भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ सप्तमं रोगपरीक्षाप्रकरणम् १०६५ भूखा या प्यासा हो किं वा धूप में रहकर आया हो या व्यायाम (कसरत) आदि करने से थका हुआ हो उस समय उसकी नाड़ी की परीक्षा करने से रोगविषयक ज्ञान यथार्थ नहीं होता है। वायुदोष की अधिकता में तर्जनी अंगुली के नीचे, पित्त की अधिकता में मध्यमा अंगुली के नीचे एवं कफ की अधिकता में तीसरी अर्थात् अनामिका अंगुली के नीचे नाड़ी की गति.विशेष मालूम पड़ती है। वातपित्त की अधिकता में तर्जनी तथा मध्यमा के मध्य में और वातकफ की अधिकता में तर्जनी तथा अनामिका अंगुली के नीचे तथा पित्तकफ की अधिकता में मध्यमा तथा अनामिका के मध्य में नाड़ी की गति मालूम होती है, एवं सन्निपात (वातादि तीनों दोषों का प्रकोप) होने से तर्जनी आदि तीनों अंगुलियों के नीचे नाड़ी की गति प्रतीत होती है। वात की नाड़ी वक्रगति से, पित्तकी नाड़ी उछल-उछल कर एवं कफ की नाड़ी मन्द गति से और सन्निपात की नाड़ी अत्यन्त द्रुत गति से चलती है एवं वातपित्त की नाड़ी वक्रगति से तथा उछल-उछल कर, वातकफ की नाड़ी वक्र तथा मन्दगति से और पित्तकफ की नाड़ी उछल-२ कर तथा मन्दगति से चलती है। काम तथा क्रोध से युक्त होने पर रोगी की नाड़ी वेगयुक्त और चिन्ता तथा भय से युक्त होने पर क्षीण हुई चलती है। जिसकी नाड़ी रुक- रुक कर चलती हो या अपने स्थान से हटकर चलती हो या अत्यन्त क्षीण या अत्यन्त शीतल हो गई हो उस रोगी के प्राण जाने में कोई सन्देह नहीं करना चाहिये। ज्वर के कोप से नाड़ी गर्म तथा वेगयुक्त चलती है किन्तु जिसकी अग्नि मन्द पड़ गई है तथा जिसके धातु क्षीण हो गये हैं उसकी नाड़ी अत्यन्त मन्द गति से चलती है। भूखे लोगों की नाड़ी चञ्चल होती है तथा तृप्त हुये लोगों की नाड़ी स्थिर होती है और सुखी (रोगरहित) लोगों की भी नाड़ी स्थिर तथा बलवती होती है ॥२१-२२॥ अथ येन-येन रोगाणां ज्ञानं स्यात्तदाह- हेतुस्तदनु सम्प्राप्तिः पूर्वरूपञ्च लक्षणम्। तथैवोपशयः पञ्च रोगविज्ञानहेतवः ॥२३॥ रोग जानने के कारण-(१) हेतु, (२) सम्प्राप्ति, (३) पूर्वरूप, (४) लक्षण, (५) उपशय ये रोगों के जानने के ५ कारण हैं अर्थात् इन्हीं पाचों से वैद्यों को रोगों का यथार्थ ज्ञान होता है ॥२३॥ तत्र हेतोर्लक्षणमाह- यत्तु न स्याद्विना येन तस्य तद्धेतुरुच्यते। शास्त्रे संव्यवहाराय तत्पर्यायांश्चक्ष्महे ॥२४॥ निदानं कारणं हेतुर्निमित्तं च निबन्धनम्। मूलमायतनं तत्र प्रत्ययोऽपि निगद्यते ॥२५॥ हेतु का लक्षण-जिसके बिना जो (रोग) नहीं होता वह उस (रोग) का हेतु अर्थात् कारण कहलाता है। वैद्यकशास्त्र में सर्वत्र व्यवहार करने के लिये उसके (हेतु के) पर्यायवाचक शब्द ये हैं-निदान, कारण, हेतु, निमित्त, निबन्धन, मूल, आयतन तथा प्रत्यय ॥२४-२५॥ ❖ तत्र हेतुः। व्याधीनां ज्ञानाय हेतुर्यथा-वर्षारूक्षश्रमहिमानशनानि मैथुनशोकचिन्ताभयादयो वातप्रकोप- हेतवो वातजान् व्याधीन् बोधयन्ति। शरत्कट्वम्लोष्णातीक्ष्णक्रोधतृषाक्षुधाऽभिघातातपादयः। पित्तप्रकोप- हेतवः पित्तजान् व्याधीन् बोधयन्ति। वसन्तमधुरस्निग्धशीतादयः कफप्रकोपहेतवः कफजान् व्याधीन् बोधयन्ति ॥२४-२५॥ यहाँ यह और समझना चाहिये कि-उक्त पाँच प्रकार के रोगों के जानने के कारणों में जो प्रथम 'हेतु' नामक कारण है, उससे व्याधियों का ज्ञान होता है, जैसे कि-वर्षा ऋतु, रूक्ष पदार्थ, परिश्रम, हिम (अत्यन्त सर्दी), अनशन (भोजन न करना), मैथुन, शोक, चिन्ता तथा भय आदि ये सब वायु को प्रकुपित करने में हेतु हैं, अतः इन सबों से वायुसम्बन्धी रोगों का ज्ञान होता है। शरद् ऋतु, कटु तथा अम्लरस युक्त पदार्थ, उष्ण तथा तीक्ष्ण पदार्थ, क्रोध, प्यास, भूख, चोट लगना तथा धूप आदि ये सब पित्त को प्रकुपित करने में हेतु हैं, अतः इनसे पित्तजन्य रोगों का ज्ञान होता है। वसन्त ऋतु, मधुर तथा स्निग्ध पदार्थ तथा शीत आदि ये सब कफ को प्रकुपित करने में हेतु हैं, अतः इनसे कफजन्य रोगों का ज्ञान होता है ॥२४-२५॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA