुटपाकस्य भेदानाह- स्नेहनो लेखनश्चैव रोपणश्चेति स त्रिधा । हितःस्निग्धोऽतिरूंक्षस्य स्निग्धस्य स तु लेखनः ॥१८८॥ दृष्टेर्बलार्थमितरः पित्तासृग्व्रणवातनुत् ॥१८९॥ पुटपाक के भेद-पुटपाक तीन प्रकार का होता है- (१) स्नेहन, (२) लेखन, (३) रोपण। इनमें स्नेहन पुटपाक अत्यन्त रूक्ष नेत्रों के लिये और लेखन पुटपाक अत्यन्त स्निग्ध नेत्रों के लिये हितकारी होता है एवं रोपण पुटपाक दृष्टिशक्ति को बलवान् करने के लिये तथा पित्त और रक्त संबन्धी नेत्रविकार, व्रण एवं नेत्रगत वात दोष को दूर करने के लिये उत्तम होता है ॥१८८-१८९॥ ❖ इतरः=रोपणः ॥१८८-१८९॥ यहाँ 'इतर' पद का 'रोपण-पुटपाक' अर्थ समझना चाहिये ॥१८८-१८९॥ अथ स्नेहनादिपुटपाकानां धारणकालानाह- स्नेहमांसवसामज्जमेदःस्वाद्वौषधैः कृतः । स्नेहनः पुटपाकः स्याद्वायौं द्वे वाक्छते तु सः ॥१९०॥ जाङ्गलानां यकृन्मांसैर्लेखनद्रव्यसंयुतैः । कृष्णालोहरजस्ताम्रशङ्खविद्रुमसिन्धुजैः ॥१९१॥ समुद्रफेनकासीसस्रोतोऽञ्जदधिमस्तुभिः । लेखनो वाक्शतं तस्य परं धारणमिष्यते ॥१९२॥ स्तन्यजाङ्गलमध्वाज्यतिक्तद्रव्यविपाचितः । लेखनात्रिगुणो धार्यः पुटपाकस्तु रोपणः ॥१९३॥ स्नेहनादि पुटपाकों के धारण काल की अवधि-स्नेह, मांस, वसा, मज्जा, मेद तथा मधुर रस युक्त ओषधियों से बना हुआ जो पुटपाक होता है, वह स्नेहन कहलाता है, इसे २०० गुण अक्षरों के उच्चारण काल तक धारण करना चाहिये। जंगली जीवों का कलेजा तथा मांस, लेखनकारी ओषधियाँ, काले लोहे का सूक्ष्म चूर्ण, तामा, शंख तथा मूँगा CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA