भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ सप्तमं रोगिपरीक्षाप्रकरणम् १०७५ अन्यच्च- क्षपयेद् बृंहयेच्चापि दोषधातुमलान्भिषक् । नरो रोगान्वितो यावद्रोगेण रहितो भवेत् ।।५२।। और भी कहा है कि-जब तक रोगी रोगे से रहित न हो जाय तब तक वैद्य को चाहिये कि वह रोगी के दोष, धातु तथा मल की योग्यतानुसार कर्षण तथा बृंहण क्रिया करता रहे ।।५२।। ❖ क्षपयेद्=अतिप्रवृद्धान्दोषधातुमलांस्तत्र क्षैण्यहेतुभिरौषधान्नविहारैर्ह्रासयित्वा समी कुर्यात् । बृंहयेत्=क्षीणान्दोषादींस्तद्वृद्धिहेतुभिरौषधान्नविहारैर्वर्द्धयित्वा समीकुर्यात् ।। यहाँ 'क्षपयेत्' पद का 'कर्षण क्रिया करता रहे अर्थात् यदि दोष, धातु या मल इनमें से जो भी अत्यन्त बढ़े हुए हों तो वहां दोषादि के क्षीण करने वाले औषध, अन्न तथा विहार का सेवन द्वारा उनको कम करके समभाव में रखता रहे' तथा 'बृंहयेत्' पद का 'बृंहण क्रिया करता रहे अर्थात् क्षीण हुये दोषादि को उनकी वृद्धि करने वाले जो औषध, अन्न तथा विहार हों उनके सेवन द्वारा बढ़ाकर समभाव में रखता रहे' यह अर्थ समझना चाहिये ।।५२।। अस्वस्थो येन विधिना स्वस्थो भवति मानवः । तमेव कारयेद्वैद्यो यतः स्वास्थ्यं सदेप्सितम् ।।५३।। जिस विधि के करने से अस्वस्थ मनुष्य स्वस्थ हो, वैद्य को उचित है कि वह उसी विधि को मनुष्य से करावे, क्योंकि सभी को स्वास्थ्य सदा ईप्सित रहता है ।।५३।। अथ स्वस्थस्य लक्षणमाह- समदोषः समाग्निश्च समधातुमलक्रियः । प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते ।।५४।। स्वस्थ मनुष्य के लक्षण-जिस मनुष्य के दोष समभाव में हों अर्थात् न बढ़े हों और न कम हों, जठराग्नि भी सम (न तीक्ष्ण और न मन्द) हो, धातु, मल और क्रियायें सभी सम हों तथा शरीर, इन्द्रिय और मन प्रसन्न हों वही स्वस्थ मनुष्य कहलाता है ।।५४।। ❖ समक्रियः=शरीरानुरूपकर्मा । आत्माऽत्र शरीरम् ।।५४।। यहाँ 'समक्रिय' पद का 'क्रियायें सम हों अर्थात् शरीर के अनुरूप कर्म (क्रियायें) होते हों' तथा 'आत्मा' पद का 'शरीर' अर्थ समझना चाहिये ।।५४।। तन्त्रान्तरेऽपि- विण्मूत्राखिलदोषधातुसमता काङ्क्षाऽन्नपाने रुचिर्भुक्तं जीर्यति पुष्टये परिणतिः स्वप्नावबोधौः सुखम् ।। गृह्णीते विषयान्यथास्वमुचिता-वृत्तिं मनोवृत्तिः । स्वस्थस्याभिहितं चतुर्दशविधं जन्तोरिदं लक्षणम् ।।५५।। ग्रन्थान्तर में भी कहा है कि-मल, मूत्र, सम्पूर्ण दोष तथा संपूर्ण धातु इन सबों का समभाव में रहना, अन्न- पान (खाने-पीने) की इच्छा, शरीर की कान्ति, भोजन किये हुए अन्न का पचना, अन्न पचने के परिणामस्वरूप देह का पुष्ट होना, सुखपूर्वक सोना तथा सुखपूर्वक जागना, जिन इन्द्रियों के जो विषय हों उनका उचित रीति से ग्रहण करना, मनोवृत्ति के अनुसार ठीक-ठीक काम कर लेना ये १४ लक्षण स्वस्थ मनुष्य के कहे हुये हैं ।।५५।। ❖ रुचिः=शरीरकान्तिः । ननु-अहर्निशर्तुभुक्तवत्सु दोषाणां वृद्धेः कथं समदोषता ? उच्यते=अहोरात्र- प्रथमभागादिषु तत्तद्दोषवृद्धेः स्वस्थवृत्तोक्तविधिभिरुपशान्तात्समदोषतेति न दोषः । किञ्च- यत्समत्वं हि दोषाणां भिषग्भिरवधार्यते । न तत्स्वास्थ्यं विना वस्तुं शक्यमन्येन हेतुना ।। तेन समदोषस्वास्थ्योर्लक्षणमन्योऽन्यापेक्षया स्वस्थः समदोषः, समदोषः स्वस्थः स्वस्थेभ्यो हितं च- तद्दोषधातुमलानां स्वप्रमाणस्थितानां साम्यानुवृत्तिहेतुर्यद्व्यापच्च स्वस्थस्यानुवृत्तिं करोति, ऋतुचर्याऽध्याये सेव्यत्वेनोक्तम्,