भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 1125

१०७४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे चरकाचार्य ने कहा है कि- 'कोई रोग किसी रोग का हेतु होकर' इत्यादि। कुपित मल (वातादि दोष) संपूर्ण रोगों ही के निदान (कारण) होते हैं इस नियम से यदि यह कहें कि - दुष्ट हुआ वातादि दोष जो प्रथम उत्पन्न हुए ज्वरादि का कारण है वही पीछे से उत्पन्न हुये रक्तपित्तादि रोग का भी कारण है न कि ज्वरादिक, तो ऐसा कहना ठीक नहीं है। क्योंकि यदि ज्वर के पीछे होने वाले रक्तपित्तादि का कारण ज्वरादि को नहीं माना जाय तो उसे (रक्तपित्तादि को) उसके (ज्वर के) उपद्रव के लक्षणों के अन्दर मानने से रक्तपित्तादि को स्वतंत्र रोग मानना ही नष्ट हो जायगा, अतः 'कुपित मल (वातादि दोष) सम्पूर्ण रोगों ही के कारण होते हैं' यह सामान्य वचन है इसका 'निदानार्थकर' इत्यादि अर्थात् पूर्वोक्त 'रोग के निदान कार्य को करने वाला रोग भी देखा जाता है' इस विशेष वचन से बाध होता है ॥४८॥ अथ रोगस्थ हेतो रोगस्य वैचित्र्यमाह- कश्चिद्धि रोगो रोगस्य हेतुर्भूत्वा प्रशाम्यति ॥४९॥ ❖ यथा ज्वरो रक्तपित्तमुत्पाद्य स्वयं प्रशाम्यति । ननु येन दोषोद्रेकेण ज्वरो रक्तपित्तमुत्पादितवांस्तस्मिन् सति स तु ज्वरः कथं शाम्यति ? तत्र व्याधिस्वभाव एव कारणमिति न दोषः ॥४९॥ रोग के कारण स्वरूप रोग की विचित्रता-'कोई रोग किसी रोग का कारण होकर अर्थात् उसे उत्पन्न करके स्वयं नष्ट हो जाता है। जैसे ज्वर रक्तपित्त को उत्पन्न करके स्वयं नष्ट हो जाता है। यहाँ यह शङ्का होती है कि-जिस वातादि दोष के कुपित होने से उत्पन्न हुआ ज्वर रक्तपित्त को उत्पन्न किया, उस दोष के कुपित रहते हुये वह ज्वर कैसे नष्ट हो जाता है, क्योंकि जब कारण है तब कार्य का रहना आवश्यक है। इसका समाधान यह है कि-वहाँ जो वैसा होता है उसमें कारण केवल व्याधि का स्वभाव ही है, अतः कोई दोष नहीं है ॥४९॥ न प्रशाम्यति चाप्यन्यो हेत्वर्थं कुरुतेऽपि च ॥५०॥ कोई रोग हेतु के अर्थ को अर्थात् किसी रोग को उत्पन्न भी करता है किन्तु स्वयं शान्त (नष्ट) भी नहीं होता ॥५०॥ अन्यो हेत्वर्थमपि कुरुते स्वयञ्च न प्रशाम्यति । यथा प्रतिश्यायः कासं करोति स्वयञ्च न प्रशाम्यति । तथाऽर्शो जठरगुल्मं करोति स्वयञ्च न निवर्त्तत इति ॥५०॥ यहाँ यह समझना चाहिये कि 'अन्य अर्थात् कोई रोग किसी रोग के हेतु के अर्थ को करता है अर्थात् रोग की उत्पत्ति करता है किन्तु पूर्व की भाँति स्वयं शान्त भी नहीं होता है-जैसे कि जुखाम आदि रोग कास रोग को उत्पन्न करता है किन्तु स्वयं शान्त नहीं होता । तथा अर्श (बवासीर) रोग जठर तथा गुल्मरोग को उत्पन्न करता है किन्तु स्वयं निवृत्त नहीं होता है ॥५०॥ अथ वृद्धक्षीणानां दोषधातुमलानां सुश्रुतोक्तचिकित्सामाह- अत्यन्तकुत्सितावेतौ सदा स्थूलकृशौ नरौ । श्रेष्ठो मध्यशरीरस्तु स्थूलः क्षीणो न पूजितः ॥ कर्षयेद् बृंहयेच्चापि सदा स्थूलकृशौ नरौ । रक्षणश्चापि मध्यस्य कुर्वीत कुशलो भिषक् ।। ५१ ।। बढ़े तथा क्षीण हुये दोष, धातु तथा मल की सुश्रुतोक्त चिकित्सा-सर्वदा स्थूल (मोटा) या कृश (दुबला) शरीर वाले मनुष्य अत्यन्त कुत्सित समझे जाते हैं अर्थात् ये दोनों रोगी की भाँति चिकित्सा करने योग्य होते हैं । किन्तु जो मध्यम शरीर वाला अर्थात् न स्थूल तथा न कृश होता है वह उत्तम (स्वास्थ्यवान्) समझा जाता है । स्थूल तथा क्षीण शरीर वाला उत्तम नहीं समझा जाता है अत एव निपुण वैद्य को स्थूल तथा कृश शरीर वाले मनुष्यों की क्रम से स्थूल के लिये कर्षण चिकित्सा तथा कृश के लिये बृंहण चिकित्सा करनी चाहिये। और मध्यम शरीर वाले की चिकित्सा से सदा रक्षा करनी चाहिये जिससे वह स्थूल तथा कृश न होने पाये ॥५१॥