भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 1107, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंका चूर्ण, सेंधा नमक, समुद्रफेन, कसीस, काला सुरमा, बकरी के दही का पानी इन सब से बना हुआ जो पुटपाक होता है, वह लेखन कहलाता है, इसके धारण काल की अवधि १०० गुरु अक्षरों के उच्चारण करने तक की है। स्त्री का दूध, जाङ्गल जीवों का मांस, शहद, गाय का घी तथा पञ्चतिक्तक गणोक्त ओषधियाँ इन सबों से बने हुये पुटपाक को रोपण कहते हैं। इसके धारण काल की अवधि लेखन पुटपाक से तिगुनी है अर्थात् ३०० गुरु अक्षरों के उच्चारण करने तक की है ॥१९०-१९३॥ अथ तिक्तद्रव्याण्याह- निम्बामृतावृषपटोलनिदिग्धिकाभिः स्यात्पञ्चतिक्तक इति प्रथितो गणोऽयम् ॥१९४॥ तिक्तक द्रव्य-नीम, गिलोय, अडूसा, परवल और कटेरी, इनके गण पञ्चतिक्तक नाम से प्रसिद्ध हैं, रोपण पुटपाक में इसी का प्रयोग होता है ॥१९४॥ आचरेत्तर्पणोक्तां तु क्रियां व्यापत्तिदर्शने ॥१९५॥ उचित रीति से पुटपाक का प्रयोग न होने से उत्पन्न हुए रोग दिखाई पड़ने पर पूर्वोक्त तर्पण क्रिया की भाँति चिकित्सा करनी चाहिये ॥१९५॥ ❖ व्यापत्तिदर्शने=मिथ्याकृतपुटपाकजनितव्याधिदर्शने ॥१९५॥ यहाँ 'व्यापत्तिदर्शने' पद का 'उचित रीति से पुटपाक का प्रयोग न होने से उत्पन्न हुये रोग दिखलाई पड़ने पर' यह अर्थ समझना चाहिये ॥१९५॥ अथ तर्पणपुटपाकवतस्त्याज्यविषयानाह- तेजांस्यनिलमाकाशमादर्शं भास्वराणि च । नेक्षेत तर्पिते नेत्रे यश्च वा पुटपाकवान् ॥१९६॥ तर्पण तथा पुटपाक धारण किये हुये लोगों के लिये त्याग करने योग्य कार्य-जिनकी आँखों में तर्पण तथा पुटपाक क्रिया का प्रयोग हुआ हो वे तेज से युक्त पदार्थ, आकाश, दर्पण (शीशा) तथा चमकीली वस्तु की ओर एवं हवा जिस ओर से आती हो उस ओर भी न देखें ॥१९६॥ अथाञ्जनविधिमाह- अथ सम्यक्वदोषस्य प्राप्तमञ्जनमाचरेत् । अञ्जनं क्रियते येन तद् द्रव्यं चाञ्जनं मतम् ।। अञ्जन की विधि-दोषों के पक जाने पर नेत्रों में योग्य अञ्जन लगाना चाहिये । नेत्रों में जो आँजा जाता है वह अञ्जन कहलाता है ॥१९७॥ तद्यथा- रसो वटी तथा चूर्णमिति त्रिविधमञ्जनम् । यथापूर्वं बलं तेषु स्नेहमाहुर्मनीषिणः ॥१९८॥ तत्प्रत्येकं त्रिधा प्रोक्तं लेखनं रोपणं तथा । स्नेहनं चेति लिङ्गानि तेषां विस्तरतः शृणु ।। लेखनं क्षारतीक्ष्णाम्लरसैरञ्जनमुच्यते । नेत्रवर्त्मसिराजालश्रोत्रशृङ्गाटकस्थितम् ॥१९९॥ मुखनासाऽक्षिभिर्दोषमुत्विलश्य स्रावयेच्च तत् । कषायं तिक्तकं चापि सस्नेहं रोपणं मतम् ॥२००॥ स्नेहस्य शैत्याद्धर्ण्य स्याद् दृष्टेश्च बलवर्द्धनम् । मधुरं स्नेहमण्डं तदञ्जनं स्यात्प्रसादनम् ॥२०१॥ दृष्टिदोषप्रसादार्थं स्नेहनार्थञ्च तद्धितम् । हरेणुमात्रावर्त्तिस्तु लेखनी स्यात्प्रमाणतः ॥२०२॥ सार्द्धहरेणुकामिता रोपणी वर्त्तिरिष्यते । क्रियते स्नेहनी वर्त्तिर्द्विहरेणुकमात्रया ॥२०३॥ अञ्जन के तीन भेद हैं। रसरूप, वर्त्तिरूप और चूर्णरूप इनमें चूर्ण से वर्त्ति और वर्त्ति से रस बलवान है। प्रत्येक अञ्जन के लेखन, रोपण तथा स्नेहन, इस भाँति तीन-तीन भेद हैं। इनमें जो खारा, तीक्ष्ण तथा खट्टे रस वाला अञ्जन