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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

का चूर्ण, सेंधा नमक, समुद्रफेन, कसीस, काला सुरमा, बकरी के दही का पानी इन सब से बना हुआ जो पुटपाक होता है, वह लेखन कहलाता है, इसके धारण काल की अवधि १०० गुरु अक्षरों के उच्चारण करने तक की है। स्त्री का दूध, जाङ्गल जीवों का मांस, शहद, गाय का घी तथा पञ्चतिक्तक गणोक्त ओषधियाँ इन सबों से बने हुये पुटपाक को रोपण कहते हैं। इसके धारण काल की अवधि लेखन पुटपाक से तिगुनी है अर्थात् ३०० गुरु अक्षरों के उच्चारण करने तक की है ॥१९०-१९३॥ अथ तिक्तद्रव्याण्याह- निम्बामृतावृषपटोलनिदिग्धिकाभिः स्यात्पञ्चतिक्तक इति प्रथितो गणोऽयम् ॥१९४॥ तिक्तक द्रव्य-नीम, गिलोय, अडूसा, परवल और कटेरी, इनके गण पञ्चतिक्तक नाम से प्रसिद्ध हैं, रोपण पुटपाक में इसी का प्रयोग होता है ॥१९४॥ आचरेत्तर्पणोक्तां तु क्रियां व्यापत्तिदर्शने ॥१९५॥ उचित रीति से पुटपाक का प्रयोग न होने से उत्पन्न हुए रोग दिखाई पड़ने पर पूर्वोक्त तर्पण क्रिया की भाँति चिकित्सा करनी चाहिये ॥१९५॥ ❖ व्यापत्तिदर्शने=मिथ्याकृतपुटपाकजनितव्याधिदर्शने ॥१९५॥ यहाँ 'व्यापत्तिदर्शने' पद का 'उचित रीति से पुटपाक का प्रयोग न होने से उत्पन्न हुये रोग दिखलाई पड़ने पर' यह अर्थ समझना चाहिये ॥१९५॥ अथ तर्पणपुटपाकवतस्त्याज्यविषयानाह- तेजांस्यनिलमाकाशमादर्शं भास्वराणि च । नेक्षेत तर्पिते नेत्रे यश्च वा पुटपाकवान् ॥१९६॥ तर्पण तथा पुटपाक धारण किये हुये लोगों के लिये त्याग करने योग्य कार्य-जिनकी आँखों में तर्पण तथा पुटपाक क्रिया का प्रयोग हुआ हो वे तेज से युक्त पदार्थ, आकाश, दर्पण (शीशा) तथा चमकीली वस्तु की ओर एवं हवा जिस ओर से आती हो उस ओर भी न देखें ॥१९६॥ अथाञ्जनविधिमाह- अथ सम्यक्वदोषस्य प्राप्तमञ्जनमाचरेत् । अञ्जनं क्रियते येन तद् द्रव्यं चाञ्जनं मतम् ।। अञ्जन की विधि-दोषों के पक जाने पर नेत्रों में योग्य अञ्जन लगाना चाहिये । नेत्रों में जो आँजा जाता है वह अञ्जन कहलाता है ॥१९७॥ तद्यथा- रसो वटी तथा चूर्णमिति त्रिविधमञ्जनम् । यथापूर्वं बलं तेषु स्नेहमाहुर्मनीषिणः ॥१९८॥ तत्प्रत्येकं त्रिधा प्रोक्तं लेखनं रोपणं तथा । स्नेहनं चेति लिङ्गानि तेषां विस्तरतः शृणु ।। लेखनं क्षारतीक्ष्णाम्लरसैरञ्जनमुच्यते । नेत्रवर्त्मसिराजालश्रोत्रशृङ्गाटकस्थितम् ॥१९९॥ मुखनासाऽक्षिभिर्दोषमुत्विलश्य स्रावयेच्च तत् । कषायं तिक्तकं चापि सस्नेहं रोपणं मतम् ॥२००॥ स्नेहस्य शैत्याद्धर्ण्य स्याद् दृष्टेश्च बलवर्द्धनम् । मधुरं स्नेहमण्डं तदञ्जनं स्यात्प्रसादनम् ॥२०१॥ दृष्टिदोषप्रसादार्थं स्नेहनार्थञ्च तद्धितम् । हरेणुमात्रावर्त्तिस्तु लेखनी स्यात्प्रमाणतः ॥२०२॥ सार्द्धहरेणुकामिता रोपणी वर्त्तिरिष्यते । क्रियते स्नेहनी वर्त्तिर्द्विहरेणुकमात्रया ॥२०३॥ अञ्जन के तीन भेद हैं। रसरूप, वर्त्तिरूप और चूर्णरूप इनमें चूर्ण से वर्त्ति और वर्त्ति से रस बलवान है। प्रत्येक अञ्जन के लेखन, रोपण तथा स्नेहन, इस भाँति तीन-तीन भेद हैं। इनमें जो खारा, तीक्ष्ण तथा खट्टे रस वाला अञ्जन

अथ षष्ठं धूमपानादिविधिप्रकरणम् १०५७ होता है वह लेखन अञ्जन कहलाता है । यह अञ्जन नेत्रों में, पलकों में, सिराओं में, कान में और कपाल की हड्डी में स्थित दोषों को स्थान से गिरा कर मुख, नाक और नेत्रों से निकाल देता है । कषाय, कटु रस वाला और स्नेहयुक्त जो अञ्जन होता हैं; वह रोपण कहलाता है । यह स्नेह-स्निग्ध तथा शीतल होने के कारण वर्ण को उत्तम करता है और दृष्टि के बल को बढ़ाता है । मधुर रस वाला तथा स्नेहयुक्त जो अञ्जन होता है वह प्रसादन कहलाता है । स्नेहन अञ्जन दृष्टि- दोष को शुद्ध करने के लिये तथा दृष्टि को स्निग्ध करने के लिये उपयोगी है । लेखनी वर्त्ति एक मटर के बराबर और रोपणी वर्त्ति डेढ़ मटर के बराबर तथा स्नेहनी वर्त्ति दो मटर के बराबर बनानी चाहिये ।।१९८-२०३।। रसाञ्जनस्य मात्रा तु पिष्टवर्त्तिमिता मता । चूर्णं तु लेखनं वैद्यैर्द्विशलाकं प्रदीयते ।। रोपणं त्रिशलाकं स्याच्चतस्रः स्नेहनाञ्जने ।।२०४।। रसरूप अञ्जन की मात्रा एक पिष्टवर्त्ति के बराबर बनानी चाहिये । यदि वैद्य को लेखन चूर्ण आँजना हो तो दो सलाई आँजना चाहिये । रोपण चूर्ण तीन सलाई और स्नेहन चूर्ण चार सलाई आँजना चाहिये ।।२०४।। ❖ चतस्रः शलाकाः स्नेहनाञ्जने चूर्णे ।।२०४।। यहाँ 'चतस्रः स्नेहनाञ्जने' पदों का 'स्नेहन चूर्ण चार सलाई आँजनी चाहिये' यह अर्थ समझना चाहिये ।।२०४।। मुखयोर्मुकुलाकारा कलायपरिमण्डला । अष्टाङ्गुला शलाका स्यादश्मजा धातुजाऽथ वा ।।२०५।। अञ्जन लगाने की सलाई-दोनों सिरों में कली के समान आकार वाली, आगे के भाग में मटर के समान गोल, आठ अंगुल लम्बी, पत्थर की या धातु की होनी चाहिये ।।२०५।। ❖ कलायपरिमण्डला=अग्रे कलायवद्वर्त्तुला ।।२०५।। यहाँ 'कलायपरिमण्डला' पद का 'आगे के भाग में मटर के समान गोल' यह अर्थ करना चाहिये ।।२०५।। ताम्रलोहाश्मसञ्जाता शलाका लेखने मता । सुवर्णरजतोद्भूता स्नेहने समुदाहृता ।।२०६।। अङ्गुली च मृदुत्वेन रोपणे सम्प्रयुज्यते । कृष्णभागावधिं लिम्पेदपाङ्गं यावदञ्जनम् ।।२०७।। हेमन्ते शिशिरे चैव मध्याह्नेऽञ्जनमिष्यते । पूर्वाह्ने वाऽपराह्ने वा ग्रीष्मे शरदि चेष्यते ।।२०८।। वर्षास्वनभ्रे नात्युष्णे वसन्ते तु सदैव हि । अथ वा सर्वदा प्रातः सायं वाऽञ्जनमाचरेत् ।।२०९।। नातिशीतोष्णवाताभ्रवेलायां तत्प्रयुज्यते । श्रान्तेऽथ रुदिते भीते पीतमद्ये नवज्वरे ।।२१०।। अजीर्णे वेगघाते च नाञ्जनं सम्प्रयुज्यते । रागोपदेहौ तिमिरं शूलं संरम्भमेव च ।।२११।। निद्राक्षयञ्च कुरुते निषिद्धे युक्तमञ्जनम् ।।२१२।। यदि लेखन चूर्ण लगाना हो तो ताँबे की या लोहे की अथवा पत्थर की सलाई होनी चाहिये । स्नेहन चूर्ण आँजना हो तो सोने की अथवा चाँदी की सलाई होनी चाहिये । रोपण चूर्ण आँजना हो तो अंगुली से आँजना चाहिये क्योंकि अङ्गुली कोमल होती है । अञ्जन लगाना हो तो काली पुतली के नीचे से नेत्र के कोने तक आँजे । हेमन्त और शिशिर ऋतु में मध्याह्न के समय अञ्जन आँजना चाहिये । ग्रीष्म ऋतु और शरद् ऋतु में पूर्वाह्न समय अथवा अपराह्न समय में अञ्जन आँजना चाहिये । वर्षा ऋतु में जिस समय बादल न हो और बहुत गरमी न हो उस समय आँजना चाहिये । वसन्त ऋतु में जब इच्छा हो तब अञ्जन लगावे । अथवा सर्वदा प्रातः-सायं अञ्जन लगाना चाहिये । अत्यन्त शीतलता, उष्णता, वायु तथा बादल के समय अञ्जन नहीं लगाना चाहिये । थका हुआ, रुदन किया हुआ, डरा हुआ, मदिरा पीया हुआ, नवीन ज्वरवाला, अजीर्ण युक्त और जिसने मलमूत्र के वेग को रोका हो; इन सब को अञ्जन नहीं लगाना चाहिये । यदि उपर्युक्त व्यक्ति अञ्जन लगायें तो उनके नेत्रों में लाली होती है, नेत्रों में सूजन आ जाती है, तिमिर, शूल तथा दोषों का कोप होता है और निद्रा का नाश होता है ।।२०६-२१२।। ७० भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

१०५८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ लेखनकारिणी वर्त्तिमाह- शङ्खनाभिर्बिभीतस्य मज्जा पथ्या मनःशिला । पिप्पली मरिचं कुष्ठं वचा चेति समांशकम् ।।२१३।। छागक्षीरेण सम्पेष्य वर्त्ति कुर्याद्यवोन्मिताम् । हरेणुमात्रां सम्पिष्य जलैः कुर्याद्यथाऽञ्जनम् ।।२१४।। तिमिरं मांसवृद्धिञ्च काचं पटलमर्बुदम् । रात्र्यन्धं वार्षिकं पुष्पं वर्त्तिश्चन्द्रोदया हरेत् ।।२१५।। इति चन्द्रोदया वर्त्तिर्लेखनी । लेखनकारिणी वर्त्ति—शंख की नाभि, बहेड़े की मींगी, हरड़, मैनशिल, पीपरि, काली मिर्च, कूठ और वच समान भाग लेकर बकरी के दूध में पीस कर जौ के समान बत्ती बनावे । इस बत्ती को पानी में घिसकर योग्य रीति से आँजने से तिमिर, मांसवृद्धि, काच, पटल, अर्बुद, रतौंधी और एक वर्ष का फूला नष्ट हो जाता है । इस बत्ती का नाम चन्द्रोदया वर्त्ति है । यह लेखन कारिणी है ॥२१२-२१५॥ अशीतिस्तिलपुष्पाणि षष्टिः पिप्पलितण्डुलाः । जातीपुष्पाणि पञ्चशन्मरिचानि तु षोडश ।।२१६।। सूक्ष्मं पिष्ट्वाऽम्बुना वर्त्तिः कृता कुसुमिकाऽभिधा । तिमिरार्जुनशुक्लानां नाशिनी मांसवृद्धिनुत् । एतस्या अञ्जने प्रोक्ता मात्रा सार्धहरेणुका ।।२१७।। रोपणकारिणी वर्त्ति—८० तिल के फूल, ६० पीपल के बीज, ५० चमेली के फूल और १६ दाने मिर्च पानी में बारीक पीस कर जो बत्ती बनाई जाती है, वह कुसुमिका वर्त्ति कहलाती है । यह वर्त्ति-तिमिर, अर्जुन तथा फूल और मांसवृद्धि को दूर करती है । इस वर्त्ति की आँजने में डेढ़ मटर के बराबर मात्रा कही गई है । यह कुसुमिका वर्त्ति रोपणकारिणी है ॥२१६-२१७॥ अथ स्नेहनकारिणी वर्त्तिमाह- धात्र्यक्षपथ्याबीजानि एकद्वित्रिगुणानि च । पिष्ट्वा वर्त्ति मलैः कुर्यादञ्जनं द्विहरेणुकम् ।।२१८।। नेत्रस्रावं हरत्याशु वातरक्तरुजं तथा ।।२१९।। स्नेहनकारिणी वर्त्ति—आँवले की मींगी १ भाग, बहेड़े की मींगी २ भाग, हर्रे की मींगी ३ भाग, इनको पानी में पीसकर दो मटर के बराबर नेत्रों में लगायें । इसके प्रयोग से नेत्रों से पानी गिरना तथा वातरक्तजन्य विकार नष्ट हो जाते हैं ॥२१८-२१९॥ अथ लेखनकारिणी रसक्रियामाह- तुत्थमाक्षिकसिन्धूत्थाः सिताशङ्खमनःशिलाः । गैरिकं सिन्धुफेनञ्च मरिचं चेति चूर्णयेत् ।।२२०।। संयोज्य मधुना कुर्यादञ्जनार्थं रसक्रियाम् । वर्त्मरोगार्मतमिरकाचशुक्लहरीं पराम् ।।२२१।। लेखनकारिणी रसक्रिया—नीलाथोथा (तूतिया), सोनामाखी, सेंधामनक, शक्कर, शंख का चूर्ण, मैनशिल, गेरू, समुद्रफेन और काली मिर्च; इनको खूब पीसकर मधु में मिलाकर आँजने से पलकों के रोग, अर्म, तिमिर, काच और शुक्ल रोग का बहुत शीघ्र नाश होता है ॥२२०-२२१॥ अथ रोपणी रसक्रियामाह- रसाञ्जनं सर्जरसो जातिपुष्पं मनःशिला । समुद्रफेनो लवणं गैरिकं मरिचं तथा ।।२२२।। एतत्समांशं मधुना पिष्टं प्रक्लिन्नवर्त्मने । अञ्जनं क्लेदकण्डूघ्नं पक्ष्मणाञ्च प्ररोहणम् ।।२२३।। रोपणी रसक्रिया—रसौत, राल, चमेली के फूल, मैनशिल, समुद्रफेन, सेंधा नमक, गेरू और कालीमिर्च; इन सबको समान भाग लेकर शहद में खूब बारीक पीसकर पलकों पर लगाने से पलकों का गीलापन तथा खुजली नष्ट होती है और पलकों के गिरे बाल फिर से उगने लगते हैं ॥२२२-२२३॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ षष्ठं धूमपानादिविधिप्रकरणम् १०५९ अथ स्नेहनकारिणीं रसक्रियामाह- कतकस्य फलं घृष्ट्वा मधुना नेत्रमञ्जयेत् । ईषत्कर्पूरसहितं स्मृतं नेत्रप्रसादनम् ।। २२४ ।। स्नेहनकारिणी रसक्रिया-निर्मली के फल तथा थोड़े कपूर को शहद में घिसकर आँजने से नेत्र स्निग्धतापूर्वक स्वच्छ हो जाते हैं ।। २२४ ।। अथ लेखनचूर्णमाह- दक्षाण्डत्वक्शिलाकाचशङ्खचन्दनसैन्धवैः । अञ्जनं हरते नित्यं सर्वानक्षिगदान्बलात् ।। २२५ ।। लेखन चूर्ण-मुरगे के अण्डे का छिलका, मैनशिल, काच, शंख, चन्दन तथा सेंधानमक का चूर्ण करके नित्य आँजने से लाचार होकर सम्पूर्ण नेत्रविकार नष्ट हो जाते हैं ।। २२५ ।। ❖ दक्षः=कुक्कुटः । तथा च निघण्टुः- 'कृकवाकुस्तथा दक्षः कालज्ञोऽथ शिखण्डिकः' इति ।। २२५ ।। यहाँ 'दक्ष' पद का 'कुक्कुट' अर्थात् 'मुरगा' अर्थ समझना चाहिये। क्योंकि निघण्टु में 'कृकवाकु' आदि मुरगे के संस्कृत नामों के मध्य में 'दक्ष' का पाठ है ।। २२५ ।। अथ रोपणचूर्णमाह- शिलायां रसकं पिष्ट्वा सम्यगाप्लाव्य वारिणा । गृह्णीयात्तज्जलं सर्वं त्यजेच्चूर्णमधोगतम् ।। २२६ ।। शुष्कं तच्च जलं सर्वं पर्पटीसन्निभं भवेत् । विचूर्ण्य भावयेत्सम्यक्त्रिवेलं त्रिफलारसैः ।। २२७ ।। कर्पूरस्य रजस्तत्र दशांशेन निक्षिपेत् । अञ्जयेन्नयनं तेन सर्वदोषप्रशान्तये । २१८ ।। समस्तनेत्ररोगघ्नं चूर्णमेतन्न संशयः ।। २२८ ।। रोपण चूर्ण-पत्थर के खरल में खपरिया को घोंट कर पानी में भलीभाँति भिगो दें, तत्पश्चात् उसके ऊपर के जल को निथार ले तथा नीचे के चूर्ण को फेंक दे इस जल को सुखावे जब यह पपड़ी के समान हो जाय तब उसका चूर्ण कर ले फिर हर्रा, बहेड़ा और आँवले की तीन भावना दे और फिर दशमांश कपूर का चूर्ण मिला दे। इस चूर्ण के आँजने से सम्पूर्ण दोषों की शान्ति होती है तथा नेत्रों के सम्पूर्ण रोग निःसन्देह नष्ट हो जाते हैं ।। २२६-२२८ ।। अथ स्नेहनचूर्णमाह- अग्नितप्तं हि सौवीरं निषिञ्चेत्रिफलारसैः । सप्तवेलं तथा स्तन्यैः स्त्रीणां सिक्तं विचूर्णितम् ।। २२९ ।। अञ्जयेत्तेन नयने प्रत्यहं चक्षुषोर्हितम् । सर्वानक्षिविकारांस्तु हन्यादेतन्न संशयः ।। २३० ।। स्नेहन चूर्ण-सफेद सुरमे को अग्नि में तपा तपा कर सात बार स्त्री के दूध में बुझावे। इस प्रकार यह शुद्ध सुरमे का अञ्जन नेत्रों को हितकारी होता है तथा नेत्रसम्बन्धी सम्पूर्ण विकारों का निःसन्देह नाश करता है ।। २२९-२३० ।। ❖ सौवीरं=श्वेतमञ्जनम् ।। २२९-२३० ।। यहाँ 'सौवीर' पद का 'सुफेद सुरमा' अर्थ समझना चाहिये ।। २२९-२३० ।। अथ प्रत्यञ्जनसेवनविधिमाह- गतदोषमपेताश्रु प्रपश्यत्सम्पगम्भसि । प्रक्षाल्याक्षि यक्षाल्याक्षि यथादोषं कार्यं प्रत्यञ्जनं ततः ।। २३१ ।। न वा निर्वातदोषेऽक्षिधावनं सम्प्रयोजयेत् । प्रत्यञ्जनं तत्र दद्याच्चूर्णं तीक्ष्णप्रसादनम् ।। २३२ ।। प्रत्यञ्जन सेवन विधि-नेत्रों के दोष दूर होने के पश्चात् आँसू निकल जाने पर तथा नेत्रों में देखने की शक्ति आ जाने पर नेत्रों को जल से धो डालना चाहिये। तत्पश्चात् दोषों को निःशेष करने के लिये उसी दोष के अनुसार प्रत्यञ्जन

१०६० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे (पुनः अञ्जन) करे । नेत्रों के दोष जबतक दूर न हो जायँ नेत्रों को न धोवे । धोने के पश्चात् नेत्रों में प्रत्यञ्जन आँजने से तीक्ष्ण औषधियों के प्रयोग से हुआ नेत्रों का ताप नष्ट हो जाता है ॥२३१-२३२॥ अथ नयनामृतचूर्णमाह, तद्यथा- शुद्धे नागे द्रुते तुल्यं शुद्धं सूतं विनिक्षिपेत् । कृष्णाञ्जनं तयोस्तुल्यं सर्वमेकत्र चूर्णयेत् ।।२३३।। दशमांशेन कर्पूरं तस्मिंश्चूर्णे विनिक्षिपेत् । एतत्प्रत्यञ्जनं नेत्रगद जिन्नयनामृतम् ।।२३४।। इति नयनामृतं प्रत्यञ्जनम् । नयनामृत चूर्ण-शुद्ध शीसे को पिघला कर उसमें उसके बराबर ही शुद्ध पारा डाले तथा इन दोनों के बराबर काला सुरमा डाले तत्पश्चात् इन सबका एकत्र चूर्ण करके उसमें उसका दशवां भाग कर्पूर डाले । इसका नेत्रों में प्रत्यञ्जन करने से नेत्र के रोग निःशेष हो जाते हैं । इनको 'नयनामृताञ्जन' कहते हैं ॥२३३-२३४॥ ❖ कृष्णाञ्जनं=स्रोतोऽञ्जनम् । तथा च मदनपालः- 'स्रोतोऽञ्जनन्तु तद्विद्यादञ्जनाभं यदञ्जनम्' ।।२३३-२३४।। यहाँ 'कृष्णाञ्जन' का 'काला सुरमा' अर्थ समझना चाहिये । क्योंकि मदनपाल निघण्टु में लिखा है कि—जो सुरमा काजल के समान काला होता है वह स्रोतोञ्जन अर्थात् काला सुरमा कहलाता है ॥२३३-२३४॥ अथ दृष्टिस्र्वच्छकारिणीं शलाकामाह- त्रिफलाभृङ्गशुण्ठीनां रसैस्तद्वच्च सर्पिषा । गोमूत्रमध्वजाक्षीरैः सिक्तो नागः प्रतापितः ।।२३५।। तच्छलाका हरत्येव सर्वान्नेत्रभवानादान् ।।२३६।। दृष्टि को स्वच्छ करने वाली शलाका-शुद्ध सीसे को बार-बार तपा कर त्रिफला के रस में, घी में, गोमूत्र में, शहद में और बकरी के दूध में बुझावे । फिर इस सीसे की सलाई बना कर नेत्रों में फेरने से नेत्रसम्बन्धी सम्पूर्ण रोग नष्ट हो जाते हैं ॥२३५-२३६॥ इति भेषजानां विधानानि । अथ भेषजभक्षणसमयः । तस्य पाञ्चविध्यमाह- भैषज्यमभ्यवहरेत्प्रभाते प्रायशो बुधः । कषायांस्तु विशेषेण तत्र भेदस्तु दर्शितः ।।२३७।। ज्ञेयः पञ्चविधः कालो भैषज्यग्रहणे नृणाम् । किञ्चित्सूर्योदये जाते तथा दिवसभोजने ।। सायन्तने भोजने च मुहुश्चापि तथा निशि ।।२३८।। औषध खाने के पाँच समय-बुद्धिमान् पुरुष को चाहिये कि ओषधियों को प्रायः प्रातःकाल में खावे, उसमें यदि क्वाथ पीना हो तो प्रातःकाल में ही पीवे । औषध खाने के समय पाँच हैं- (१) कुछ सूर्योदय होने के पश्चात्, (२) दिन में भोजन करने के समय, (३) सायंकाल के भोजन करने के समय, (४) बारम्बार तथा (५) रात्रि में । इस प्रकार मनुष्यों के ओषधि खाने के पाँच समय हैं ॥ तत्र प्रथमकालस्य विषयानाह- प्रायः पित्तकफोद्रेके विरेकवमनार्थयोः । लेखनार्थे च भैषज्यं प्रभातेऽनन्नमाहरेत् ।।२३९।। ओषधि सेवन का प्रथम काल-पित्त तथा कफ की अधिकता में विरेचन, वमन तथा लेखन करना हो तो प्रातःकाल बिना भोजन किये ओषधि का उपयोग करना चाहिये ॥२३९॥

अथ षष्ठं धूमपानादिविधिप्रकरणम् १०६१ अथ द्वितीयकालस्य विषयानाह- भैषज्यं विगुणेऽपाने भोजनाग्रे प्रशस्यते। अरुचौ चित्रभोज्यैश्च मिश्रं रुचिरमाहरेत् ।।२४०।। समानवाते विगुणे मन्देऽग्नावतिदीपनम्। दद्याद्भोजनमध्ये च भैषज्यं कुशलो भिषक् ।।२४१।। व्यानकोपे तु भैषज्यं भोजनान्ते समाहरेत्। हिक्काऽऽक्षेपकम्पेषु पूर्वमन्ते च भोजनात् ।।२४२।। द्वितीय काल—अपान वायुके दुष्ट होने पर दिन के भोजन से कुछ पहले औषधि लेनी चाहिये। अरुचि में भोजन के विचित्र पदार्थों के साथ खाने में रुचि होती है। यदि रोगी की नाभि में रहने वाली समान वायु दूषित हो और मन्दाग्नि हो तो बुद्धिमान् वैद्य अग्निदीपक ओषधियों को भोजन के मध्य में खिलावे। यदि सर्व शरीर में व्यापक व्यान वायु बिगड़ी हो तो भोजन के अन्त में ओषधि खिलानी चाहिये। हिचकी, आक्षेपक वायु या कम्प वायु की अधिकता हो तो भोजन के पहले और पीछे भी ओषधि खिलानी चाहिये ।।२४०-२४२।। अथ तृतीयकालस्य विषयानाह- उदाने कुपिते वाते स्वरभङ्गादिकारिणि। ग्रासग्रासान्तरे देयं भैषज्यं सान्ध्यभोजने ।।२४३।। प्राणे प्रदुष्टे सान्ध्यस्य भुक्तस्यान्ते प्रदीयते। औषधं प्रायशो धीरैः कालोऽयं स्यात्तृतीयकः ।।२४४।। तृतीय काल—स्वरभङ्ग इत्यादि को करने वाले गले में स्थित उदान वायु का यदि कोप हो तो सायङ्काल में भोजन के प्रत्येक ग्रास के साथ ओषधि देनी चाहिये। यदि हृदयस्थित प्राण वायु कुपित हो तो बुद्धिमान् वैद्य को चाहिये कि प्रायः सायंकाल के भोजन के पश्चात् ओषधि का सेवन करावे ।।२४३-२४४।। अथ चतुर्थकालस्य विषयानाह- मुहुर्मुहुश्च तृट्छर्दिहिक्काश्वासगरेषु च। सायञ्च भेषजं दद्यादिति कालश्चतुर्थकः ।।२४५।। चतुर्थ काल—प्यास, वमन, हिचकी, श्वास अथवा विषजन्य पीड़ा होने पर अन्न के साथ या बारम्बार और सायंकाल में ओषधि का सेवन करावें ।।३४५।। अथ पञ्चमकालस्य विषयानाह- ऊर्ध्वजत्रुविकारेषु लेखने बृंहणे तथा। पाचने शमने देयमनन्नं भेषजं निशि ।।२४६।। पञ्चम काल—ऊर्ध्व जत्रुगत विकार में एवं लेखनक्रिया, बृंहणक्रिया, पाचनक्रिया तथा शमनक्रियाओं में रात्रि में बिना भोजन किये ही ओषधि सेवन करानी चाहिये ।।२४६।। अथ निरन्नकोष्ठ ओषधिसेवनगुणानाह- वीर्याधिकं भवति भेषजमन्नहीनं हन्यात्तदामयमसंशयमाशु चैव। तद्बालवृद्धयुवतीमृदुभिश्च पीतं ग्लानिं परां नयति चाशु बलक्षयञ्च ।।२४७।। निरन्न कोष्ठ ओषधि सेवन के गुण—बिना भोजन किये जिस ओषधि का सेवन करता है उस ओषधि की शक्ति अधिक होती है। तथा वह ओषधि अवश्य तथा रोग को नष्ट करती है। किन्तु यदि बालक, वृद्ध, युवती स्त्रियों अथवा मृदु प्रकृति वाले मनुष्य निरन्नकोष्ठ (खाली पेट) ओषधि का सेवन करें तो उन्हें तुरन्त ग्लानि होती है तथा शरीर के बल का नाश होता है।। अथान्नेन सहौषधसेवनगुणानाह- शीघ्रं विपाकमुपयाति बलं न हिंस्यादन्नावृतं न च मुहुर्वदनान्निरेति। एतद्धितं स्थविरबालकृशाङ्गनाभ्यः प्राग्भोजनाद्यदशितं किल तच्च तद्वत् ।।२४८।। औषधशेषे भुक्तं भोजनशेषे यदौषधं पीतम्। न करोति गदीपशमम्प्रकोपयत्यन्यरोगांश्च ।।२४९।।

१०६२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अन्न के साथ ओषधि सेवन के गुण-अन्न में मिलाकर जिस ओषधि का सेवन किया जाता है वह तुरन्त पच जाती है, बल का नाश नहीं करती तथा मुख से बारम्बार निकलती भी नहीं है। वृद्ध, बालक, दुर्बल शरीर बालों को तथा स्त्रियों को इस प्रकार ओषधि का सेवन कराना हितकर है। भोजन के पहले जो ओषधि सेवन की जाती है वह गुणों में उसके सदृश ही होती है अर्थात् भोजन के साथ खाई हुई ओषधि के समान ही गुण करती है। ओषधि कुछ शेष रहने पर भोजन करे या भोजन कुछ शेष रहने पर ओषधि का सेवन करे तो वह ओषधि रोगों को निवृत्त नहीं करती तथा अन्य रोगों को कुपित करती है ।। २४८-२४९ ।। ❖ तद्वद् = अन्नावृतवद्, भेषजमिति शेषः । पीतमित्युपलक्षणं लीढादिकं च ।। २४८- २४९ ।। यहाँ 'तद्वत्' पद का 'उसके सदृश ही होती है अर्थात् भोजन के साथ खाई हुई ओषधि के समान ही गुण करती है' यह अर्थ समझना चाहिये । और 'ओषधि' पद को प्रकरणवश ऊपर से समझना चाहिये । यहाँ 'पीतम्' पद उपलक्षण है अतः 'पीवे या खाये' सभी का बोध करना चाहिये, इसी से सेवन करे, यह अर्थ किया गया है ।। २४८-२४९ ।। अथौषधपाकापाकयोश्चिह्नमाह- अनुलोमोऽनिलः स्वास्थ्यं क्षुत्तृष्णासुमनस्कताः । लघुत्वमिन्द्रियोद्गारशुद्धिर्जीर्णौषधाकृतिः ।। २५० ।। बलमो दाहोऽङ्गसदनं भ्रममूर्च्छाशिरोरुजाः । अरतिर्बलहानिश्च सावशेषौषधाकृतिः ।। २५१ ।। ओषधि के पाकापाक (पचने न पचने) का लक्षण-रोगी की यदि ओषधि पच जाती है तो वायु का अनुलोमन होता है, स्वस्थता आती है, भूख तथा प्यास लगती है, मन में प्रसन्नता होती है, शरीर में लघुता होती है और डकार शुद्ध आती है तथा यदि रोगी को ओषधि नहीं पची होती है तो ग्लानि, दाह, अङ्ग में पीड़ा, भ्रम, मूर्च्छा, सिर में दर्द, अरुचि तथा बलक्षय होता है ।। २५०-२५१ ।। अथ चरकोक्तौषधसेवनविधिमाह- देवान्गुरूस्तथा विप्रान्पूजयित्वा प्रणम्य च । आशिषश्च समादाय श्रद्धया भेषजं भजेत् ।। २५२ ।। रसायनमिवर्षीणां देवानाममृतं यथा । सुधेवोत्तमनागानां भैषज्यमिदमस्तु ते ।। २५३ ।। ब्रह्मदक्षाश्विरुद्रेन्द्रभूचन्द्रार्कनिलानलाः । देवाश्च सौषधिग्रामा भूमिदेवाश्च पान्तु वः ।। २५४ ।। औषधं हेमरजतमृद्भाजनपरिस्थितम् । पिबेदाप्तजनस्याग्रे प्रसन्नवदनेक्षणः ।। २५५ ।। प्रशान्तस्तूपविश्याथ पीत्वा पात्रमधोमुखम् । निक्षिप्याचम्य सलिलं ताम्बूलाद्यपयोजयेत् ।। २५६ ।। चरकोक्त ओषधि सेवन विधि-देवता, गुरु तथा ब्राह्मण की पूजा करने के बाद प्रणाम करके उनका आशीर्वाद लेकर श्रद्धा से ओषधि का सेवन करे और गुरु तथा ब्राह्मण रोगी को यह आशीर्वाद दें कि-जिस प्रकार रसायन ऋषियों को तथा अमृत देवताओं और नागों को रोगरहित तथा बलवान करता है उसी प्रकार यह ओषधि तुम्हें रोगरहित तथा बलवान बनावे । और ब्रह्मा, दक्ष, अश्विनीकुमार, रुद्र, इन्द्र, पृथ्वी, चन्द्रमा, सूर्य, वायु, अग्नि आदि देवता ओषधियों का समूह तथा ब्राह्मण तुम्हारी रक्षा करें । तदुपरान्त रोगी अपने मुख तथा नेत्रों को प्रसन्न रखता हुआ शान्तरूप से बैठ कर अपने प्रेमी तथा भले मनुष्यों के आगे सोने, चाँदी अथवा मिट्टी के पात्र में रखी हुई ओषधि का सेवन करे । ओषधियों के लेने के पश्चात् ओषधि के पात्र को पृथ्वी पर औंधा डाल कर रख दे तत्पश्चात् जल से आचमन करके पान इत्यादि का सेवन करे ।। इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमन्मिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे परिभाषादिप्रकरणे षष्ठं धूमपानादिविधिप्रकरणं समाप्तम् ।। ६ ।।

अथ सप्तमं रोगिपरीक्षाप्रकरणम् ।।७।। अथ चिकित्सार्थं रोगिणो वाग्भटोक्तपरीक्षामाह- दर्शनस्पर्शनप्रश्नैस्तं परीक्षेत रोगिणम्। आयुरादि दृशा स्पर्शाच्छीतादि प्रश्नतः परम् ।।१।। वाग्भटोक्त रोगी की परीक्षा-दर्शन (देखना), स्पर्श (छूना) और प्रश्न (पूछना) के द्वारा रोगी की परीक्षा करनी चाहिये। इनमें दर्शन के द्वारा आयु आदि की, स्पर्शन के द्वारा शीतादि की तथा प्रश्न के द्वारा अन्य शेष विषयों की परीक्षा करनी चाहिये ।।१।। ❖ आयुरादि=आदिशब्दात्साध्यत्वादि । दृशा=दर्शनेन, अत्र ‘सम्पदादिभ्यश्चे'ति भावे क्विप् । स्पर्शात्=स्पर्शन । शीतादि=शीतोष्णमृदुकठिनत्वादि, नाडीपरीक्षणं च । प्रश्नतः=उदरलाघवगौरवतृषाऽतृषाबुभुक्षाबलाऽबलादि ।।१।। यहाँ 'आयुरादि' पद में पठित 'आदि' शब्द से रोग के साध्यत्व तथा असाध्यत्व आदि का भी बोध करना चाहिये अर्थात् रोगी के मल-मूत्रादि तथा नेत्र, जिह्वा और मुखादि को देखकर आयु की तथा रोग के साध्यत्व-असाध्यत्व की परीक्षा करनी चाहिये । 'दृशा' पद का 'दर्शन' द्वारा यह अर्थ समझना चाहिये । दृशिर् ('दृशि-प्रेक्षणे') धातु से 'सम्पदादिभ्यश्च' इस सूत्र से भाव में 'क्विप्' प्रत्यय करने से क्विप् का सर्वापहार लोप होकर प्रातिपदिक-संज्ञक दृश् शब्द से टा विभक्ति होने पर 'दृशा' की सिद्धि होती है । 'स्पर्शात्' पद का 'स्पर्शन द्वारा' । 'शीतादि' पद का 'शीत या उष्ण, मृदु (कोमल) या कठिन आदि एवं नाड़ी की परीक्षा करना' यह समझना चाहिये अर्थात् इन सबों की स्पर्शन द्वारा ही परीक्षा होती है। 'प्रश्नतः' पद का 'पेट की लघुता तथा गुरुता, तृषा मालूम पड़ना या न मालूम पड़ना, भूख लगनी या न लगनी, दुर्बलता या सबलता की प्रश्न द्वारा परीक्षा करनी चाहिये' यह अर्थ होता है ।।१।। मिथ्यादृष्टा विकारा हि दुराख्यातास्तथैव च। तथा दुष्परिष्टाश्च मोहयेयुरिचिकित्सकान् ।।२।। जो रोग यथार्थ रूप से नेत्रादि तथा नाड़ी आदि की परीक्षा करके नहीं देखे गये हैं तथा जिनका भलीभाँति रोगी के तरफ से वर्णन न किया गया हो एवं जिनमें रोगी से पेट की गुरुता या लघुता आदि के विषय में वैद्य द्वारा प्रश्न न किया गया हो तो ऐसे रोगी की चिकित्सा करने में वैद्यों को भ्रम हो जाता है। अतः भलीभाँति से देख, सुन तथा पूछ कर रोगी की चिकित्सा करनी चाहिये ।।२।। तत्र दर्शनं नेत्रजिह्वामूत्रादीनां कर्त्तव्यम् । इसमें प्रथम दर्शन (देखना) द्वारा जो परीक्षा की जाती है उसमें रोगी के नेत्र, जिह्वा तथा मूत्र आदि को देखकर परीक्षा करनी चाहिये । तत्र नेत्रपरीक्षामाह- नेत्रं स्यात्पवनाद्रूक्षं धूम्रवर्णं तथाऽरुणम्। कोटराग्तःप्रविष्टं च तथा स्तब्धबिलोकनम् ।।३।। हरिद्राखण्डवर्णं वा रक्तं वा हरितं तथा। दीपद्वेषिसदाहञ्च नेत्रं स्यात्पित्तकोषतः ।।४।। चक्षुर्बलासबाहुल्यात्स्निग्धं स्यात्सलिलप्लुतम् । तथा धवलवर्णञ्च ज्योतिर्हीनं बलान्वितम् ।।५।। नेत्रं द्विदोषबाहुल्यात्स्याद्दोषद्वयलक्षणम्। त्रिदोषलिङ्गसङ्गेन तं मारयति रोगिणम् ।।६।। त्रिदोषदूषितं नेत्रमन्तर्मग्नं भृशं भवेत् । त्रिलिङ्गं सलिलस्रावि प्रान्तेनोन्मीलयत्यपि ।।७।। नेत्र की परीक्षा-यदि वायु का प्रकोप हो तो रोगी के नेत्र रूक्षं, धूयें के समान वर्ण वाले तथा लाल, भीतर के तरफ घुसे हुये, स्तब्ध स्वरूप से देखने वाले होते हैं और यदि पित्त का प्रकोप हो तो नेत्र हरदी के टुकड़ों के सदृश पीले वर्ण या रक्त वर्ण वा हरे रंग के होते हैं एवं दीपक की तरफ न देख सकने वाले अर्थात् विशेष प्रकाश को न सह सकने वाले तथा दाह युक्त होते हैं एवं कफ की अधिकता हो तो नेत्र स्निग्ध, जल से व्याप्त, सफेद रंग के, तेज से रहित तथा दृढ़ता युक्त होते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

१०६४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे यदि दो दोषों की अधिकता हो तो नेत्र दो दोषों के लक्षणों से और तीन दोषों की अधिकता हो तो तीन दोषों के लक्षणों से युक्त होते हैं किन्तु यदि तीन दोषों के लक्षणों से युक्त नेत्र होते हैं तो रोगी की मृत्यु कर देते हैं। जो नेत्र तीन दोषों से दूषित हो गये हैं वे भीतर की तरफ अधिक घुसे हुये होते हैं तथा उनसे अधिक जल गिरता है तथा नेत्र के प्रान्त भाग की तरफ से खुलने वाले होते हैं ॥३-७॥ अथ जिह्वापरीक्षामाह- शाकपत्रप्रभा रूक्षा स्फुटना रसनाऽनिलात् । रक्ताश्यावा भवेत्पित्ताल्लिप्तार्द्रा धवला कफात् ॥८॥ परिदग्ध खरस्पर्शा कृष्णा दोषत्रयेऽधिके । सैव दोषद्वयाधिक्ये दोषद्वितयलक्षणा ॥९॥ जिह्वा की परीक्षा-वायुदोष की अधिकता से रोगी की जिह्वा, सागोन के पत्तों के समान रूखी तथा फटी हुई होती है। पित्तदोष की अधिकता होने से जिह्वा, रक्त तथा श्याव (सफेदी लिये काले) वर्ण की होती है। एवं कफदोष की अधिकता हो तो जिह्वा कफ से लिपटी हुई, गीली तथा सफेद होती है। और तीनों दोषों की अधिकता होने से जिह्वा जली हुई के समान तथा काली एवं स्पर्श में खरखरी होती है। किन्तु यदि दो दोषों की ही अधिकता हो तो जिन दोषों की अधिकता हो उनके लक्षणों से युक्त होती है ॥८-९॥ अथ मूत्रपरीक्षामाह- वातेन पाण्डुरं मूत्रं रक्तं नीलञ्च पित्ततः । रक्तमेव भवेद्रक्ताद्ववलं फेनिलं कफात् ॥१०॥ मूत्र की परीक्षा-वात की अधिकता से रोगी का मूत्र पाण्डुर (सफेद मिश्रित पीला) वर्ण का होता है। पित्त की अधिकता से लाल तथा नील होता है। रक्त के प्रकुपित होने से रक्त ही की भांति लाल होता है एवं कफ की अधिकता से फेनयुक्त सफेद होता है ॥१०॥ अथ शरीरस्य शैत्योष्णत्वादिज्ञानार्थं स्पर्शनं कार्यम् । तत्र नाडीपरीक्षामाह- पुंसो दक्षिणहस्तस्थ स्त्रियो वामकरस्य तु । अङ्गुष्ठमूलगां नाडीं परीक्षेत भिषग्वरः ॥११॥ अङ्गुलीभिस्तु तिसृभिर्नाडीमवहितः स्पृशेत् । तच्चेष्ट्या सुखं दुःखं जानीयात्कुशलोऽखिलम् ॥१२॥ सद्यःस्नातस्य सुप्तस्य क्षुत्तृष्णाऽऽतपशीलिनः । व्यायामश्रान्तदेहस्य सम्यङ् नाडी न बुध्यते ॥१३॥ वातेऽधिके भवेन्नाडी प्रव्यक्ता तर्जनीतले । पित्ते व्यक्ता मध्यमायां तृतीयाङ्गुलिगा कफे ॥१४॥ तर्जनीमध्यमामध्ये वातपित्ताधिके स्फुटा । अनामिकायां तर्जन्‍यां व्यक्ता वातकफे भवेत् ॥१५॥ मध्यमाऽनामिकामध्ये स्फुडा पित्तकफेऽधिके । अङ्गुलित्रितयेऽपि स्यात्प्रव्यक्ता सन्निपाततः ॥१६॥ वाताद्वक्रगतिं धत्ते पित्तादुत्प्लुत्य गामिनी । कफान्मन्दगतिर्ज्ञेया सन्निपातादतिद्रुता ॥१७॥ वक्रमूत्प्लुत्य चलति धमनी वातपित्ततः । वहेद्वक्रञ्च मन्दञ्च वातश्लेष्माधिकत्वतः ॥१८॥ उत्प्लुत्य मन्दं चलति नाडी पित्तकफेऽधिके । कामात्क्रोधाद्वेगवहा क्षीणा चिन्ताभयप्लुता ॥१९॥ स्थित्वा स्थित्वा चलेद्या सा हन्ति स्थानच्युता तथा । अतिक्षीणा च शीता च प्राणान्हन्ति न संशयः ॥२०॥ ज्वरकोपेन धमनी सोष्णा वेगवती भवेत् । मन्दाग्नेः क्षीणधातोश्च सैव मन्दतरा मता ॥२१॥ चपला क्षुधितस्य यात्तृप्तस्य भवति स्थिरा । सुखिनोऽपि स्थिरा ज्ञेया तथा बलवती मता ॥२२॥ स्पर्शद्वारा नाड़ी की परीक्षा-श्रेष्ठ वैद्य रोगी यदि पुरुष हो तो उसके दाहिने हाथ के तथा स्त्री हो तो उसके बायें हाथ के अंगूठे के मूलभाग के नीचे जो नाड़ी है, उसे सावधानी से तीन अंगुलियों से छूवे, उसके बाद उसकी जैसी चेष्टा (गति) हो उसके अनुसार रोगी के सुख-दुःख को समझे। जो रोगी तत्काल स्नान कियो हो अथवा सोया हुआ हो या CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ सप्तमं रोगपरीक्षाप्रकरणम् १०६५ भूखा या प्यासा हो किं वा धूप में रहकर आया हो या व्यायाम (कसरत) आदि करने से थका हुआ हो उस समय उसकी नाड़ी की परीक्षा करने से रोगविषयक ज्ञान यथार्थ नहीं होता है। वायुदोष की अधिकता में तर्जनी अंगुली के नीचे, पित्त की अधिकता में मध्यमा अंगुली के नीचे एवं कफ की अधिकता में तीसरी अर्थात् अनामिका अंगुली के नीचे नाड़ी की गति.विशेष मालूम पड़ती है। वातपित्त की अधिकता में तर्जनी तथा मध्यमा के मध्य में और वातकफ की अधिकता में तर्जनी तथा अनामिका अंगुली के नीचे तथा पित्तकफ की अधिकता में मध्यमा तथा अनामिका के मध्य में नाड़ी की गति मालूम होती है, एवं सन्निपात (वातादि तीनों दोषों का प्रकोप) होने से तर्जनी आदि तीनों अंगुलियों के नीचे नाड़ी की गति प्रतीत होती है। वात की नाड़ी वक्रगति से, पित्तकी नाड़ी उछल-उछल कर एवं कफ की नाड़ी मन्द गति से और सन्निपात की नाड़ी अत्यन्त द्रुत गति से चलती है एवं वातपित्त की नाड़ी वक्रगति से तथा उछल-उछल कर, वातकफ की नाड़ी वक्र तथा मन्दगति से और पित्तकफ की नाड़ी उछल-२ कर तथा मन्दगति से चलती है। काम तथा क्रोध से युक्त होने पर रोगी की नाड़ी वेगयुक्त और चिन्ता तथा भय से युक्त होने पर क्षीण हुई चलती है। जिसकी नाड़ी रुक- रुक कर चलती हो या अपने स्थान से हटकर चलती हो या अत्यन्त क्षीण या अत्यन्त शीतल हो गई हो उस रोगी के प्राण जाने में कोई सन्देह नहीं करना चाहिये। ज्वर के कोप से नाड़ी गर्म तथा वेगयुक्त चलती है किन्तु जिसकी अग्नि मन्द पड़ गई है तथा जिसके धातु क्षीण हो गये हैं उसकी नाड़ी अत्यन्त मन्द गति से चलती है। भूखे लोगों की नाड़ी चञ्चल होती है तथा तृप्त हुये लोगों की नाड़ी स्थिर होती है और सुखी (रोगरहित) लोगों की भी नाड़ी स्थिर तथा बलवती होती है ॥२१-२२॥ अथ येन-येन रोगाणां ज्ञानं स्यात्तदाह- हेतुस्तदनु सम्प्राप्तिः पूर्वरूपञ्च लक्षणम्। तथैवोपशयः पञ्च रोगविज्ञानहेतवः ॥२३॥ रोग जानने के कारण-(१) हेतु, (२) सम्प्राप्ति, (३) पूर्वरूप, (४) लक्षण, (५) उपशय ये रोगों के जानने के ५ कारण हैं अर्थात् इन्हीं पाचों से वैद्यों को रोगों का यथार्थ ज्ञान होता है ॥२३॥ तत्र हेतोर्लक्षणमाह- यत्तु न स्याद्विना येन तस्य तद्धेतुरुच्यते। शास्त्रे संव्यवहाराय तत्पर्यायांश्चक्ष्महे ॥२४॥ निदानं कारणं हेतुर्निमित्तं च निबन्धनम्। मूलमायतनं तत्र प्रत्ययोऽपि निगद्यते ॥२५॥ हेतु का लक्षण-जिसके बिना जो (रोग) नहीं होता वह उस (रोग) का हेतु अर्थात् कारण कहलाता है। वैद्यकशास्त्र में सर्वत्र व्यवहार करने के लिये उसके (हेतु के) पर्यायवाचक शब्द ये हैं-निदान, कारण, हेतु, निमित्त, निबन्धन, मूल, आयतन तथा प्रत्यय ॥२४-२५॥ ❖ तत्र हेतुः। व्याधीनां ज्ञानाय हेतुर्यथा-वर्षारूक्षश्रमहिमानशनानि मैथुनशोकचिन्ताभयादयो वातप्रकोप- हेतवो वातजान् व्याधीन् बोधयन्ति। शरत्कट्वम्लोष्णातीक्ष्णक्रोधतृषाक्षुधाऽभिघातातपादयः। पित्तप्रकोप- हेतवः पित्तजान् व्याधीन् बोधयन्ति। वसन्तमधुरस्निग्धशीतादयः कफप्रकोपहेतवः कफजान् व्याधीन् बोधयन्ति ॥२४-२५॥ यहाँ यह और समझना चाहिये कि-उक्त पाँच प्रकार के रोगों के जानने के कारणों में जो प्रथम 'हेतु' नामक कारण है, उससे व्याधियों का ज्ञान होता है, जैसे कि-वर्षा ऋतु, रूक्ष पदार्थ, परिश्रम, हिम (अत्यन्त सर्दी), अनशन (भोजन न करना), मैथुन, शोक, चिन्ता तथा भय आदि ये सब वायु को प्रकुपित करने में हेतु हैं, अतः इन सबों से वायुसम्बन्धी रोगों का ज्ञान होता है। शरद् ऋतु, कटु तथा अम्लरस युक्त पदार्थ, उष्ण तथा तीक्ष्ण पदार्थ, क्रोध, प्यास, भूख, चोट लगना तथा धूप आदि ये सब पित्त को प्रकुपित करने में हेतु हैं, अतः इनसे पित्तजन्य रोगों का ज्ञान होता है। वसन्त ऋतु, मधुर तथा स्निग्ध पदार्थ तथा शीत आदि ये सब कफ को प्रकुपित करने में हेतु हैं, अतः इनसे कफजन्य रोगों का ज्ञान होता है ॥२४-२५॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

१०६६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ सम्प्राप्तिलक्षणमाह- यथा दुष्टेन दोषेण यथा चानुविसर्पता । उत्पत्तिरामयस्यासौ सम्प्राप्तिर्जातिरागतिः ॥२६॥ संप्राप्ति के लक्षण-दुष्ट हुये तथा एक स्थान से दूसरे स्थान पर फैलते हुए दोषों से रोगों की जो उत्पत्ति होती है, उसी को 'संप्राप्ति' कहते हैं । इसी के पर्यायवाची शब्द जाति तथा आ गति भी हैं ॥२६॥ ❖ यथा दुष्टेन दोषेण=यथा कारणभेदेन दुष्टेन दोषेण, यथा चानुविसर्पता=अनेकधा दोषाणां विसर्पणमूर्ध्वाधस्तिर्यगादिगतिभेदेन तथा च विसर्पता, आमवस्य या उत्पत्तिः, असौ सम्प्राप्तिः । शान्त्रे व्यवहाराय सम्प्राप्तेः पर्यायानाह-जातिरागतिरिति । सम्प्राप्तिर्व्याधीनां ज्ञानाय हेतुः । यथा-मिथ्याऽ- ऽहारविहारकुपितवाताद्यामाशयगमनरसदूषणकोष्ठाग्निवहिर्निरसनरूपं ज्वरोत्पत्तिप्रकारं बोधयति । तथा व्याधीनां संख्यादोषांशकल्पनाप्राधान्यकालांश्च बोधय

समुदितानां दोषाणाम् । अंशांशकल्पना=हीनमध्याधिकभेदैर्भागकल्पना विकल्पः ।।२८।। (Wait, in line 8: समवेतानां=समुदितानां) Line 9: यहाँ 'समवेतानां दोषाणाम्' पदों का 'एकत्र हुये दोषों की' तथा 'अंशांशकल्पना विकल्पः' पदों का 'एकत्र हुये दोषों Line 10: में से कौन दोष सबसे हीन, कौन मध्यम और कौन दोष सबसे अधिक है इस प्रकार दोषों के भागों की जो कल्पना है Line 11: उसी को विकल्प कहते हैं' यह समझना चाहिये ॥ Line 12: अथ प्राधान्यव्याख्यानमाह- Line 13: स्वातन्त्र्यपारतन्त्र्याभ्यां व्याधेः प्राधान्यमादिशेत् ।।२९।। Line 14: प्राधान्यसंप्राप्ति-रोगों की स्वतन्त्रता तथा परतन्त्रता से प्राधान्यसंप्राप्ति कहनी चाहिये ॥२९॥ Line 15: ❖ व्याधेः स्वातन्त्र्येण प्राधान्यं, पारतन्त्र्येणाप्राधान्यञ्च वदेदित्यर्थः । यथा स्वतन्त्रस्य ज्वरस्य प्राधान्यं, Line 16: ज्वराधीनानां श्वासादीनामप्राधान्यम् ।।२९।। Line 17: यहाँ यह समझना चाहिये कि-रोगों की

१०६८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ❖ नक्तमत्राव्ययं रात्रिवाचकम् । एतेनैतदुक्तं यस्मिन्नक्तादेरंशे यस्य दोषस्य प्रकोपोक्तोऽस्ति सोऽशस्तस्य दोषजस्य व्याधेः काल इत्यर्थः ।। ३१ ।। यहाँ 'नक्तम्' पद 'अव्यय है तथा रात्रिवाचक है' और 'नक्तंदिनर्तु, इत्यादि से यह कहा गया कि—'रात्रि आदि के जिस अंश में जिस दोष का प्रकोप कहा गया है वह अंश उस दोष से उत्पन्न हुये रोग के भी प्रकोप का काल होता है' यह और समझ लेना चाहिये ।। ३१ ।। नक्तादेरंशेषु वातादिप्रकोप उक्तो वाग्भटेन- ते व्यापिनोऽपि हृन्नाभ्योरधोमध्योर्ध्व संश्रयाः । वयोऽहोरात्रभुक्तानामन्तमध्यादिगाः क्रमात् ।। ३२ ।। इति । रात्रि आदि के किस अंश में किस दोष का प्रकोप होता है, इस विषय में 'वाग्भट' ने यह कहा है कि—यद्यपि वात, पित्त तथा कफ ये सब सारे शरीर में व्याप्त होकर रहने वाले हैं तथापि वे क्रम से विशेष करके हृदय तथा नाभि के नीचे, मध्य तथा ऊपर के भाग में रहते हैं अर्थात् नाभि के नीचे भाग में वायु, हृदय तथा नाभि के मध्य में पित्त और हृदय के ऊपर भाग में कफ रहता है । एवं मनुष्यों की अवस्था (बाल्य, यौवन, वृद्धता), दिन, रात्रि, भुक्त (भोजन किये हुये अन्न का परिपाक) इन सबों के अन्त, मध्य तथा आदि के भाग क्रम से वातादि के प्रकोप के काल हैं, अर्थात् अवस्था का अन्तिम भाग (वृद्धावस्था, दिन का अन्तिम भाग (२-६ बजे तक), रात्रि का अन्त्यभाग (२-६ बजे तक), भुक्त (अन्न के पचने) का अन्तिम काल वायु के प्रकोप होने का है । अवस्था का मध्यभाग (युवावस्था), दिन का मध्यभाग (१०- २ बजे तक), रात्रि का मध्य भाग (१०-२ बजे तक), भुक्त (अन्न के पचने) का मध्यकाल पित्त के प्रकोप होने का है, एवं अवस्था का आदि भाग (बाल्यावस्था), दिन का प्रथम भाग (६-१० बजे तक), रात्रि का प्रथम भाग (६-१० बजे तक), भुक्त (अन्न पचने) का आदि काल कफ के प्रकोप का काल है ।। ❖ ते=वातपित्तकफाः ।। ३२ ।। यहाँ 'ते' पद का 'वायु, पित्त तथा कफ' यह अर्थ समझना चाहिये ।। ३२ ।। ऋतुषु वातादिकोपो यथा- वर्षासु शिशिरे वायुः पित्तं शरदि चोष्णके । वसन्ते तु कफः कुप्येदेषा प्रकृतिरातर्वी ।। ३३ ।। वातादि दोषों में कौन दोष किस ऋतु में प्रकुपित होता है उसे कहते हैं—वर्षा (श्रावणभाद्रपद) तथा शिशिर ऋतु (माघ-फाल्गुन) में वायु, शरद् (क्वार-कार्तिक) तथा ग्रीष्म ऋतु (ज्येष्ठ-आषाढ़) में पित्त एवं वसन्त ऋतु (चैत्र- वैशाख) में कफ प्रकुपित होता है, इन समयों में वातादि दोष जो प्रकुपित होता है, इन समयों में वातादि दोष जो प्रकुपित होते हैं वह ऋतु के स्वभाववश होते हैं ।। ३३ ।। अथ पूर्वरूपस्य लक्षणमाह- पूर्वरूपन्तु तद्येन विद्याद्भाविनमामयम् । सामान्यं ञ्च विशिष्टञ्च द्विविधं तदुदाहृतम् ।। सामान्यं तत्र दोषाणां विशेषैरनधिष्ठितम् । विशिष्टमीषद्द्व्यक्तं स्याद् विशेषैश्च समन्वितम् ।। ३४ ।। पूर्वरूप के लक्षण—जिसके द्वारा भविष्य काल में होने वाले रोग का ज्ञान हो उसे 'पूर्वरूप' कहते हैं । वह (पूर्वरूप) दो प्रकार का होता है, (१) सामान्य पूर्वरूप, (२) विशिष्ट पूर्वरूप । उसमें सामान्य पूर्वरूप वह कहलाता है— जिसमें वातादि दोषों के विशेष लक्षण न मिले हुये हों और विशिष्ट पूर्वरूप वह कहलाता है—जिसमें रोगों के सामान्य लक्षणों के साथ-साथ दोषों के भी विशेष लक्षण किंचित् प्रकट रूप से मिले हुये हों ।। ३४ ।। ❖ दोषाणां विशेषाः=जृम्भाऽतिशयनेत्रदाहाग्निमान्द्यादयः । तत्र पूर्वरूपं व्याधीनां ज्ञानाय हेतुः । यथा- श्रमादयो भाविनं ज्वरं बोधयन्ति । अथ च त एव श्रमादयोऽतिशयितजृम्भायुक्ता भाविनं वातज्वरं, नेत्रदाहयुक्ता भाविनं पित्तज्वरं, वह्निमान्द्ययुक्ता भाविनं कफज्वरं बोधयन्ति ।। ३४ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ सप्तमं रोगिपरीक्षाप्रकरणम् १०६९ यहाँ यह और भी समझ लेना चाहिये कि-दोषों के विशेषलक्षण-अत्यन्त जँभाई होना, नेत्रों में दाह (जलन) होना, जठराग्नि का मन्द होना ये सब क्रम से वायु, पित्त तथा कफ के हैं तथा पूर्वोक्त हेत्वादि में पूर्वरूप भी रोगों को जानने के लिये कारण हैं, जैसे कि-श्रम आदि लक्षणों का प्रकट होना होने वाले ज्वर का बोधक होता है, किन्तु यदि उन्हीं श्रमादि के साथ-साथ अत्यन्त जँभाई होना यह लक्षण भी मिला हो तो होने वाले वातज्वर का बोधक होता है और यदि नेत्रों में दाह होना यह लक्षण मिला हो तो होने वाले पित्तज्वर का बोधक होता है, इसी भाँति अग्नि का मन्द होना यह लक्षण मिला हो तो होने वाले कफज्वर का बोधक होता है ॥३४॥ अथ लक्षणस्य लक्षणमाह- पूर्वरूपं विशिष्टं यद्व्यक्तं तल्लक्षणं स्मृतम्। संस्थानं लिङ्गं चिह्नञ्च व्यञ्जन रूपमाकृतिः ।। लक्षण के लक्षण-उपर्युक्त विशिष्ट पूर्वरूप में यदि वातादि दोषों के विशेष लक्षण (अत्यन्त जृम्भादि) पूर्णरूप से प्रकट हो जायँ तो वे ही लक्षण कहलाते हैं। इसके पर्यायवाची शब्द-संस्थान, लिङ्ग, चिह्न, व्यञ्जन, रूप तथा आकृति ये सब हैं ॥३५॥ ❖ विशिष्टं पूर्वरूपम् ईषद्व्यक्तरूपं, तदेव सम्यग्व्यक्तं लक्षणं स्मृतम्। तस्य शास्त्रे व्यवहाराय पर्यायानाह- संस्थानमित्यादि। लक्षणं व्याधेर्ज्ञानाय हेतुर्यथा- स्वेदावरोधः सन्तापः सर्वाङ्गग्रहणं तथा। युगपद्यत्र रोगे तु स ज्वरः परिकीर्त्तिः (१) यहाँ यह समझना चाहिये कि-विशिष्ट पूर्वरूप में जो दोषों के विशेष लक्षण किञ्चित् प्रकट हुये हैं वे ही यदि पूर्णरूप से प्रकट हो जायँ तो विशिष्ट पूर्व रूप न कहे जाकर 'लक्षण' नाम से व्यवहृत होते हैं। शास्त्रों में व्यवहार के लिये लक्षण के पर्यायवाची शब्दों को 'संस्थान' इत्यादि से कहते हैं। रोगों को जानने के लिये लक्षण भी कारण हैं। जैसे कि-पसीना न निकलना, शरीर सन्तप्त (गर्म) होना, सर्वाङ्ग जकड़ जाना, ये सब लक्षण एक साथ ही जिस रोग में प्रकट हों उसे 'ज्वर' कहते हैं ॥१॥ ❖ युगपदेतल्लक्षणं ज्वरं बोधयति (१) ।।३५।। यहाँ 'युगपद्' पद का 'पसीना न निकलना आदि ये सब लक्षण एक साथ ही न कि अलग-अलग ज्वर के बोधक होते हैं' यह अर्थ समझना चाहिये (१) ।।३५।। अथोपशयस्य लक्षणमाह- औषधान्नविहाराणामुपयोगं सुखावहम्। नृणामुपशयं विद्यात्स हि सात्म्यमिति स्मृतः ।।३६।। उपशय के लक्षण-रोगी को औषध, अन्न तथा विहार (रहन-सहन) का उपयोग यदि सुखकारक हो तो उसे 'उपशय' समझना चाहिये। इसी को 'सात्म्य' भी कहते हैं ॥३६॥ ❖ उपशयो व्याधेर्ज्ञानाय हेतुर्यत उक्तं चरकेण- 'गूढलिङ्गं सङ्कीर्णलक्षणं च व्याधिमुपशयानुपशयाभ्यां परीक्षेत' इति। तथा च सुश्रुते- 'अभ्यङ्गस्वेदनस्नेहैर्विकारो वातिकस्तु यः । न शाम्येत् तत्र विज्ञेयं रक्तमत्रास्ति दूषितम्' इति ।। ३६ ।। यहाँ यह और समझना चाहिये कि- 'उपशय' भी रोग-ज्ञान में हेतु है क्योंकि चरकाचार्य ने कहा है कि-'जिस रोग के लक्षण छिपे हों या जहाँ अन्य रोगों के भी लक्षण मिले हुये हों वहाँ उपशय तथा अनुपशय के द्वारा रोग की परीक्षा करनी चाहिये'। ऐसे सुश्रुत में भी कहा है कि- अभ्यङ्ग (तेल की मालिश), स्वेदन (पसीना निकलना) तथा स्नेह के द्वारा भी यदि वातसम्बन्धी विकार नष्ट नहीं होता है तो वहाँ 'रक्त दूषित हुआ है' यह समझना चाहिये। अर्थात् वातसम्बन्धी विकार नहीं है किन्तु रक्तसम्बन्धी विकार है ऐसा समझना चाहिये। इति ॥३६॥

१०७० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे तत्र वायोरुपशयमाह- मधुरलवणसाम्लस्निग्धनस्योष्णनिद्रा-गुरुरविकरबस्तिस्वेदसंमर्दनानि । दधिघृततिलतैलाभ्यङ्गसन्तर्पणानि-प्रकुपितपवमानं शान्तमेतानि कुर्य्युः ।।३७।। वायु के उपशय-मधुर, लवण तथा अम्लरसयुक्त पदार्थ, स्निग्ध पदार्थ, नस्य लेना, उष्ण पदार्थ, निद्रा, गुरु (भारी) द्रव्य, सूर्य की किरणें (धूप), बस्तिकर्म, स्वेदन, शरीर का मर्दन, दही, घी, तिल, तेल की मालिश, सन्तर्पण इन सबों का सेवन करने से प्रकुपित वायु का शमन होता है अर्थात् ये सब वायु के उपशय हैं ।।३७।। अथ पित्तस्योपशयमाह- तिक्तस्वादुकषायशीतपवनच्छायानिशावीजनज्योत्स्नाभूगृहयन्त्रवारिजलजं स्त्रीगात्रसंस्पर्शनम् । सर्पिःक्षीरविरेकसेकरुधिरस्रावप्रदेहादिकं-पानाहारविहारभेषजमिदं पित्तप्रशान्तिं नयेत् ।।३८।। पित्त के उपशय-तिक्त, मधुर तथा कषाय रसयुक्त पदार्थ, शीतल पदार्थ, वायु (शीतल वायु), छाया, रात्रि का समय, पंखे की वायु, चाँदनी, पृथ्वी के अन्दर बने हुये गृह (तहखाना), फुहारे का जल, कमल, युवती स्त्रियों के अङ्गों का स्पर्श, घी, दूध, विरेचन लेना, जल के द्वारा सेचन, रुधिर निकलवाना, शीतल पदार्थों का लेप आदि एवं शीतल पान, आहार, विहार तथा औषध का सेवन ये सब यथायोग्य पान, आहार, विहार तथा औषध पित्त को शान्त करने वाले होते हैं ।।३८।। अथ कफस्योपशयमाह- रूक्षक्षारकषायतिक्तकटुकव्यायामनिष्ठीवनं-धूमात्युष्णशिरोविरेकवमनस्वेदोपवासादिकम् ।। तृड्वाताध्वनियुद्धजागरजलक्रीडाऽङ्गनासेवनं-पानाहारविहारभेषजमिदं श्लेष्माणमुग्रं हरेत् ।।३९।। कफ के उपशय-रूक्ष तथा क्षार पदार्थ एवं कषाय, तिक्त तथा कटुरस युक्त पदार्थ, व्यायाम (कसरत), ओषधियों को चबा कर थूकना, धूमपान, अत्यन्त उष्ण, मस्तक का विरेचन कर्म, वमन तथा स्वेदन कर्म, उपवास आदि प्यासे रहना, वायु सेवन, पैदल चलना, मल्लयुद्ध, जागना, जलक्रीडा तथा स्त्रीप्रसङ्ग करना ये सब यथायोग्य पान, आहार, विहार तथा औषध सेवन करने से उग्र कफ को नाश करने वाले होते हैं ।।३९।। ❖ जलक्रीड़ा कफं कथं हरति तदाह-जलक्रीडाजनितशैत्येनावरुद्धोष्मा पङ्कलिप्तोऽभितः पाकाग्निरिवोग्रो भूत्वा कफं शोषयतीति समाधिः ।।३९।। यहाँ 'जलक्रीड़ा' कैसे कफ को दूर करती है इस प्रश्न का उत्तर इस प्रकार कहते हैं कि जलक्रीड़ा करने से उत्पन्न शीतलता से रुकी हुई शरीर के अन्दर की गर्मी चारों तरफ कीचड़ से लिपटे हुये पुटपाक की अग्नि की भाँति उग्र होकर कफ को सुखा डालती है अतः 'जलक्रीड़ा को कफनाशक करना उचित ही है' यह और भी समझ लेना चाहिये ।।३९।। अथ रोगनिदानविवेचनभाह- सर्वेषामेव रोगाणां निदानं कुपिता मलाः । तत्प्रकोपस्य तु प्रोक्तं विविधाहितसेवनम् ।।४०।। रोगों के निदान का विवेचन-सम्पूर्ण रोगों का कारण दोषों का कुपित होना है और दोषों के कुपित होने के कारण तो अनेक प्रकार के जो अहितकारक आहार-विहारादि हैं उनका सेवन करना ही कहा हुआ है ।।४०।। ❖ सर्वेषां रोगाणां निदानं सन्निकृष्टं कारणं, कुपिताः=स्वहेतुदुष्टा मला वातपित्तकफा एवेत्यन्वयः । तथा च वाग्भटः-'दोषा एव हि सर्वेषां रोगाणामेककारणम्' इति । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ सप्तमं रोगपरीक्षाप्रकरणम् १०७१ ननु आगन्तुजव्याधिषु व्यभिचारःस्यात्। तन्न, तत्राप्युत्पत्त्यनन्तरं दोषप्रकोपस्यावश्यम्भावित्वाद्, उत्पन्नद्रव्येषु गुणयोगस्येव। उक्तञ्च चरके- 'आगन्तुर्हि व्यथापूर्वो जायते पश्चान्निजैर्दोषैरनुबध्यत' इति। तत्रप्रकोपस्य तु=दोषप्रकोपस्य तु निदानम्, विविधाहितसेवनम्=विविधानि नानाविधानि यान्यहि- तान्यसात्म्यान्याहारादीनि तेषां सेवनम् ।।४०।। यहाँ 'सम्पूर्ण रोगों का निदान अर्थात् सन्निकृष्ट (नजदीक) कारण-कुपित अर्थात् अपने-अपने कारणों से दुष्ट हुये मल (वात, पित्त तथा कफ ये तीनों दोष) ही है' ऐसा अन्वय समझना चाहिये। रोगों के उत्पन्न होने में कारण दोष ही हैं इस विषय में 'वाग्भट' ने भी कहा है कि—'सम्पूर्ण रोगों के एक मात्र कारण वातादि दोष ही होते हैं'। अब यहाँ यह शङ्का होती है कि-आगन्तुक रोगों में वाग्भट के इस वचन का व्यभिचार होता है तो उसका उत्तर

१०७२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे 'बहु स्तोकमकाले वा भुक्तं तद्विषमाशनम्' तरोः प्रपतनम्, तरोरित्यपलक्षणम्। अतियानं=पदाभ्यामतिचलनम्। जागरो रात्रौ। वातादि- वेगाहतिः=आदिशब्देन विण्मूत्रहिक्कोद्गारच्छर्दिशुक्रक्षुत्तृषोच्छ्वासनिद्राः संगृह्यन्ते। दिनस्य त्रिधा विभक्तस्य। एवं रजनेश्च। यस्य यस्य पुनरुक्तिस्तेन वातस्यातिदुष्टिर्बोद्ध्या ।।४१-४३।। यहाँ 'नीवार' पद का 'लोकप्रसिद्ध 'तीनी'। 'त्रिपुट' का लोकप्रसिद्ध 'खेसारी'। 'सतीन' का 'गोल मटर'। 'निष्पाव' का 'सूअरा सेम के समान फल वाली राजशिम्बी का बीज (यह एक प्रकार का अन्न ही है)' 'वरटी' का लोक प्रसिद्ध बर्रे (कसुम का बीज)'। 'मङ्गल्यक' का 'मसूर' यह अर्थ समझना चाहिये। तथा 'विषमाशन (विषम भोजन)' पद से अधिक भोजन करने वाले पुरुष का थोड़ा भोजन करना, स्वल्प भोजन करने वाले का अधिक भोजन करना तथा असमय में भोजन करना जो 'विषमाशन' नाम से शास्त्रों में प्रसिद्ध है उसका ग्रहण करना चाहिये। और 'पेड़ से गिर पड़ना' यहाँ 'पेड़' यह उपलक्षण है, अतः 'पेड़ से या ऊँचे स्थान से गिर पड़ना' यह भाव समझना चाहिये। 'अतियानम्' पद का 'पैरों से अत्यन्त चलना'। 'जागर' पद का 'रात्रि में जागना'। 'वातादिवेगाहतिः' पद में पठित 'आदि' पद से 'मल, मूत्र, हिचकी, डकार, वमन, वीर्य, भूख, प्यास तथा नींद इन सबों का भी ग्रहण किया जाता है अतः इन सबों के वेग को रोकना भी वायु के प्रकुपित होने का कारण है' यह समझना चाहिये। दिन का तीन भाग कर उसके अन्तिम भाग को वायु के प्रकोप का कारण समझना चाहिये। इसी प्रकार रात्रि के विषय में भी समझना चाहिये। यहाँ 'जिसकी पुनरुक्ति हो उससे वायु अत्यन्त दूषित होती है' यह समझना चाहिये ।।४१-४३।। अथ पित्तस्य प्रकोपकारणान्याह- कट्वम्लोष्णविदाहितीक्ष्णलवणक्रोधोपवासातपस्त्रीसम्भोगतृषाक्षुधाऽभिहननव्यायाममद्यादिभिः । भुक्ते जीर्यति भोजने च शरदि ग्रीष्मे तथा प्राणिनां मध्याह्ने च तथाऽर्द्धरात्रिसमये पित्तप्रकोपो भवेत् ।।४४।। पित्त के प्रकुपित होने के कारण-कटु, अम्ल तथा लवण रसयुक्त पदार्थ एवं उष्ण, विदाही तथा तीक्ष्ण पदार्थ, क्रोध, उपवास, धूप, स्त्रीसंभोग, प्यास तथा भूख का रोकना, व्यायाम (कसरत) तथा मद्य आदि के सेवन करने से पित्त प्रकुपित होता है। एवं भोजन किये हुये अन्न के पचने के समय में, शरद् तथा ग्रीष्म ऋतु में, मध्याह्न में (१०-२ बजे दिन तक) तथा अर्द्धरात्रि (१०-२ बजे रात्रि तक) प्राणियों का पित्त प्रकुपित होता है ।।४४।। अथ विदाहिलक्षणमाह- विदाहिद्रव्यमुद्गारमम्लं कुर्यात्तथा तृषाम्। हृदि दाहञ्च जनयेत्पाकं गच्छति तञ्चिरात् ।।४५।। विदाही के लक्षण-जिसके सेवन से अम्ल उद्गार (डकार) आवे, प्यास लगे, हृदय में दाह तथा परिपाक देर में हो उसे विदाही द्रव्य कहते हैं ।।४५।। अन्यच्च- भाषैस्तिलैः कुलत्थैश्च मत्स्यैर्मेषामिषेण च। गव्येन दधितक्रेण नृणां पित्तं प्रकुप्यति ।।४६।। पित्तप्रकोप के कारणान्तर-उड़द, तिल, कुलथी, मछली तथा भेड़ का मांस, गाय की दही या मट्ठा के सेवन से भी मनुष्यों का पित्त प्रकुपित हो जाता है ।।४६।। अथ कफप्रकोपस्य कारणान्याह- गुरुपटुमधुराम्लस्निग्धमाषैस्तिलैश्च-द्रवदधिदिननिद्राशीतसर्पिःप्रपूरैः। प्रथमदिवसभागे रात्रिभागेऽपि चाद्ये- भवति हि कफकोपो भुक्तमात्रे वसन्ते ।।४७।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ सप्तमं रोगिपरीक्षाप्रकरणम् १०७३ कफ के प्रकुपित होने के कारण—गुरु पदार्थ, लवण, मधुर तथा अम्ल रस युक्त पदार्थ, स्निग्धपदार्थ, उड़द, तिल, द्रवपदार्थ, दही, दिन में सोना, शीत (सर्दी) और घी का प्रचुर भोजन (पाठान्तर में निश्चेष्टता) करने से तथा दिन और रात्रि का पहला भाग (६-१० बजे तक), भोजन करने के उपरान्त का समय एवं वसन्त ऋतु में कफ का प्रकोप होता है ॥४७॥ ❖ प्रथमदिवसभागे त्रिधा विभक्तस्य दिवसस्य प्रथमभागे, एवं रात्रेश्चाद्यभागे ।।४७।। यहाँ 'दिन तथा रात्रि का पहला भाग' कहने से 'दिन तथा रात्रि के तीन भाग करके उनमें से दोनों का पहला भाग' समझना चाहिये ॥४७॥ अथैको रोगोऽन्यरोगनिमित्तीत्याह— ननु सर्वेषां रोगाणां निदानं दुष्टा दोषा एव किमन्यदप्यस्तीति संशये चरक आह— निदानार्थकरो रोगो रोगस्याप्युपलक्ष्यते ।।४८।। 'दुष्ट हुये वातादि दोष ही संपूर्ण रोगों के उत्पन्न होने के कारण हैं ? अथवा उनसे अन्य भी कोई कारण है ? इस संशय के उत्तर में चरक ने कहा है कि—रोग के उत्पन्न करने में निदान (कारण) का कार्य करने वाला वातादि दोषों की भाँति रोग भी देखा जाता है ॥४८॥ ❖ रोगस्य निदानार्थकरो रोगोऽप्युपलक्ष्यते=दृश्यते । अत्र दृष्टान्तमाह— तद्यथा ज्वरसन्तापाद्रक्तपित्तमुदीर्यते । रक्तपित्ताज्ज्वरस्ताभ्यां श्वासश्चाप्युपजायते । प्लीहाभिवृद्ध्या जठरं जठराच्छोफ एव च ।।३।। अर्शोभ्यो जाठरं दुःखं गुल्मश्चाप्युपजायते । प्रतिश्यायादयो कासः कासात्सञ्जायते क्षयः ।। अन्ये त्वाहुमधुकोशे—रोगस्य रोगश्चेन्निदानं तथा निदानमित्येवोच्येत, तद्विहाय 'निदानार्थकर' इति वचनमेतद्द्द्योतयति । रोगस्य रोगो निदानार्थकरः=निदानकार्यकरणे सहायः । निदानन्तु रक्तपित्तादीन्कति- चिद्रोगान्प्रति ज्वरादिरेव हेतुरिति सिद्धान्तः । अत एवाग्रे स्पष्टमेवाह चरकः—'कश्चिद्धि रोगो रोगस्य हेतुर्भूत्वे'ति । प्रथमस्य रोगस्य ज्वरादेर्यो दुष्टो दोषो हेतुः स एव पश्चाद्भाविनो रक्तपित्तादेरपि रोगस्य हेतुः । 'सर्वेषामव रोगाणां निदानं कुपिता मलाः' इति नियमात् । तन्न । तदा रक्तपित्तादेरुपद्रवलक्षण एव योगेन रोगत्वविघातः स्यात्ततः सर्वेषामिति वचनं सामान्यम् । 'निदानार्थ-कर' इति विशेषवचनात् ।।४८।। यहाँ 'उपलक्ष्यते' पद का 'देखा जाता है' यह अर्थ समझना चाहिये । 'रोग भी रोग के उत्पन्न करने में कारण होता है' इस विषय में दृष्टान्त कहते हैं कि—ज्वर के सन्ताप (गर्मी) से भी रक्तपित्त और रक्तपित्त से भी ज्वर होता है तथा इन दोनों (रक्तपित्त तथा ज्वर) से भी श्वास रोग उत्पन्न होता है । एवं प्लीहा के अत्यन्त बढ़ने से भी जठर रोग तथा जठर रोग से शोथ रोग होता है और अर्श रोग (बवासीर) से भी दुःखप्रद जठर गुल्म रोग होता है एवं जुखाम से खाँसी तथा खाँसी से क्षयरोग होता है । इस विषय में अन्य लोगों का कथन 'मधुकोष' में इस प्रकार कहा हुआ है कि—यदि रोग भी रोग का निदान (कारण) होता तो चरकाचार्य अपने उपर्युक्त वचन में केवल 'निदान' पद का ही प्रयोग करते, किन्तु ऐसा न करके उन्होंने 'निदानार्थकर' इसी पद का प्रयोग किया है, जिससे यह समझा जाता है कि—रोग का रोग निदानार्थकर है अर्थात् निदान के कार्य करने में सहायक है वस्तुतः स्वयं निदान नहीं है । हां यदि (निदान) होता है तो केवल कतिपय रोगों के प्रति, क्योंकि 'रक्तपित्तादि कतिपय रोगों के प्रति ज्वरादि ही हेतु (निदान) है ऐसा सिद्धान्त है अत एव आगे स्पष्ट रूप से ही ७१ भाव.I

१०७४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे चरकाचार्य ने कहा है कि- 'कोई रोग किसी रोग का हेतु होकर' इत्यादि। कुपित मल (वातादि दोष) संपूर्ण रोगों ही के निदान (कारण) होते हैं इस नियम से यदि यह कहें कि - दुष्ट हुआ वातादि दोष जो प्रथम उत्पन्न हुए ज्वरादि का कारण है वही पीछे से उत्पन्न हुये रक्तपित्तादि रोग का भी कारण है न कि ज्वरादिक, तो ऐसा कहना ठीक नहीं है। क्योंकि यदि ज्वर के पीछे होने वाले रक्तपित्तादि का कारण ज्वरादि को नहीं माना जाय तो उसे (रक्तपित्तादि को) उसके (ज्वर के) उपद्रव के लक्षणों के अन्दर मानने से रक्तपित्तादि को स्वतंत्र रोग मानना ही नष्ट हो जायगा, अतः 'कुपित मल (वातादि दोष) सम्पूर्ण रोगों ही के कारण होते हैं' यह सामान्य वचन है इसका 'निदानार्थकर' इत्यादि अर्थात् पूर्वोक्त 'रोग के निदान कार्य को करने वाला रोग भी देखा जाता है' इस विशेष वचन से बाध होता है ॥४८॥ अथ रोगस्थ हेतो रोगस्य वैचित्र्यमाह- कश्चिद्धि रोगो रोगस्य हेतुर्भूत्वा प्रशाम्यति ॥४९॥ ❖ यथा ज्वरो रक्तपित्तमुत्पाद्य स्वयं प्रशाम्यति । ननु येन दोषोद्रेकेण ज्वरो रक्तपित्तमुत्पादितवांस्तस्मिन् सति स तु ज्वरः कथं शाम्यति ? तत्र व्याधिस्वभाव एव कारणमिति न दोषः ॥४९॥ रोग के कारण स्वरूप रोग की विचित्रता-'कोई रोग किसी रोग का कारण होकर अर्थात् उसे उत्पन्न करके स्वयं नष्ट हो जाता है। जैसे ज्वर रक्तपित्त को उत्पन्न करके स्वयं नष्ट हो जाता है। यहाँ यह शङ्का होती है कि-जिस वातादि दोष के कुपित होने से उत्पन्न हुआ ज्वर रक्तपित्त को उत्पन्न किया, उस दोष के कुपित रहते हुये वह ज्वर कैसे नष्ट हो जाता है, क्योंकि जब कारण है तब कार्य का रहना आवश्यक है। इसका समाधान यह है कि-वहाँ जो वैसा होता है उसमें कारण केवल व्याधि का स्वभाव ही है, अतः कोई दोष नहीं है ॥४९॥ न प्रशाम्यति चाप्यन्यो हेत्वर्थं कुरुतेऽपि च ॥५०॥ कोई रोग हेतु के अर्थ को अर्थात् किसी रोग को उत्पन्न भी करता है किन्तु स्वयं शान्त (नष्ट) भी नहीं होता ॥५०॥ अन्यो हेत्वर्थमपि कुरुते स्वयञ्च न प्रशाम्यति । यथा प्रतिश्यायः कासं करोति स्वयञ्च न प्रशाम्यति । तथाऽर्शो जठरगुल्मं करोति स्वयञ्च न निवर्त्तत इति ॥५०॥ यहाँ यह समझना चाहिये कि 'अन्य अर्थात् कोई रोग किसी रोग के हेतु के अर्थ को करता है अर्थात् रोग की उत्पत्ति करता है किन्तु पूर्व की भाँति स्वयं शान्त भी नहीं होता है-जैसे कि जुखाम आदि रोग कास रोग को उत्पन्न करता है किन्तु स्वयं शान्त नहीं होता । तथा अर्श (बवासीर) रोग जठर तथा गुल्मरोग को उत्पन्न करता है किन्तु स्वयं निवृत्त नहीं होता है ॥५०॥ अथ वृद्धक्षीणानां दोषधातुमलानां सुश्रुतोक्तचिकित्सामाह- अत्यन्तकुत्सितावेतौ सदा स्थूलकृशौ नरौ । श्रेष्ठो मध्यशरीरस्तु स्थूलः क्षीणो न पूजितः ॥ कर्षयेद् बृंहयेच्चापि सदा स्थूलकृशौ नरौ । रक्षणश्चापि मध्यस्य कुर्वीत कुशलो भिषक् ।। ५१ ।। बढ़े तथा क्षीण हुये दोष, धातु तथा मल की सुश्रुतोक्त चिकित्सा-सर्वदा स्थूल (मोटा) या कृश (दुबला) शरीर वाले मनुष्य अत्यन्त कुत्सित समझे जाते हैं अर्थात् ये दोनों रोगी की भाँति चिकित्सा करने योग्य होते हैं । किन्तु जो मध्यम शरीर वाला अर्थात् न स्थूल तथा न कृश होता है वह उत्तम (स्वास्थ्यवान्) समझा जाता है । स्थूल तथा क्षीण शरीर वाला उत्तम नहीं समझा जाता है अत एव निपुण वैद्य को स्थूल तथा कृश शरीर वाले मनुष्यों की क्रम से स्थूल के लिये कर्षण चिकित्सा तथा कृश के लिये बृंहण चिकित्सा करनी चाहिये। और मध्यम शरीर वाले की चिकित्सा से सदा रक्षा करनी चाहिये जिससे वह स्थूल तथा कृश न होने पाये ॥५१॥

अथ सप्तमं रोगिपरीक्षाप्रकरणम् १०७५ अन्यच्च- क्षपयेद् बृंहयेच्चापि दोषधातुमलान्भिषक् । नरो रोगान्वितो यावद्रोगेण रहितो भवेत् ।।५२।। और भी कहा है कि-जब तक रोगी रोगे से रहित न हो जाय तब तक वैद्य को चाहिये कि वह रोगी के दोष, धातु तथा मल की योग्यतानुसार कर्षण तथा बृंहण क्रिया करता रहे ।।५२।। ❖ क्षपयेद्=अतिप्रवृद्धान्दोषधातुमलांस्तत्र क्षैण्यहेतुभिरौषधान्नविहारैर्ह्रासयित्वा समी कुर्यात् । बृंहयेत्=क्षीणान्दोषादींस्तद्वृद्धिहेतुभिरौषधान्नविहारैर्वर्द्धयित्वा समीकुर्यात् ।। यहाँ 'क्षपयेत्' पद का 'कर्षण क्रिया करता रहे अर्थात् यदि दोष, धातु या मल इनमें से जो भी अत्यन्त बढ़े हुए हों तो वहां दोषादि के क्षीण करने वाले औषध, अन्न तथा विहार का सेवन द्वारा उनको कम करके समभाव में रखता रहे' तथा 'बृंहयेत्' पद का 'बृंहण क्रिया करता रहे अर्थात् क्षीण हुये दोषादि को उनकी वृद्धि करने वाले जो औषध, अन्न तथा विहार हों उनके सेवन द्वारा बढ़ाकर समभाव में रखता रहे' यह अर्थ समझना चाहिये ।।५२।। अस्वस्थो येन विधिना स्वस्थो भवति मानवः । तमेव कारयेद्वैद्यो यतः स्वास्थ्यं सदेप्सितम् ।।५३।। जिस विधि के करने से अस्वस्थ मनुष्य स्वस्थ हो, वैद्य को उचित है कि वह उसी विधि को मनुष्य से करावे, क्योंकि सभी को स्वास्थ्य सदा ईप्सित रहता है ।।५३।। अथ स्वस्थस्य लक्षणमाह- समदोषः समाग्निश्च समधातुमलक्रियः । प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते ।।५४।। स्वस्थ मनुष्य के लक्षण-जिस मनुष्य के दोष समभाव में हों अर्थात् न बढ़े हों और न कम हों, जठराग्नि भी सम (न तीक्ष्ण और न मन्द) हो, धातु, मल और क्रियायें सभी सम हों तथा शरीर, इन्द्रिय और मन प्रसन्न हों वही स्वस्थ मनुष्य कहलाता है ।।५४।। ❖ समक्रियः=शरीरानुरूपकर्मा । आत्माऽत्र शरीरम् ।।५४।। यहाँ 'समक्रिय' पद का 'क्रियायें सम हों अर्थात् शरीर के अनुरूप कर्म (क्रियायें) होते हों' तथा 'आत्मा' पद का 'शरीर' अर्थ समझना चाहिये ।।५४।। तन्त्रान्तरेऽपि- विण्मूत्राखिलदोषधातुसमता काङ्क्षाऽन्नपाने रुचिर्भुक्तं जीर्यति पुष्टये परिणतिः स्वप्नावबोधौः सुखम् ।। गृह्णीते विषयान्यथास्वमुचिता-वृत्तिं मनोवृत्तिः । स्वस्थस्याभिहितं चतुर्दशविधं जन्तोरिदं लक्षणम् ।।५५।। ग्रन्थान्तर में भी कहा है कि-मल, मूत्र, सम्पूर्ण दोष तथा संपूर्ण धातु इन सबों का समभाव में रहना, अन्न- पान (खाने-पीने) की इच्छा, शरीर की कान्ति, भोजन किये हुए अन्न का पचना, अन्न पचने के परिणामस्वरूप देह का पुष्ट होना, सुखपूर्वक सोना तथा सुखपूर्वक जागना, जिन इन्द्रियों के जो विषय हों उनका उचित रीति से ग्रहण करना, मनोवृत्ति के अनुसार ठीक-ठीक काम कर लेना ये १४ लक्षण स्वस्थ मनुष्य के कहे हुये हैं ।।५५।। ❖ रुचिः=शरीरकान्तिः । ननु-अहर्निशर्तुभुक्तवत्सु दोषाणां वृद्धेः कथं समदोषता ? उच्यते=अहोरात्र- प्रथमभागादिषु तत्तद्दोषवृद्धेः स्वस्थवृत्तोक्तविधिभिरुपशान्तात्समदोषतेति न दोषः । किञ्च- यत्समत्वं हि दोषाणां भिषग्भिरवधार्यते । न तत्स्वास्थ्यं विना वस्तुं शक्यमन्येन हेतुना ।। तेन समदोषस्वास्थ्योर्लक्षणमन्योऽन्यापेक्षया स्वस्थः समदोषः, समदोषः स्वस्थः स्वस्थेभ्यो हितं च- तद्दोषधातुमलानां स्वप्रमाणस्थितानां साम्यानुवृत्तिहेतुर्यद्व्यापच्च स्वस्थस्यानुवृत्तिं करोति, ऋतुचर्याऽध्याये सेव्यत्वेनोक्तम्,