भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 1115, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1115

१०६४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे यदि दो दोषों की अधिकता हो तो नेत्र दो दोषों के लक्षणों से और तीन दोषों की अधिकता हो तो तीन दोषों के लक्षणों से युक्त होते हैं किन्तु यदि तीन दोषों के लक्षणों से युक्त नेत्र होते हैं तो रोगी की मृत्यु कर देते हैं। जो नेत्र तीन दोषों से दूषित हो गये हैं वे भीतर की तरफ अधिक घुसे हुये होते हैं तथा उनसे अधिक जल गिरता है तथा नेत्र के प्रान्त भाग की तरफ से खुलने वाले होते हैं ॥३-७॥ अथ जिह्वापरीक्षामाह- शाकपत्रप्रभा रूक्षा स्फुटना रसनाऽनिलात् । रक्ताश्यावा भवेत्पित्ताल्लिप्तार्द्रा धवला कफात् ॥८॥ परिदग्ध खरस्पर्शा कृष्णा दोषत्रयेऽधिके । सैव दोषद्वयाधिक्ये दोषद्वितयलक्षणा ॥९॥ जिह्वा की परीक्षा-वायुदोष की अधिकता से रोगी की जिह्वा, सागोन के पत्तों के समान रूखी तथा फटी हुई होती है। पित्तदोष की अधिकता होने से जिह्वा, रक्त तथा श्याव (सफेदी लिये काले) वर्ण की होती है। एवं कफदोष की अधिकता हो तो जिह्वा कफ से लिपटी हुई, गीली तथा सफेद होती है। और तीनों दोषों की अधिकता होने से जिह्वा जली हुई के समान तथा काली एवं स्पर्श में खरखरी होती है। किन्तु यदि दो दोषों की ही अधिकता हो तो जिन दोषों की अधिकता हो उनके लक्षणों से युक्त होती है ॥८-९॥ अथ मूत्रपरीक्षामाह- वातेन पाण्डुरं मूत्रं रक्तं नीलञ्च पित्ततः । रक्तमेव भवेद्रक्ताद्ववलं फेनिलं कफात् ॥१०॥ मूत्र की परीक्षा-वात की अधिकता से रोगी का मूत्र पाण्डुर (सफेद मिश्रित पीला) वर्ण का होता है। पित्त की अधिकता से लाल तथा नील होता है। रक्त के प्रकुपित होने से रक्त ही की भांति लाल होता है एवं कफ की अधिकता से फेनयुक्त सफेद होता है ॥१०॥ अथ शरीरस्य शैत्योष्णत्वादिज्ञानार्थं स्पर्शनं कार्यम् । तत्र नाडीपरीक्षामाह- पुंसो दक्षिणहस्तस्थ स्त्रियो वामकरस्य तु । अङ्गुष्ठमूलगां नाडीं परीक्षेत भिषग्वरः ॥११॥ अङ्गुलीभिस्तु तिसृभिर्नाडीमवहितः स्पृशेत् । तच्चेष्ट्या सुखं दुःखं जानीयात्कुशलोऽखिलम् ॥१२॥ सद्यःस्नातस्य सुप्तस्य क्षुत्तृष्णाऽऽतपशीलिनः । व्यायामश्रान्तदेहस्य सम्यङ् नाडी न बुध्यते ॥१३॥ वातेऽधिके भवेन्नाडी प्रव्यक्ता तर्जनीतले । पित्ते व्यक्ता मध्यमायां तृतीयाङ्गुलिगा कफे ॥१४॥ तर्जनीमध्यमामध्ये वातपित्ताधिके स्फुटा । अनामिकायां तर्जन्‍यां व्यक्ता वातकफे भवेत् ॥१५॥ मध्यमाऽनामिकामध्ये स्फुडा पित्तकफेऽधिके । अङ्गुलित्रितयेऽपि स्यात्प्रव्यक्ता सन्निपाततः ॥१६॥ वाताद्वक्रगतिं धत्ते पित्तादुत्प्लुत्य गामिनी । कफान्मन्दगतिर्ज्ञेया सन्निपातादतिद्रुता ॥१७॥ वक्रमूत्प्लुत्य चलति धमनी वातपित्ततः । वहेद्वक्रञ्च मन्दञ्च वातश्लेष्माधिकत्वतः ॥१८॥ उत्प्लुत्य मन्दं चलति नाडी पित्तकफेऽधिके । कामात्क्रोधाद्वेगवहा क्षीणा चिन्ताभयप्लुता ॥१९॥ स्थित्वा स्थित्वा चलेद्या सा हन्ति स्थानच्युता तथा । अतिक्षीणा च शीता च प्राणान्हन्ति न संशयः ॥२०॥ ज्वरकोपेन धमनी सोष्णा वेगवती भवेत् । मन्दाग्नेः क्षीणधातोश्च सैव मन्दतरा मता ॥२१॥ चपला क्षुधितस्य यात्तृप्तस्य भवति स्थिरा । सुखिनोऽपि स्थिरा ज्ञेया तथा बलवती मता ॥२२॥ स्पर्शद्वारा नाड़ी की परीक्षा-श्रेष्ठ वैद्य रोगी यदि पुरुष हो तो उसके दाहिने हाथ के तथा स्त्री हो तो उसके बायें हाथ के अंगूठे के मूलभाग के नीचे जो नाड़ी है, उसे सावधानी से तीन अंगुलियों से छूवे, उसके बाद उसकी जैसी चेष्टा (गति) हो उसके अनुसार रोगी के सुख-दुःख को समझे। जो रोगी तत्काल स्नान कियो हो अथवा सोया हुआ हो या CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA