भारतकोश
संग्रह पर लौटें

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

१०७४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे चरकाचार्य ने कहा है कि- 'कोई रोग किसी रोग का हेतु होकर' इत्यादि। कुपित मल (वातादि दोष) संपूर्ण रोगों ही के निदान (कारण) होते हैं इस नियम से यदि यह कहें कि - दुष्ट हुआ वातादि दोष जो प्रथम उत्पन्न हुए ज्वरादि का कारण है वही पीछे से उत्पन्न हुये रक्तपित्तादि रोग का भी कारण है न कि ज्वरादिक, तो ऐसा कहना ठीक नहीं है। क्योंकि यदि ज्वर के पीछे होने वाले रक्तपित्तादि का कारण ज्वरादि को नहीं माना जाय तो उसे (रक्तपित्तादि को) उसके (ज्वर के) उपद्रव के लक्षणों के अन्दर मानने से रक्तपित्तादि को स्वतंत्र रोग मानना ही नष्ट हो जायगा, अतः 'कुपित मल (वातादि दोष) सम्पूर्ण रोगों ही के कारण होते हैं' यह सामान्य वचन है इसका 'निदानार्थकर' इत्यादि अर्थात् पूर्वोक्त 'रोग के निदान कार्य को करने वाला रोग भी देखा जाता है' इस विशेष वचन से बाध होता है ॥४८॥ अथ रोगस्थ हेतो रोगस्य वैचित्र्यमाह- कश्चिद्धि रोगो रोगस्य हेतुर्भूत्वा प्रशाम्यति ॥४९॥ ❖ यथा ज्वरो रक्तपित्तमुत्पाद्य स्वयं प्रशाम्यति । ननु येन दोषोद्रेकेण ज्वरो रक्तपित्तमुत्पादितवांस्तस्मिन् सति स तु ज्वरः कथं शाम्यति ? तत्र व्याधिस्वभाव एव कारणमिति न दोषः ॥४९॥ रोग के कारण स्वरूप रोग की विचित्रता-'कोई रोग किसी रोग का कारण होकर अर्थात् उसे उत्पन्न करके स्वयं नष्ट हो जाता है। जैसे ज्वर रक्तपित्त को उत्पन्न करके स्वयं नष्ट हो जाता है। यहाँ यह शङ्का होती है कि-जिस वातादि दोष के कुपित होने से उत्पन्न हुआ ज्वर रक्तपित्त को उत्पन्न किया, उस दोष के कुपित रहते हुये वह ज्वर कैसे नष्ट हो जाता है, क्योंकि जब कारण है तब कार्य का रहना आवश्यक है। इसका समाधान यह है कि-वहाँ जो वैसा होता है उसमें कारण केवल व्याधि का स्वभाव ही है, अतः कोई दोष नहीं है ॥४९॥ न प्रशाम्यति चाप्यन्यो हेत्वर्थं कुरुतेऽपि च ॥५०॥ कोई रोग हेतु के अर्थ को अर्थात् किसी रोग को उत्पन्न भी करता है किन्तु स्वयं शान्त (नष्ट) भी नहीं होता ॥५०॥ अन्यो हेत्वर्थमपि कुरुते स्वयञ्च न प्रशाम्यति । यथा प्रतिश्यायः कासं करोति स्वयञ्च न प्रशाम्यति । तथाऽर्शो जठरगुल्मं करोति स्वयञ्च न निवर्त्तत इति ॥५०॥ यहाँ यह समझना चाहिये कि 'अन्य अर्थात् कोई रोग किसी रोग के हेतु के अर्थ को करता है अर्थात् रोग की उत्पत्ति करता है किन्तु पूर्व की भाँति स्वयं शान्त भी नहीं होता है-जैसे कि जुखाम आदि रोग कास रोग को उत्पन्न करता है किन्तु स्वयं शान्त नहीं होता । तथा अर्श (बवासीर) रोग जठर तथा गुल्मरोग को उत्पन्न करता है किन्तु स्वयं निवृत्त नहीं होता है ॥५०॥ अथ वृद्धक्षीणानां दोषधातुमलानां सुश्रुतोक्तचिकित्सामाह- अत्यन्तकुत्सितावेतौ सदा स्थूलकृशौ नरौ । श्रेष्ठो मध्यशरीरस्तु स्थूलः क्षीणो न पूजितः ॥ कर्षयेद् बृंहयेच्चापि सदा स्थूलकृशौ नरौ । रक्षणश्चापि मध्यस्य कुर्वीत कुशलो भिषक् ।। ५१ ।। बढ़े तथा क्षीण हुये दोष, धातु तथा मल की सुश्रुतोक्त चिकित्सा-सर्वदा स्थूल (मोटा) या कृश (दुबला) शरीर वाले मनुष्य अत्यन्त कुत्सित समझे जाते हैं अर्थात् ये दोनों रोगी की भाँति चिकित्सा करने योग्य होते हैं । किन्तु जो मध्यम शरीर वाला अर्थात् न स्थूल तथा न कृश होता है वह उत्तम (स्वास्थ्यवान्) समझा जाता है । स्थूल तथा क्षीण शरीर वाला उत्तम नहीं समझा जाता है अत एव निपुण वैद्य को स्थूल तथा कृश शरीर वाले मनुष्यों की क्रम से स्थूल के लिये कर्षण चिकित्सा तथा कृश के लिये बृंहण चिकित्सा करनी चाहिये। और मध्यम शरीर वाले की चिकित्सा से सदा रक्षा करनी चाहिये जिससे वह स्थूल तथा कृश न होने पाये ॥५१॥

अथ सप्तमं रोगिपरीक्षाप्रकरणम् १०७५ अन्यच्च- क्षपयेद् बृंहयेच्चापि दोषधातुमलान्भिषक् । नरो रोगान्वितो यावद्रोगेण रहितो भवेत् ।।५२।। और भी कहा है कि-जब तक रोगी रोगे से रहित न हो जाय तब तक वैद्य को चाहिये कि वह रोगी के दोष, धातु तथा मल की योग्यतानुसार कर्षण तथा बृंहण क्रिया करता रहे ।।५२।। ❖ क्षपयेद्=अतिप्रवृद्धान्दोषधातुमलांस्तत्र क्षैण्यहेतुभिरौषधान्नविहारैर्ह्रासयित्वा समी कुर्यात् । बृंहयेत्=क्षीणान्दोषादींस्तद्वृद्धिहेतुभिरौषधान्नविहारैर्वर्द्धयित्वा समीकुर्यात् ।। यहाँ 'क्षपयेत्' पद का 'कर्षण क्रिया करता रहे अर्थात् यदि दोष, धातु या मल इनमें से जो भी अत्यन्त बढ़े हुए हों तो वहां दोषादि के क्षीण करने वाले औषध, अन्न तथा विहार का सेवन द्वारा उनको कम करके समभाव में रखता रहे' तथा 'बृंहयेत्' पद का 'बृंहण क्रिया करता रहे अर्थात् क्षीण हुये दोषादि को उनकी वृद्धि करने वाले जो औषध, अन्न तथा विहार हों उनके सेवन द्वारा बढ़ाकर समभाव में रखता रहे' यह अर्थ समझना चाहिये ।।५२।। अस्वस्थो येन विधिना स्वस्थो भवति मानवः । तमेव कारयेद्वैद्यो यतः स्वास्थ्यं सदेप्सितम् ।।५३।। जिस विधि के करने से अस्वस्थ मनुष्य स्वस्थ हो, वैद्य को उचित है कि वह उसी विधि को मनुष्य से करावे, क्योंकि सभी को स्वास्थ्य सदा ईप्सित रहता है ।।५३।। अथ स्वस्थस्य लक्षणमाह- समदोषः समाग्निश्च समधातुमलक्रियः । प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते ।।५४।। स्वस्थ मनुष्य के लक्षण-जिस मनुष्य के दोष समभाव में हों अर्थात् न बढ़े हों और न कम हों, जठराग्नि भी सम (न तीक्ष्ण और न मन्द) हो, धातु, मल और क्रियायें सभी सम हों तथा शरीर, इन्द्रिय और मन प्रसन्न हों वही स्वस्थ मनुष्य कहलाता है ।।५४।। ❖ समक्रियः=शरीरानुरूपकर्मा । आत्माऽत्र शरीरम् ।।५४।। यहाँ 'समक्रिय' पद का 'क्रियायें सम हों अर्थात् शरीर के अनुरूप कर्म (क्रियायें) होते हों' तथा 'आत्मा' पद का 'शरीर' अर्थ समझना चाहिये ।।५४।। तन्त्रान्तरेऽपि- विण्मूत्राखिलदोषधातुसमता काङ्क्षाऽन्नपाने रुचिर्भुक्तं जीर्यति पुष्टये परिणतिः स्वप्नावबोधौः सुखम् ।। गृह्णीते विषयान्यथास्वमुचिता-वृत्तिं मनोवृत्तिः । स्वस्थस्याभिहितं चतुर्दशविधं जन्तोरिदं लक्षणम् ।।५५।। ग्रन्थान्तर में भी कहा है कि-मल, मूत्र, सम्पूर्ण दोष तथा संपूर्ण धातु इन सबों का समभाव में रहना, अन्न- पान (खाने-पीने) की इच्छा, शरीर की कान्ति, भोजन किये हुए अन्न का पचना, अन्न पचने के परिणामस्वरूप देह का पुष्ट होना, सुखपूर्वक सोना तथा सुखपूर्वक जागना, जिन इन्द्रियों के जो विषय हों उनका उचित रीति से ग्रहण करना, मनोवृत्ति के अनुसार ठीक-ठीक काम कर लेना ये १४ लक्षण स्वस्थ मनुष्य के कहे हुये हैं ।।५५।। ❖ रुचिः=शरीरकान्तिः । ननु-अहर्निशर्तुभुक्तवत्सु दोषाणां वृद्धेः कथं समदोषता ? उच्यते=अहोरात्र- प्रथमभागादिषु तत्तद्दोषवृद्धेः स्वस्थवृत्तोक्तविधिभिरुपशान्तात्समदोषतेति न दोषः । किञ्च- यत्समत्वं हि दोषाणां भिषग्भिरवधार्यते । न तत्स्वास्थ्यं विना वस्तुं शक्यमन्येन हेतुना ।। तेन समदोषस्वास्थ्योर्लक्षणमन्योऽन्यापेक्षया स्वस्थः समदोषः, समदोषः स्वस्थः स्वस्थेभ्यो हितं च- तद्दोषधातुमलानां स्वप्रमाणस्थितानां साम्यानुवृत्तिहेतुर्यद्व्यापच्च स्वस्थस्यानुवृत्तिं करोति, ऋतुचर्याऽध्याये सेव्यत्वेनोक्तम्,

तथा मात्राशितीयेऽध्याये रक्तशालिषष्टिकयवगोधूमजाङ्गलमांसजीवन्तीशाकादिमोदकक्षीरादि, तथा यदोजस्करं रसायनं वाजीकरणं सर्वदा शीलनीयत्वेन निर्दिष्टम् ।।५५।। यहाँ 'रुचि' पद का 'शरीर की कान्ति' यह अर्थ समझना चाहिये। यहाँ यह जो शंका होती है कि 'दिन, रात्रि, ऋतु तथा भोजन के प्रथम भागादि काल विशेष में स्वभावतः वातादि दोषों की वृद्धि हुआ ही करती है अतः दोषों की समता कैसे हो सकती है' ? तो इसके समाधान में यह कहते हैं कि—दिन-रात्रि आदि के प्रथम आदि भागों में जिन- जिन दोषों की वृद्धि होती है उस समय उन-उन दोषों को स्वस्थवृत्त में कही हुई विधियों से शान्त कर देने पर दोषों की समता हो सकती है, अतः दोषों की समता होने में कोई दोष नहीं है। वैद्यों ने जो दोषों की समता कही है वह समता स्वस्थता के बिना किसी अन्य हेतु से नहीं कही जा सकती है। इससे यह सिद्ध हुआ कि—समदोष तथा स्वस्थ के लक्षण परस्पर एक दूसरे की अपेक्षा रखने वाले होते हैं हैं अर्थात् समदोष का लक्षण स्वस्थ के लक्षण की और स्वस्थ का लक्षण समदोष के लक्षण की अपेक्षा करता है, इन दोनों में कोई निरपेक्ष नहीं है। अतएव जो मनुष्य स्वस्थ है वही समदोषों वाला और जो समदोषों वाला है वही स्वस्थ कहलाता है। जो अपने-अपने प्रमाण में स्थित-दोष धातु तथा मल को समभाव में रखने का हेतु (रखने वाला) है, और जो रोग को नहीं उत्पन्न करने वाला एवं जो स्वस्थ रखने वाला है तथा जो ऋतुचर्याध्याय में सेवन करने के योग्य कहे हुये हैं वे सब स्वस्थ पुरुषों के लिये हितकर होते हैं। 'मात्राशितीय अध्याय' में कहे हुये जो रक्तशालि (लाल जड़हन) तथा साठी चावल, जौ, गेहूँ, जङ्गली जीवों का मांस, जीवन्ती शाक आदि तथा मोदक (लड्डू), दूध आदि हैं तथा जो ओज को उत्पन्न करने वाले रसायन, वाजीकरण एवं सर्वदा सेवन करने योग्य कहे हुये हैं, वे सब स्वस्थ पुरुषों के लिये हितकर होते हैं' यह और समझना चाहिये ॥५५॥ अथ/दोषधातुमलानां वृद्धेर्निदानान्याह- तत्तद्वृद्धिकराहारविहारातिनिषेवणात् । दोषधातु मुलानां हि वृद्धिरुक्ता भिषग्वरैः ।।५६।। दोष, धातु तथा मल वृद्धि के कारण-वैद्यवरों ने कहा है कि दोष, धातु तथा मल की वृद्धि वाले आहार तथा विहार का अत्यन्त सेवन करने से दोषादि की वृद्धि हुआ करती है ॥५६॥ अथातिवृद्धानां तेषां लक्षणान्याह- वाते वृद्धे भवेत्कार्श्यं पारुष्यं चोष्णकामिता । गाढं मलं बलञ्चाल्पं गात्रस्फूर्विनिद्रता । विण्मूत्रनेत्रगात्राणां पीतत्वं क्षीणमिन्द्रियम् । शीतेच्छातापमूर्च्छाःस्युः पित्ते वृद्धेऽल्पमूत्रता ।।५७।। विडादिशौक्ल्यं शीतत्वं गौरवञ्चातिनिद्रता । सन्थिशैथिल्यमुत्क्लेदो मुखसेकः कफेऽधिके ।।५८।। रसे वृद्धेऽन्नविद्वेषो जायते गात्रगौरवम् । लालाप्रसेकश्छर्दिश्च मूर्च्छा सादो भ्रमः कफः ।।५९।। प्रवृद्धं रुधिरं कुर्याद् गात्रमारक्तवर्णकम् । लोचनञ्च तथा रक्तं सिराः पूर्य्यतेऽपि च ।।६०।। अत्यन्त बढ़े हुए दोषादि के लक्षण-वायु की वृद्धि होने पर-शरीर की कृशता, कठोरता, गर्मी की इच्छा, मल का गाढ़ा होना, बल की कमी, अङ्गों का फड़कना और नींद न आना ये सब लक्षण प्रकट होते हैं। पित्त की वृद्धि होने पर-मल, मूत्र, नेत्र तथा शरीर का पीला होना, इन्द्रियों की क्षीणता, शीत की इच्छा, ताप, मूर्च्छा तथा मूत्र का स्वल्प मात्रा में होना ये सब लक्षण होते हैं। कफ की वृद्धि होने पर-मल, मूत्र, नेत्र तथा शरीर का सफेद होना, शरीर में शीतलता तथा गुरुता मालूम पड़ना, अत्यन्त निद्रा होना, सन्धिसथानों में शिथिलता, उत्क्लेद (वमन की इच्छा) और मुख से पानी गिरना ये सब लक्षण होते हैं। रस की वृद्धि होने पर-अन्न से द्वेष होना, शरीर में गुरुता, लार गिरना;

अथ सप्तमं रोगपरीक्षाप्रकरणम् १०७७ वमन, मूर्च्छा, शरीर में ग्लानि, भ्रम तथा कफ निकलना ये सब लक्षण होते हैं और रक्त की वृद्धि होने पर-शरीर तथा नेत्र का रक्तवर्ण होना तथा सिराओं का रक्त से पूर्ण होना ये सब लक्षण प्रकट होते हैं ॥५७-६०॥ अन्यच्च- रक्तन्तु कुरुते वृद्धं विसर्पप्लीहविद्रधीन् । कुष्ठं वातस्रकं गुल्मं सिरापूर्णत्वकामले ।।६१।। गात्राणां गौरवं निद्रा मदो दाहश्च जायते । व्यङ्गाग्निस्राद संमोहरक्तत्वङ्नेत्रमूत्रताः ।।६२।। गुदमेढ्रास्यपाकार्शःपिटकामशकास्तथा । इन्द्रलुप्ताङ्गमर्दासृग्धरांस्तापं कराङ्घ्रिषु ।।६३।। शमयेद्रक्तवृद्ध्यात्यान् रक्तस्रुतिविरेचनैः । मांसं वृद्धन्तु गण्डौष्ठस्फिगुपस्थोरुबाहुषु । जङ्घयोः कुरुते वृद्धिं तथा गात्रस्य गौरवम् ।।६४।। उदरे पार्श्वयोर्वृद्धिः कासश्वासादयस्तथा। दौर्गन्ध्यं स्निग्धता गात्रे मेदोवृद्धौ भवेदिति ।।६५।। रक्तवृद्धि के अन्य लक्षण-रक्त की वृद्धि होने पर-विसर्प, प्लीहा, विद्रधि, कुष्ठ, वातरक्त, गुल्म, सिराओं का रक्त से परिपूर्ण होना, कामला, अङ्गों की गुरुता, निद्रा, मद, दाह, व्यङ्ग (झाईं), अग्नि की मन्दता, संमोह, त्वचा, नेत्र तथा मूत्र का रक्तवर्ण होना, गुदा, लिङ्ग या योनि तथा मुख का पकना, अर्श (खूनी बवासीर), फुन्सी, मसा, इन्द्रलुप्त रोग, अङ्गों का टूटना, रक्तप्रदर, हाथ तथा पैर में ताप होना ये सब लक्षण रक्त की वृद्धि होने पर प्रकट होते हैं। रक्त की वृद्धि होने से उत्पन्न हुये रोगों को रक्तस्राव तथा विरेचन द्वारा शान्त करना चाहिये। मांस की वृद्धि होने पर- गण्डस्थल, ओष्ठ, कूल्हा, लिङ्ग, जङ्घा, बाहु और पिण्डरी इन सबों में मांस की वृद्धि तथा शरीर में गुरुता ये सब लक्षण होते हैं ओर मेदा की वृद्धि होने पर-उदर तथा पार्श्व की वृद्धि, कास तथा श्वास आदि रोग, शरीर में दुर्गन्धता तथा स्निग्धता ये सब लक्षण होते हैं॥ अन्यच्च- प्रवृद्धं कुरुते मेदः श्रममल्पेऽपि चेष्टिते । तृट्स्वेदगलगण्डौष्ठरोगमेहादिजन्म च ।।६६।। श्वासं स्फिग्जठरग्रीवास्तनानां लम्बनं तथा। वृद्धान्यस्थीनि कुर्वन्ति अस्थीन्यन्यानि चास्थिषु ।। आचरन्ति तथा दन्तान्विक्तानन्महतस्तथा। मज्जा वृद्धः समस्ताङ्गेनेत्रगौरवमाचरेत् ।।६८।। शुक्राश्मरी शुक्रवृद्धौ शुक्रस्यातिप्रवर्त्तनम् । मलप्रवृद्धावाटोपी जायते जठरे व्यथा ।।६९।। मूत्रे वृद्धे मुहुर्मूत्रमाध्मानं बस्तिवेदना । स्वेदे वृद्धे तु दौर्गन्ध्यं त्वचि कण्डूश्च जायते ।।७०।। आर्त्तवातिप्रवृत्तिः स्याद्दौर्गन्ध्यं चार्त्तवे भवेत् । अङ्गमर्दश्च जायेत लिङ्गं स्यादात्तर्वेऽधिके ।।७१।। स्तनयोरतिपीनत्वं क्षीरस्रवो मुहुर्मुहुः । तोदश्च तत्र भवति स्तन्यधिक्यस्य लक्षणम् ।।७२।। उदरादिप्रवृद्धिस्तु वृद्धे गर्भेऽभिजायते । स्वेदश्च गर्भवत्याः स्यात्प्रसवे व्यसनं महत् ।।७३।। मेदा वृद्धि के अन्य लक्षण-भेदा की वृद्धि होने पर-थोड़े से भी परिश्रम करने में अधिक थकावट तथा अधिक प्यास मालूम पड़ना, पसीना अधिक निकलना, गला, गण्डस्थल तथा ओष्ठसम्बन्धी रोग तथा प्रमेहादि रोगों का होना, श्वास रोग एवं कूल्हा, उदर, गर्दन तथा स्तनों का लटक पड़ना, ये सब लक्षण होते हैं। अस्थि की वृद्धि होने पर- अस्थियों के ऊपर दूसरी अस्थियों का उत्पन्न होना एवं दाँतों का विकट तथा बड़ा हो जाना ये सब लक्षण होते हैं। मज्जा की वृद्धि होने पर-सम्पूर्ण अङ्गों तथा नेत्रों में गुरुता होना यह लक्षण होता है। शुक्र की वृद्धि होने पर-शुक्राश्मरी नामक पथरी रोग तथा शुक्र की अत्यन्त प्रवृत्ति (स्राव) होना ये सब लक्षण होते हैं। मल की वृद्धि होने पर-आटोप (पेट में पीड़ा के साथ गुड़गुड़ शब्द होना) तथा उदर में व्यथा ये सब लक्षण होते हैं। मूत्र की वृद्धि होने पर-बारम्बार मूत्र होना, आध्मान (अफारा) तथा बस्तिस्थान में पीड़ा होना ये सब लक्षण होते हैं। स्वेद (पसीना) की वृद्धि होने पर- शरीर में दुर्गन्ध होना तथा त्वचा में खुजली होना ये सब लक्षण होते हैं। आर्त्तव (रज) की वृद्धि होने पर-आर्त्तव

१०७८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे का अत्यन्त स्राव होना, आर्तव में दुर्गन्धता तथा अङ्गों का टूटना ये सब लक्षण होते हैं। स्तनों में दूध की अधिक वृद्धि-स्तनों का अत्यन्त मोटा हो जाना, दूध का बारम्बार स्राव होना एवं स्तनों में सुई चुभोने की सी पीड़ा होना ये सब लक्षण होते हैं और गर्भिणी स्त्रियों के गर्भ की वृद्धि होने पर-उदर आदि अङ्गों का अत्यन्त बढ़ जाना, स्वेद अधिक निकलना तथा प्रसव के समय अधिक पीड़ा होना ये सब लक्षण प्रकट होते हैं ॥६६-७३॥ अथातिवृद्धानां दोषधातुमलानां ह्रासनमाह- तत्तद्ध्रासकराहारविहारपरिषेवणात्। दोषाधातुमलानां हि ह्रासो निगदितो नृणाम् ॥७४॥ पूर्वः पूर्वोऽतिवृद्धत्वाद् वर्द्धयेद्धि परस्परम्। तस्मादतिप्रवृद्धानां धातूनां ह्रासनं हितम् ॥७५॥ अत्यन्त बढ़े हुये दोष, धातु तथा मलों के कम करने का प्रकार-मनुष्यों के दोष, धातु तथा मल इनमें से जो बढ़े हुए हों उन सब को करने वाले जो आहार तथा विहार हों उनके सेवन करने से दोषादि का कम करना कहा हुआ है। क्योंकि दोष, धातु तथा मल इनमें से पूर्व-पूर्व के अत्यन्त बढ़ने से परस्पर एक दूसरे को बढ़ाते रहते हैं। अतएव अत्यन्त बढ़े हुये धातुओं का ह्रास (कम) करना हितकर होता है ॥७४-७५॥ अथ दोषधातुमलानां क्षयस्य निदानान्याह- असात्म्यान्नसदाक्रोधशोकचिन्ताभयश्रमैः । अतिव्यवायानाशनात्यर्थसंशोधनैरपि ॥७६॥ वेगानां धारणाच्चापि साहसादभिघाततः। दोषाणामय धातूनां मलानाञ्च भवेत्क्षयः ॥७७॥ दोष-धातु तथा मलों के क्षय होने के कारण-असात्म्य (अहितकारक) अन्न का सेवन, सर्वदा क्रोध, शोक, चिन्ता, भय तथा श्रम का करना, अत्यन्त मैथुन तथा उपवास, अत्यन्त संशोधन कर्म (वमन, विरेचनादि) करना, मल- मूत्रादि के वेगों का रोकना, अत्यन्त साहसकर्म तथा दण्डप्रहार आदि अभिघात से दोष, धातु तथा मलों का क्षय होता है ॥७६-७७॥ अथ क्षीणानां तेषां लक्षणान्याह- वातक्षयेऽल्पचेष्टत्वं मन्दवाक्यं विसंज्ञता । पित्तक्षयेऽधिकः श्लेष्मा वह्निमान्द्यं प्रभाक्षयः ॥७८॥ सन्धयः शिथिला मूर्च्छा रौक्ष्यं दाहः कफक्षये । हृत्पीडाकण्ठशोषौत्वक्शून्या तृट् च रसक्षये ॥७९॥ सिराः श्लथा हिमाम्लेच्छा त्वक्पारुष्यं क्षयेऽसृजः। गण्डौष्ठकन्धरास्कन्धवक्षोजठरसन्धिषु ॥८०॥ उपस्थशोथपिण्डीषु शुष्कता गात्ररूक्षता । तोदो धमन्यः शिथिला भवेयुर्माससंज्ञये ॥८१॥ प्लीहाभिवृद्धिः सन्धीनां शून्यता तनुरूक्षता । प्रार्थना स्निग्धमांसस्य लिङ्गं स्यान्मेदसः क्षये ॥८२॥ अस्थिशूलं तनौ रौक्ष्यं नखदन्तत्रुटिस्तथा। अस्थिक्षये लिङ्गमेतद्वैद्यैः सर्वैरुदाहृतम् ॥८३॥ शुक्रालपत्वं पर्वभेदस्तोदः शून्यत्वमस्थिनि। लिङ्गान्येतानि जायन्ते नराणां मज्जसंज्ञये ॥८४॥ शुक्रक्षये रतेऽशक्तिर्व्यथा शेफसि मुष्कयोः । चिरेण शुक्रसेकः स्यात्सेके रक्ताल्पशुक्रता ॥८५॥ क्षीण हुये दोषादि के लक्षण-वायु का क्षय होने पर-शरीर में अल्प चेष्टा होना, थोड़ा बोल सकना तथा संज्ञाहीन होना ये सब लक्षण होते हैं। पित्त का क्षय होने पर-अधिक कफ निकलना, अग्नि की मन्दता तथा शरीर की कान्ति का क्षय होना ये सब लक्षण प्रकट होते हैं। कफ का क्षय होने पर-सन्धियों की शिथिलता, मूर्च्छा, शरीर में रूक्षता तथा दाह होना ये सब लक्षण होते हैं। रस का क्षय होने पर-हृदय में पीड़ा, कण्ठ सूखना, त्वचा का शून्य होना तथा प्यास अधिक लगना ये सब लक्षण प्रकट होते हैं। रक्त का क्षय होने पर-सिराओं का शिथिल हो जाना, शीतल तथा अम्ल पदार्थ खाने की इच्छा होना तथा त्वचा का कठोर होना ये सब लक्षण होते हैं। मांस का क्षय होने पर-गण्डस्थल, ओष्ठ, गर्दन, कन्धे, छाती, पेट, सन्धियाँ, लिङ्ग का शोथ (चैतन्य होने पर मोटापन) और पिंडरी का सूख जाना, शरीर में रूक्षता तथा सूई चुभोने के समान पीड़ा होना, धमनियों का शिथिल हो जाना ये सब लक्षण CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ सप्तमं रोगिपरीक्षाप्रकरणम् १०७९ होते हैं। मेदा का क्षय होने पर—प्लीहा की वृद्धि, सन्धियों का शून्य हो जाना, शरीर में रूक्षता तथा स्निग्ध (स्नेहयुक्त) मांस खाने की इच्छा होना ये सब लक्षण होते हैं। अस्थि का क्षय होने पर—अस्थियों में शूल (अत्यन्त पीड़ा), शरीर में रूक्षता, नख तथा दाँतों का टूटना ये सब लक्षण होते हैं। मज्जा का क्षय होने पर—शुक्र की अल्पता, पर्वभेद (पोरों में टूटने की सी पीड़ा, सूई चुभोने की सी पीड़ा तथा अस्थियों में शून्यता ये सब लक्षण होते हैं और शुक्र का क्षय होने पर—स्त्री के साथ रति (मैथुन) करने में शक्ति न रहना, लिङ्ग तथा अण्डकोश में पीड़ा होना, बहुत देर में शुक्र का निकलना तथा शुक्र निकलने पर उसकी मात्रा थोड़ी होना तथा रक्त भी मिला रहना ये सब लक्षण प्रकट होते हैं ॥७८-८५॥ अथौजःक्षयस्य निदानमाह— ओजः संक्षीयते कोपाच्चिन्ताशोकश्रमादिभिः। रूक्षतीक्ष्णकटुकैः कर्षणैरपरैरपि ॥८६॥ ओज के क्षय होने का कारण—अधिक कोप, चिन्ता, शोक तथा श्रम आदि करने से एवं रूक्ष, तीक्ष्ण, उष्ण तथा कटुरसयुक्त पदार्थों का विशेष सेवन करने से तथा अन्यान्य कर्षणकारक (उपवासादि) व्यापारों से भी ओज का क्षय होता है ॥८६॥ अथ क्षीणौजसो लक्षणमाह— बिभेति दुर्बलोऽभीक्ष्णं चिन्तयेद्व्यथितेन्द्रियः। अभ्युत्थायोन्मना रूक्षः स्यादोजसः क्षये ॥८७॥ ओज के क्षय होने के लक्षण—ओज का क्षय होने पर मनुष्य सर्वत्र भय करता है, सदा दुर्बल रहता है तथा चिन्ता करने से उसकी इन्द्रियाँ व्यथित रहती हैं, उत्साह करके फिर हतोत्साह हो जाता है और रूक्ष तथा क्षीण शरीर वाला हो जाता है ॥८७॥ पुरीषस्य क्षये पार्श्वे हृदये च व्यथा भवेत्। सशब्दस्यानिलस्योर्ध्वगमनं कुक्षिसंवृतिः ॥८८॥ मल के क्षय होने के लक्षण—मल (विष्ठा) के क्षय होने पर मनुष्य की पंसुली तथा हृदय में पीड़ा होती है और पेट में शब्द करता हुआ वायु ऊपर को चढ़ता है तथा उदर संकुचित हो जाता है ॥ ❖ कुक्षिसंवृतिः=उदरसङ्कोचः ॥८८॥ यहाँ 'कुक्षिसंवृतिः' पद का 'उदरसङ्कोच' अर्थ समझना चाहिये ॥८८॥ अथ मूत्रादीनां क्षयस्य लक्षणमाह— मूत्रक्षयेऽल्पमूत्रत्वं वस्तौ तोदश्च जायते। स्वेदनाशस्त्वचो रौक्ष्यं चक्षुषोरपि रूक्षता ॥८९॥ स्तब्धाश्च रोमकूपाः स्युर्लिङ्गं स्वेदक्षये भवेत्। आर्त्तवस्य स्वकाले चाभावस्तस्याल्पताऽथ वा ॥ जायते वेदना योनौलिङ्गं स्यादात्तर्वक्षये। अभावः स्वल्पता वा स्यात्स्तन्यस्य भवतस्तथा ॥ म्लानौ पयोधरावेतल्लक्षणं स्तन्यसंक्षये। अनुन्नतो भवेत्कुक्षिर्गर्भस्यास्पन्दनं तथा ॥ इति गर्भक्षये प्राज्ञैर्लक्षणं समुदाहृतम् ॥९२॥ मूत्रादि के क्षय होने के लक्षण—मूत्र का क्षय होने पर—थोड़ा मूत्र होना तथा वस्ति में सूई चुभने की सी पीड़ा होना ये सब लक्षण होते हैं। स्वेद का क्षय होने पर—स्वेद (पसीना) का न निकलना, त्वचा तथा नेत्रों में रूक्षता, रोमकूपों में स्तब्धता ये सब लक्षण उत्पन्न होते हैं। आर्तव (रज) का क्षय होने पर—स्त्रियों को ऋतुकाल का समय होने पर भी आर्तव का स्राव एक दम से न होना अथवा थोड़ी मात्रा में स्राव होना एवं योनि में पीड़ा होना ये सब लक्षण होते हैं। स्तनों में दूध का क्षय होने पर—स्तनों में दूध का अत्यन्ताभाव या बहुत कम निकलना तथा स्तनों का म्लान हो जाना ये सब लक्षण होते हैं और गर्भ का क्षय होने पर—'गर्भिणी स्त्रियों के कोख का पचक जाना तथा गर्भ का न फड़कना ये लक्षण होते हैं ॥८९-९२॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

१०८० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ क्षीणधातुदोषमलानां वर्द्धनविधिमाह- तत्तत्संवर्द्धनाहारविहारातिनिषेवणात्। तत्तत्प्राप्य नरः शीघ्रं तत्तत्क्षयमपोहति ॥९३॥ ओजस्तु वर्द्धते नृणां सुस्निग्धैः स्वादुभिस्तथा। बृंह्यैरन्यैर्विशेषात्तु क्षीरमांसरसादिभिः ॥९४॥ क्षीण हुये दोष, धातु तथा मलों को बढ़ाने की विधि-दोष, धातु तथा मल इनमें से जो-जो क्षीण हुये हों उन-उन सबों की वृद्धि करने वाले आहार-विहार का अत्यन्त सेवन के द्वारा उन सबों को पुनः प्राप्त करके मनुष्य दोषादि की क्षीणता को शीघ्र दूर करता है। जिनके ओज क्षीण हो गये हों ऐसे मनुष्यों का ओज अत्यन्त स्निग्ध तथा मधुर रसयुक्त एवं अन्यान्य (वीर्यवर्धक) तथा विशेषतः दूध और मांसरस आदि पदार्थों के खाने से पुनः बढ़ने लगता है ॥९३-९४॥ अन्यच्च- दोषधातुमलक्षीणे बलक्षीणेऽपि मानवः। तत्तत्संवर्द्धनं यत्तदन्नपानं प्रकाङ्क्षति ॥९५॥ यद्यदाहारजातन्तु क्षीणः प्रार्थयते नरः। तस्य तस्य स लाभेन तत्तत्क्षयमपोहति ॥९६॥ और भी कहा है-दोष, धातु, मल तथा बल से क्षीण हुआ मनुष्य दोषादि में से जो-जो क्षीण होते हैं। उन सबों के बढ़ाने वाले जो-जो अन्न-पान (खान-पान) हैं उन्हीं सबों की इच्छा करता है और क्षीण पुरुष जिन-जिन दोषों के आहारों को पाने के लिये प्रार्थना करता है उन्हीं-उन्हीं आहारों के पाने से उन्हीं दोषादि की क्षीणता को दूर करता है ॥९५-९६॥ तत्र केन क्षीणः किं काङ्क्षतीत्याकाङ्क्षायामाह- कषायकटुतिक्तानि रूक्षशीतलघूनि च। यवमुद्गप्रियङ्गूश्च वातक्षीणोऽभिकाङ्क्षति ॥९७॥ तिलमाषकुलत्थादिपिष्टान्नविकृतिं तथा। मस्तुशुक्ताम्लतक्राणि काञ्जिकञ्च तथा दधि ॥९८॥ कट्वम्ललवणोष्णानि तीक्ष्णं क्रोधं विदाहि च। समयं देशमुष्णाञ्च पित्तक्षीणोऽभिकाङ्क्षति ॥९९॥ मधुरस्निग्धशीतानि लवणाम्लगुरूणि च। दधि क्षीरं दिवास्वप्नं कफक्षीणोऽभिकाङ्क्षति ॥१००॥ रसक्षीणो नरः काङ्क्ष यम्भोऽतिशिशिरं मुहुः। रात्रिनिद्रां हिमं चन्द्रं भोक्तुञ्च मधुरं रसम् ॥१०१॥ इक्षुं मांसरसं मन्थं मधु सर्पिर्गुदोदकम् ॥१०२॥ द्राक्षादाडिमशुक्तानि सस्नेहलवणानि च। रक्तसिद्धानि मांसानि रक्तक्षीणोऽभिकाङ्क्षति ।। वात से क्षीण हुआ मनुष्य-कषाय, कटु तथा तिक्तरस युक्त, रूक्ष, शीतल तथा लघु पदार्थ, जौ, मूँग एवं कंगुनी की इच्छा करता है। पित्त से क्षीण हुआ मनुष्य-तिल, उड़द तथा कुलथी, आदि तथा पिसे हुए अन्न के बने पदार्थ, दही की मलाई, शुक्त (कांजी विशेष), खट्टा तक्र (छाछ), कांजी, दही एवं कटु, अम्ल तथा लवण रसयुक्त, गर्म, तीक्ष्ण तथा विदाही पदार्थ, क्रोध करना, गर्म स्थान तथा गर्मी की इच्छा करता है। कफ से क्षीण हुआ मनुष्य-मधुर, लवण तथा अम्ल रसयुक्त पदार्थ एवं स्निग्ध (स्नेहयुक्त), शीतल तथा गुरु पदार्थ, दही, दूध तथा दिन में सोने की इच्छा करता है। रस से क्षीण हुआ मनुष्य-पीने के लिये बारम्बार अत्यन्त शीतल जल, रात्रि में सोना, हिम (अत्यन्त शीतल पदार्थ बर्फ आदि), चन्द्रमा और खाने के लिये मधुर रसयुक्त पदार्थ, ईख, मांसरस (सुरुवा), मन्थ (तक्रविशेष), शहद, घी तथा गुड़ मिला जल की इच्छा करता है और रक्त से क्षीण हुआ मनुष्य-दाख, अनार, शुक्त (कांजी विशेष), स्नेहयुक्त तथा लवणरसयुक्त पदार्थ एवं रक्त के साथ पकाया हुआ मांस की इच्छा करता है ॥९७-१०३॥ अन्नानि दधिसिद्धानि षाडवांश्च बहूनपि। स्थूलक्रव्यादमांसानि मांसक्षीणोऽभिकाङ्क्षति ॥१०४॥ मांस से क्षीण हुआ मनुष्य-दही के साथ पकाये हुये अन्न तथा बहुत से 'षाडव' संज्ञक पदार्थ एवं मोटे मांसभक्षी जीवों के मांस की इच्छा करता है ॥१०४॥ ❖ षाडवाः=मधुराम्लादिरससंयोगपाचिता गुडावप्रभृतयः ॥१०४॥

अथ सप्तमं रोगिपरीक्षाप्रकरणम् १०८१ यहाँ 'षाडव' पद से 'षाडव' संज्ञक मधुर तथा अम्ल आदि रसों के संयोग से पकाये हुये, 'गुडाव' आदि पदार्थों का ग्रहण करना चाहिये ॥१०४॥ मेदःसिद्धानि मांसानि ग्राम्यानूपौदकानि च । सक्षाराणि विशेषेण मेदःक्षीणेऽभिकाङ्क्षति ॥१०५॥ अस्थिक्षीणस्तथा मांसं मज्जास्थिस्नेहसंयुतम् । स्वाद्वम्लसंयुतं द्रव्यं मज्जाक्षीणेऽभिकाङ्क्षति ॥१०६॥ शिखिनः कुक्कटस्याण्डं हंससारसयोस्तथा । ग्राम्यानूपौदकानाञ्च शुक्रक्षीणेऽभिकाङ्क्षति ॥१०७॥ यवान्नं यवकान्नञ्च शाकानि विविधानि च । मसूरमाषयूषञ्च मलक्षीणेऽभिकाङ्क्षति ॥१०८॥ पेयभिक्षुरसं क्षीरं सगुडं बदरोदकम् । मूत्रक्षीणेऽभिलषति त्रपुसैर्वारुकाणि च ॥१०९॥ अभ्यङ्गोद्वर्त्तने मद्यं निवातशयनासने । गुरु प्रावरणं चैव स्वेदक्षीणेऽभिकाङ्क्षति ॥११०॥ कट्वम्ललवणोष्णानि विदाहीनि गुरूणि च । फलशाकानि पानानि स्त्री काङ्क्षत्यार्त्तवक्षये॑ ॥१११॥ सुराशाल्यन्नमांसानि गोक्षीरं शर्करां तथा । आसवं दधि हृद्यानि स्तन्यक्षीणाऽभिवाञ्छति ॥११२॥ मृगाजाविवराहाणां गर्भान्वाञ्छति संस्कृतान् । वसाशूल्यप्रकारादीन्भोक्तुं गर्भपरिक्षये ॥११३॥ भेद से क्षीण हुआ मनुष्य-मेद के साथ पकाये हुये मांस तथा ग्राम और आनूप प्रदेश में रहने वाले एवं जलचर जीवों का मांस और विशेषतः क्षारयुक्त मांस की इच्छा करता है। अस्थि से क्षीण हुआ मनुष्य-मज्जा, अस्थि तथा स्नेह से युक्त मांस खाने की इच्छा करता है। मज्जा से क्षीण हुआ मनुष्य-मधुर तथा अम्लरसयुक्त पदार्थों की इच्छा करता है। शुक्र से क्षीण हुआ मनुष्य-मोर, मुर्गा, हंस, सारस एवं ग्राम, आनूप प्रदेश तथा जल में रहने वाले पक्षी के अण्डों की इच्छा करता है। मल से क्षीण हुआ मनुष्य-जौ, जई (छूद्रयव), अनेक प्रकार के शाक एवं मसूर तथा उड़द के जूस की इच्छा करता है। मूत्र से क्षीण हुआ मनुष्य-पेय (पीने योग्य) पदार्थ, ईख का रस, दूध, गुड़ के सहित बेर का जल, खीरा और ककड़ी की इच्छा करता है। स्वेद से क्षीण हुआ मनुष्य-मालिश करना, उबटन लगवाना, मद्य, वायुरहित प्रदेश में सोना-बैठना एवं मोटे भारी वस्त्र (रजाई आदि) ओढ़ने की इच्छा करता है। आर्तव (रज) से क्षीण हुई स्त्री-कटु, अम्ल तथा लवण रस युक्त पदार्थ फलों (लौकी, कोहड़ा आदि) का शाक तथा पान (शर्बत) की इच्छा करती है। स्तनों में दूध से क्षीण हुई स्त्री-मदिरा, शालि (अगहनी) धान्य का चावल, मांस, गौ का दूध, शक्कर, आसव, दही तथा हृदय के लिये हितकारक पदार्थ की इच्छा करती है और गर्भ से क्षीण हुई स्त्री- हरिण, बकरी, भेड़ तथा सूअर के गर्भो (गर्भस्थित बच्चों) को सविधि पका कर खाने की इच्छा करती है एवं वसा तथा मांस के अनेक प्रकार से बने हुए कबाव आदि पदार्थों को खाने की इच्छा करती है ॥१०५-११३॥ अथ सुश्रुतोक्तबललक्षणमाह- रसादिशुक्रपर्य्यन्तं धातुपुष्टिनिमित्तकम् । चेष्टासु पाटवं यत्तु बलं तदभिधीयते ॥११४॥ सुश्रुतोक्त बल लक्षण-रस से लेकर शुक्र पर्यन्त जो ७ धातुयें हैं उन सबों की पुष्टता के कारण उत्पन्न हुई जो चेष्टा करने में शरीर का सामर्थ्य है उसी को 'बल' कहते हैं ॥११४॥ अथ बलक्षयस्य निदानमाह- अभिघाताद्भयात्क्रोधाच्चिन्तया च परिश्रमात् । धातूनां संक्षयाच्छोकाद् बलं संक्षीयते नृणाम् ॥११५॥ बल का क्षय होने में कारण-अभिघात (चोट), भय, क्रोध, चिन्ता, परिश्रम, रस-रक्तादि ७ धातुओं का क्षय तथा शोक इन सबों के होने से मनुष्यों का बल क्षीण हो जाता है ॥११५॥ अथ बलक्षयस्य लक्षणमाह- गौरवं स्तब्धता गात्रे मुखम्लानिर्विवर्णता । तन्द्रा निद्रा वातशोथो बलव्यापत्तिलक्षणम् ॥११६॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

१०८२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे बलक्षय के लक्षण—शरीर में गुरुता तथा स्तब्धता (जकड़ाहट) का होना, मुख की मलिनता, शरीर की विवर्णता (वर्ण का बिगड़ जाना), तन्द्रा, निद्रा तथा वातसम्बन्धी शोथ ये सब लक्षण बलक्षय होने पर प्रकट होते हैं ॥११६॥ अथ बलवृद्धेर्निदानमाह— दोषसाम्बकरं यत्तु वह्निसाम्यकरं च यत्। धातुपुष्टिकं द्रव्यं बलं तदभिवर्द्धयेत् ॥११७॥ बलवृद्धि के कारण—जो पदार्थ वातादि दोषों को तथा जठराग्नि को समभाव में रखने वाले हैं, एवं धातुओं को पुष्ट करने वाले हैं वे सब बल के बढ़ाने वाले होते हैं ॥११७॥ अथ बलाबललक्षणमाह— कृशोऽपि बलवान्कश्चित् स्थूलोऽत्यल्पबलो यतः। तस्माच्चेष्टापटुत्वेन बलवन्तं विदुर्बुधाः ॥ इति श्रीमिश्रलटकनतनय-श्रीमन्मिश्रभावविरचिते श्रीभावप्रकाशे पूर्वखण्डे परिभाषादिप्रकरणे सप्तमं रोगिपरीक्षाप्रकरणं समाप्तम् ॥७॥ बलवान् तथा निर्बल के प्रधान लक्षण—कोई मनुष्य कृश शरीर वाला होकर भी बलवान् है और कोई स्थूल शरीर वाला होकर भी स्वल्प बलवाला दिखाई पड़ता है। अतः विद्वानों ने यह निश्चय किया कि—सबल तथा निर्बल होने में शरीर की स्थूलता तथा कृशता कारण नहीं है बल्कि चेष्टा (शारीरिक कार्य) करने में सामर्थ्य होने से मनुष्य को सबल और न होने से निर्बल समझना चाहिये ॥११८॥ इति श्रीमन्मध्वसम्प्रदायाचार्य-गोस्वामिश्रीदामोदरशास्त्रिणामन्तेवासिना मिश्रोपाह्वश्रीब्रह्मशङ्करशर्मणा विरचितायां 'विद्योतिनी' हिन्दीटीकायां पूर्वखण्डे परिभाषादिप्रकरणे सप्तमं रोगिपरीक्षाप्रकरणं समाप्तम् ॥७॥ इति पूर्वखण्डं समाप्तम् CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

परिशिष्ट- १ अस्थियों के विषय में-संक्षिप्त विवरण अस्थियों के विषय में प्राचीन तथा आधुनिक गणना में कुछ मतभेद दिखाई देता है। इसका एक कारण यह है कि प्राचीन महर्षियों ने दाँत तथा तरुणास्थियों को भी अस्थिरूप में गिना है और आजकल के शरीररचना-विज्ञान (Anatomy) के अनुसार उनका परिगणन अस्थियों से पृथक् होता है। तथा कुछ ऐसी भी अस्थियाँ हैं जो बाल्यावस्था में पृथक्-पृथक् रहती हैं पर अवस्था के अधिक होने पर जुड़ जाती हैं। और अस्थियों में स्थालक (अस्थि का वह प्रदेश जहाँ वह दूसरी अस्थिसे मिलती हैं। (Articular facit), अर्बुद (Tubercle अस्थि का वह प्रदेश जो अन्य भाग की अपेक्षा उभरा हुआ हो) आदि के पृथक् परिगणन से भी उनकी संख्या में भेद हो सकता है। और कई स्थानों पर सूक्तियों को भी अस्थिरूप में परिगणन किया है। जैसे चरक पर्श्वेस्थियों की संख्या ७२ मानते हैं। २४ पर्शुकायें, २४ उनके स्थालक तथा २४ अर्बुद कुल ७२ होते हैं। विषय में प्रथम सुश्रुत का मत लिखा जा रहा है जो कि यह है— त्रीणि सषष्टीन्यस्थिशतानि वेदवादिनो भाषन्ते। शल्यतन्त्रे तु त्रीण्येव शतानि। तेषां सविंशमस्थिशतं शाखासु, सप्तदशोत्तरं शतं श्रोणिपार्श्वपृष्ठोरःसु, ग्रीवायां प्रत्यूर्ध्वंत्रिषष्टिः, एवमस्थ्नां त्रीणि शतानि पूर्यन्ते। अर्थात्—अग्निवेश प्रभृति शास्त्रवादी ३६० अस्थियाँ शरीर में मानते हैं किन्तु शल्यतन्त्र में ३०० अस्थियों का ही वर्णन है। उसमें शाखाओं में १२० अस्थियाँ, श्रोणि, पार्श्व, पीठ और वक्षःस्थल में मिलाकर ११७ अस्थियाँ हैं और ग्रीवा तथा इससे ऊपर ६३ अस्थियाँ हैं। इस तरह अस्थियों की संख्या (१२०+११७+६३=३००) पूरी होती हैं। 'एकैकस्यां पादाङ्गुल्यां त्रीणि त्रीणि तानि पञ्चदश, तलकूर्चगुल्फसंश्रितानि दश, पाष्ण्यामेकं जङ्घायां द्वे, जानुन्येकम्, एकमूर्वाविति त्रिंशदेवमेकस्मिन्सक्थि भवन्ति। एतेनेतरसक्थिबाहू च व्याख्यातौ' ।। पैर की एक अंगुलियों में तीन-तीन अस्थियाँ इस तरह अंगुलियों में १५ अस्थियाँ हुई। तल, कूर्च, गुल्फ की १० अस्थियाँ, पाष्णि में एक तथा जंघा में दो, जानु में एक तथा ऊरु में एक, इस प्रकार एक टाँग में ३० अस्थियाँ तथा दूसरी टाँग और दोनों बाहु में मिलाकर कुल १२० अस्थियाँ हुई। 'श्रोण्यां पञ्च तेषां गुदभगनितम्बेषु चत्वारि, त्रिकसंश्रितमेकम्, पार्श्वे षट्त्रिंशदेकस्मिन्। द्वितीयेऽप्येवम्, पृष्ठेत्रिंशदष्टावुरसि, द्वे अंसफलके' । श्रोणि प्रान्त में पाँच अस्थियाँ होती हैं इनमें गुदा, भग तथा दोनों नितम्बों में मिलकर चार तथा त्रिक में एक, पार्श्व में ३६ इतना ही दूसरे पार्श्व में, छाती में आठ तथा अंसफलक (Scapula) में दो अस्थियाँ होती हैं। 'ग्रीवायां, नव, कण्ठनाड्यां चत्वारि, द्वे हन्वोः, दन्ता द्वात्रिंशत्, नासायां, त्रीणि, एकं तालुनि, गण्डकर्णशङ्खेष्वेकेकं, षट् शिरसीति । ग्रीवा में ९, कण्ठनाड़ी में ४, हनु में दो अस्थियाँ, दाँत ३२, नाक में ३, तालु में एक, गण्ड, कर्ण तथा शंख इनमें एक-एक (इस तरह दोनों तरफ के कुल मिला कर ६) तथा ६ अस्थियाँ सिर में होती हैं। अस्थियों का जो आधुनिक परिगणन किया जाता है उसमें दाँत तथा तरुणास्थियों का परिगणन नहीं होता है, किन्तु ४० से ५० वर्ष पूर्व परिगणन किया जाता था, इनकी संख्या निम्नलिखित प्रकार से होती है। सिर या करोटि में अस्थियाँ एक मंजूषा (सन्दूक) की तरह रचना बनाती हैं जिसके भीतर शारीरिक साम्राज्य का अधिपति मस्तिष्क (Brain) सुरक्षित रहता है।

१०८४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे सिर की ८ अस्थियाँ संमुखकपालास्थि (Frontal bone) १ | शंखास्थि (Temporal) २ पार्श्वकपालास्थि (Parietal) २ | झर्झरास्थि (Ethmoid) १ पश्चात्कपालास्थि (Occipital) १ | जतुकास्थि (Sphenoid) १ सब मिलाकर आठ अस्थियाँ सिर में होती हैं। मुख की १४ अस्थियाँ २ नासास्थि (Nasal) २ ताल्वस्थि (Palatal) २ ऊर्ध्वहन्विकास्थि (Maxilla) २ नासाफलकास्थि (Inferior Nasalconcha) २ गण्डास्थि (Malar or cheeck bones) १ हलाकार-अस्थि (Vomer) २ अश्रुविका (Lachrymal) १ अधोहन्विका (Mandible or Inferior Maxillary योग १४ ऊर्ध्वशाखा Uppar limbs की ६४ अस्थियाँ जिह्वामूलकास्थि (Hyoid) १ | प्रगण्डिका (Humerus) २ अक्षक (Clavicle) २ | अन्तःप्रकोष्ठास्थि (Ulna) २ अंसफलक (Scapula) २ | बहिःप्रकोष्ठास्थि (Radius) २ मणिबन्ध की अस्थियाँ (Wrist or Carpal bones) 31 करभास्थियां (हस्ततल में) (Meta Carpal bons) 10 अंगुलियों में (Phalaanges) में २८ (३×४=१२ अंगुलियों में तथा २ अंगूठे में=१४ एक हाथ में १४×२=२८ दोनों हाथों में मिलाकर) योग-६४ अधः शाखा की ६२ अस्थियाँ श्रोणिफलक या नितम्बास्थि (Hip bone or ossa innaminata) २ उर्विका (Femur) २ | गुल्फ देश में (Tarsal bones) १४ जानुकपालास्थि या जानुचक्रास्थि (Fatella) २ | प्रपद या पादतल की अस्थियाँ अन्तर्जङ्घिका (Tibia) २ | (Meta tarsal bones) १० बहिर्जङ्घिका (Fibula) २ | अङ्गुलियों में (Phalanges) २८ अधः शाखा की अस्थियाँ कुल ६२ हुईं पृष्ठवंश में २६ अस्थियाँ हैं इनके बीच में एक गोला छिद्र होता है जिसमें सुषुम्णा (spinal chord) रहती है उन अस्थियों के ५ समूह होते हैं। पृष्ठवंश की अस्थियाँ कशेरुकायें (Vertebra) कही जाती हैं। पृष्ठवंश की २६ अस्थियाँ ग्रीवा की (Cervica) कशेरुका ७ | त्रिकप्रदेश में त्रिकास्थियाँ (Sacrum) १

परिशिष्ट १ १०८५ पीठ की (Thoracic) कशेरुका १२ | गुदा प्रदेश में पुच्छास्थि (Coccyx) १ कटि की (Lumber) कशेरुका ५ | योग २६ | त्रिकास्थियाँ (Sacrum) अस्थि की परीक्षा करने पर वह ५ कशेरुकों के मिलने से बनी मालूम होती है इसी प्रकार पुच्छास्थि (Coccyx) भी ४ अस्थियों से मिलकर बनी है। वक्ष की २५ अस्थियाँ उरोऽस्थि (Sternum) १ | पर्शुकाएँ (Rids) २४ योग २५ कान के भीतर मध्यकर्ण में ६ छोटी-छोटी अस्थियाँ रहती हैं। प्रत्येक कर्ण के भीतर मध्य कर्ण में ३-३ अस्थियाँ होती हैं। जिनके नाम ये हैं— कान की ६ अस्थियाँ शूर्मिकास्थि (इङ्कस) २ मुद्गरास्थि (मैलियस) २ रकावास्थि (स्टैपीज) २ योग=६ इस प्रकार सामान्य २०६ अस्थियाँ मानी जाती हैं। अस्थियों के प्रकार जैसा कि सुश्रुत लिखते हैं:— 'एतानि पञ्चविधानि भवन्ति तद्यथा-कपालरुचकतरुणवलयनलकसंज्ञकानि' अर्थात् १ कपाल, २ रुचक, ३ तरुण, ४ वलय, ५ नलक इस भाँति से पाँच प्रकार की अस्थियाँ होती हैं। १ कपाल। २ रुचक—(दाँत) ये आज से प्रायः ५० वर्ष पूर्व अस्थि में ही पाश्चात्य सिद्धान्त के अनुसार भी गिने जाते थे किन्तु आजकल अस्थियों की रचना से इनकी रचना भिन्न होने के कारण अस्थि से पृथक् गिने जाते हैं। ३ तरुण—आजकल पाश्चात्य विज्ञान के अनुसार इनको सृक्ति कहा जाता है। ये भी अस्थियों से पृथक् माने जाते हैं। ४ वलय—पर्शुका आदि मुड़ी हुई अस्थियाँ इसके अन्दर आती हैं। ५ नलक-Long bones दीर्घ अस्थियाँ। अस्थियों की स्थिति 'तेषां जानुनितम्बांसगण्डतालुशङ्खशिरःसु कपालानि, दशनास्तु रुचकानि, घ्राणकर्णग्रीवाक्षिकोषेषु तरुणानि, पार्श्वपृष्ठोरःसु वलयानि, शेषाणि नलकसंज्ञकानि' (सु.शा.अ. ५) जानु, नितम्ब, स्कन्ध, कपोल, तालु, शंख तथा सिर में कपालास्थियाँ (Flats bones) हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

१०८६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे दाँत रुचकास्थियों से निर्मित हैं। नासिका, कर्ण, ग्रीवा तथा अक्षिकोष में तरुणास्थियाँ हैं। पार्श्व, पृष्ठ तथा वक्ष में वलयास्थियाँ हैं। इनके अतिरिक्त अन्य (हाथ-पैर आदि) भागों में नलक (Long bones) हैं। भोज ने भी लिखा है 'हस्तपादाङ्गुलितले कूर्चेषु मणिबन्धयोः । बाहुजङ्घाद्वये चापि जानीयान्नलकानि तु' ।। हाथ-पैर की अंगुलियों और पादतल तथा पाणितल, कूर्च, मणिबन्ध तथा जंघाओं में नलक अस्थियाँ होती हैं। अस्थियों के कार्य अस्थियाँ शरीर के सुदृढ़ होने में कारणभूत हैं। इनके कारण ही शरीर अपनी एक आकृति विशेष में स्थित रहता है। अन्यथा दबाव आदि के कारण इनका भी आकार परिवर्तित होना संभव था। तथा शरीर के बोझ को सँभालने के लिये भी किसी दृढ़ वस्तु की आवश्यकता थी। इसके अतिरिक्त हाथ, पैर आदि अंगों में जो गति होती है उसका कारण मांसपेशियाँ हैं तथा ये मांसपेशियाँ अस्थियों पर ही लगी हुई हैं। कोमल अङ्गों की रक्षा करना भी अस्थियों का एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। वक्ष के भीतर के हृदय तथा फुफ्फुस और उदरगुहा के यकृत् तथा प्लीहा प्रभृति कोमल अंग पसलियों द्वारा पूर्णतः सुरक्षित हैं। मस्तिष्क जैसे सुकोमल अंग के लिये प्रकृति के सिर की अस्थियों की जो सुन्दर मञ्जूषा (सन्दूक) बनाई है वैसा कौन कारीगर बना सकता है ? ये ही सब अस्थियों के साधारणतः कार्य हैं। कार्य के विषय में सुश्रुत लिखते हैं— 'अभ्यन्तरगतैः सारैर्यथा तिष्ठन्ति भूरुहाः । अस्थिसारैस्तथा देहा ध्रियन्ते देहिनां ध्रुवम् ।। तस्माच्चिरविनष्टे, त्वङ्मांसेपुशरीरिणाम् । अस्थीनि न विनश्यन्ति साराण्येतानि देहिनाम् ।। मांसान्यत्र निबद्धानि सिराभिः स्नायुभिस्तथा । अस्थीन्यालम्बनं कृत्वा न शीर्यन्ते पतन्ति वा ।। जिस प्रकार अन्तःस्थित सार के द्वारा वृक्ष स्थिर रहते हैं, उसी भाँति यह मानव शरीर अस्थियों द्वारा धारण किया जाता है। ये अस्थियाँ शरीर की सारभूत हैं। ये कठिन होने के कारण त्वचा तथा मांसादि के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होतीं। इन्हीं अस्थियों के साथ मांसपेशियाँ सिरा तथा स्नायुओं के द्वारा बँधी हुई हैं। अस्थि पर आश्रित होने ही के कारण वे कभी नष्ट तथा स्थान से भ्रष्ट नहीं होती हैं। अस्थियों को भी सजीव अङ्ग होने के कारण पोषण की आवश्यकता होती है। उनके भीतर सूक्ष्म धमनियों द्वारा रक्तप्रवाह होता रहता है। अस्थियाँ वास्तव में घन तथा सुषिर पर्तों द्वारा बनी हुई हैं। बाहर की तरफ घन भाग तथा भीतर की तरफ अस्थि का कुछ सुषिर भाग होता है। अस्थि के बीच में अस्थिमज्जा पाई जाती है। बड़ी अस्थियों की लाल मज्जा में रक्त के लाल कणों की उत्पत्ति होती है। मांस धातु शरीर में ७ धातुयें ऋषियों ने मानी हैं यथा— रसासृङ्मांसमेदोऽस्थिमज्जशुक्राणि धातवः । रक्त, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा तथा शुक्र ये सात धातुयें हैं। जो आहार प्रतिदिन किया जाता है उसका प्रथम

परिशिष्ट १ १०८७ रस बनता है, रस से रक्त, रक्त से मांस, मांस से मेद, मेद से अस्थि, अस्थि से मज्जा तथा मज्जा से शुक्र का निर्माण होता है। इस प्रकार मांसपेशियाँ रस से ही बनती हैं। किन्तु मांस के आहार से रस-रक्तादि की अपेक्षा मांस अधिक बनता है। शरीर के भिन्न-भिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न आकार के मांस का समूह रहता है। उन्हें हम पेशियाँ कहते हैं। मांसपेशियों का कार्य सिरास्नावस्थ्यपर्वाणि सन्थयश्च शरीरिणाम्। पेशीभिः संवृतान्यत्र बलवन्ति भवन्त्यतः।। (सु.शारीर.अ. ५) शरीर की सिरायें, स्नायु, अस्थियों के पर्व तथा सन्धियाँ, पेशियों से भलीभाँति आवृत हैं। अतः वे (सिरा आदि) बलवती होती हैं। शरीर में चलने-फिरने, उठने-बैठने आदि में गति होती है। इसके अतिरिक्त हाथ को हिलाना, पलकों को चलाना, बोलना, श्वास, मैथुन आदि जितनी भी गतियाँ शरीर में होती हैं मांस ही सब का कारण है। बिना मांस के किसी भी स्थान में गति नहीं होती। इस प्रकार किसी प्रकार की गति के लिये मांस आवश्यक है। इनमें सङ्कुचित तथा विस्तृत होने का खास गुण होता है। सारे शरीर के मांसों को पाश्चात्त्य विज्ञान के अनुसार दो भागों में विभाजित किया जाता है— १. ऐच्छिक मांसपेशियाँ। २. अनैच्छिक मांसपेशियाँ। १. ऐच्छिक पेशियाँ वे हैं जिन पर अपना अधिकार है जिनका इच्छानुसार संकोच तथा विस्तार कर सकते हैं, प्रायः अस्थियों पर लगी हुई पेशियाँ इसी समूह की होती हैं। २. अनैच्छिक मांसपेशियाँ वे हैं जिनमें अपनी इच्छा के अनुसार संकोच या विस्तार आदि कुछ भी परिवर्तन नहीं कर सकते, आन्त्र आदि शरीर के भीतरी अङ्ग इन्हीं पेशियों से निर्मित हैं। पेशियों की संख्या 'पञ्च पेशीशतानि भवन्ति, तासां चत्वारि शतानि शाखासु, कोष्ठे षट्षष्टिः, ग्रीवां प्रत्यूर्ध्वं चतुस्त्रिंशत्' ।। सुश्रुत शारीर. अ. ५ ।। पेशियां ५०० होती हैं, उनमें शाखा में ४००, कोष्ठों में ६६ तथा ग्रीवा में ३४ ये मिलकर ५०० होती हैं। 'एकैकस्यां पादाङ्गुल्यां तिस्रस्तिस्रस्ताः पञ्चदश, दश प्रपदे, पादोपरि कूर्चसन्निविष्टास्तावत्य एव, दश गुल्फतलयोः, गुल्फजान्वन्तरे विंशतिः, पञ्च जानुनि, विंशतिरूरौ, दश वङ्क्षणे, शतमेवमेकस्मिन्सक्थिन भवन्ति। एतेनेतरसक्थि बाहू च व्याख्यातौ' । पैर की १०० मांसपेशियाँ प्रत्येक पैर की अङ्गुलियों में ३-३ (३×५)=१५ पेशियाँ पैर के अगले प्रान्त (प्रपद) में १० गुल्फ तथा जानु (घुटने) के भीतर २० (प्रपदं पादाग्रमिति डल्हणः) जानु में ५ पैर के ऊपर कूर्च स्थान में लगी हुई पेशियाँ १० ऊरु (जाँघ) में २० गुल्फ (टखना) पादतल में मिलकर १० वङ्क्षण सन्धि में १० योग १०० इस प्रकार कुल शाखाओं में (१००×४) ४०० मांसपेशियां हुईं।

१०८८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे कोष्ठ की ६६ मांसपेशियाँ तिस्रः पायौ, एका मेढ्रे, सेवन्यां चापरा, द्वे वृषणयोः, स्फिचोः, पञ्च पञ्च, द्वे वस्तिशिरसि, पञ्चोदरे, नाभ्यामेका, पृष्ठोर्ध्वसन्निविष्टाः पञ्च पञ्च दीर्घाः, षट् पार्श्वयोः, दश वक्षसि, अक्ष-कांसौ प्रति समन्तात् सप्त, द्वे हृदयामाशययोः, षड् यकृत्प्लीहोण्डुकेषु । गुदा में ३ पेशियाँ, लिङ्ग में १, सीवनी में १, अण्डों में २, चूतड़ के दोनों ओर की ५-५ मिलाकर १०, वस्ति के ऊपरी भाग में २, उदर में ५, नाभि में १, पृष्ठ के ऊर्ध्व भाग में लगी हुई दीर्घ पेशियाँ (प्रत्येक ओर ५-५) १०, पार्श्व में ६, वक्ष में १०, अक्षक तथा स्कन्ध के चारों ओर मिलाकर ७, हृदय तथा आमाशय में २, यकृत्, प्लीहा तथा उण्डुक [मलाशय] में ६ । कोष्ठ की कुल पेशियों का योग ६६ ग्रीवा की ३४ पेशियाँ ग्रीवायां चतस्रः, अष्टौ हन्वोः, एकैका काकलकगलयोः, द्वे तालुनि, एका जिह्वायाम्, ओष्ठयोर्द्वे, नासायां द्वे, द्वे नेत्रयोः, गण्डयोश्चतस्रः कर्णयोद्वे, चतस्रो ललाटे, एका शिरसीति पञ्च पेशीशतानि । ग्रीवा में ४, दोनों हनु में ८, काकलक (घाँटी) में १, गले के भीतर १, तालु में २, जिह्वा में १, ओठों में २, नासिका में २, नेत्रों में २, कपोल में ४, कान में २, ललाट में ४, सिर में १ । ग्रीवा की कुल पेशियों का योग=३४ शाखाओं की पेशियाँ ४०० मध्य कोष्ठ की कुल पेशियाँ ६६ ग्रीवा से ऊपर ३४ इस भाँति कुल पेशियों का योग ५०० होता है । आधुनिक शरीर-शास्त्रज्ञ पेशियों की संख्या ५१९ मानते हैं । इन ५१९ पेशियों में से प्रायः ४५० अस्थियों पर लगती हैं तथा उनके गति की प्रवर्तक होती हैं शेष ६९ स्वरयंत्र, जिह्वा, तालुं, कण्ठ, नेत्र तथा कर्ण आदि में लगी रहती हैं । प्रायः शरीर की मध्य रेखा के दोनों तरफ दायें तथा बायें समूह में पेशियाँ होती हैं । आधुनिक मत से मांसपेशियों की संख्या ऊर्ध्व शाखा की मांसपेशियाँ (५९-५९)=११८ अधः शाखा की मांसपेशियाँ (५९-५९)=११८ मध्य शरीर (धड़) मांसपेशियाँ (६७-६७)=१३४ सिर तथा ग्रीवा मांसपेशियाँ (४०-४०)=८० योग=४५०

परिशिष्ट ९ १०८९ वक्षोदर मध्यस्था पेशी १. स्वरयन्त्र-की विशेष पेशियाँ ५ गले की मांसपेशियाँ ५. ‘बाह्य कर्ण विशेष पेशियाँ ६ जिह्वा की विशेष पेशियाँ ४. मध्य कर्ण विशेष पेशियाँ २ तालु विशेष पेशियाँ ४. अक्षिगोलक तथा ऊपरी पलक ७ योग ३४ यह एक ओर का हुआ दोनों भीतर तथा बाहर के ओर की पेशियों की संख्या=३४×२)=६८ इस प्रकार ४५० ६८ ग्रीवा तथा नेत्र गोलक आदि की पेशियाँ १ वक्षोदर मध्यस्था कुल पेशियां ५१९ पेशियों की स्थिति तथा कार्य के अनुसार विविध नाम उनके दिये गये हैं । जो कि प्रसंग बढ़ जाने के भय से यहाँ नहीं लिखे जा सकते । नारी-जननेन्द्रियों का संक्षिप्त विवरण सुश्रुत ने योनि की जो परिभाषा लिखी है उसके अनुसार आजकल के भग (Vulba), योनि (Vagina) तथा गर्भाशय (Uterus) ये सभी अङ्ग आ जाते हैं । सुश्रुत लिखते हैं— शङ्खनाभ्याकृतिर्योनिस्त्र्यावर्त्ता सा प्रकीर्त्तिता । तस्यास्तृतीये त्वावर्त्ते गर्भशय्या प्रतिष्ठिता ।। यथा रोहितमत्स्यस्य मुखं भवति रूपतः । तत्संस्थानां तथारूपां गर्भशय्यां विदुर्बुधाः ।। (सुश्रुतसंहिता) इससे स्पष्ट विदित होता है कि योनि के भीतरी भाग को ही वे गर्भाशय मानते हैं । इस विषय में आधुनिक वैज्ञानिकों का जो वर्णन मिलता है संक्षेप में उसकी चर्चा अनावश्यक न होगी । वे उत्पादक अङ्गों (Genaratine Organs) को दो भागों में विभाजित करते हैं— १. बाह्य जननेन्द्रियाँ तथा २. आभ्यन्तरिक जननेन्द्रियाँ । १. बाह्य जननेन्द्रियाँ—वे हैं जो बाहर से देखी जाती हैं । इनके समूह को (Vulba) कहते हैं । २. आभ्यन्तरिक जननेन्द्रियाँ—वे हैं जो कि वस्तिगुहा (Pelvic cavity) के अन्दर रहती हैं । बाह्यजननेन्द्रियाँ—इनमें निम्नलिखित भाग आते हैं । १. कामाद्रि (Mous veneres) २. बृहद् भगोष्ठ (Labia majora) ३. क्षुद्रभगोष्ठ (Lmiaibnora) ४ भगाङ्कुर (Clitoris) ५. योनिद्वार (Vaginal orifice) ६. मूत्रद्वार (Urethral orifiee) ७. योनिच्छद (Hyman) इनमें से प्रत्येक का संक्षिप्त विवरण नीचे दिया जा रहा है:— १. कामाद्रि (Mous veneres)—भग के ऊर्ध्वप्रदेश में होता है । तथा विटपसन्धि की सीध में होता है । इस स्थान में नीचे की ओर वसा (fat) रहती है । युवावस्था (Puberty) के आने पर इस स्थान पर लोम उगते हैं । ७२ भाव.I

१०९० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे २. बृहद् भगोष्ठ (Labia majora)—ये दो होते हैं। १. वाम बृहद् भगोष्ठ तथा दक्षिण बृहद् भगोष्ठ। ये योनिद्वार (Vaginal orifice) के दोनों ओर होते हैं। इनके नीचे वसा (fat) होती है। युवावस्था में इन पर लोम उगते हैं। बाल्यावस्था में ये दोनों बृहद्भगोष्ठ परस्पर मिले रहते हैं। मैथुन वा प्रसव होने के बाद ये दोनों पृथक् हो जाते हैं। ३. क्षुद्रभगोष्ठ—ये भी संख्या में दो होते हैं और बृहद्भगोष्ठो (Labia majora) के भीतर तथा योनिद्वारों के आस पास होते हैं। इनमें बसा कम होती है अतः ये पतले होते हैं। ये जिस समय भगांकुर के पास पहुँचते हैं उस समय दो भागों में विभाजित हो जाते हैं। ४. भगांकुर (Clitoris)—ऊपर की तरफ, जहाँ पर दोनों बृहद्भगोष्ठ मिलते हैं, उसके प्रायः आधा इंच के नीचे होता है। यह लचकीला होता है। मैथुन के समय यह उत्तेजित हो जाता है और शिश्न की भाँति स्पर्श में कठिन प्रतीत होता है। ५. योनिद्वार (Vaginal orifice)—यह बृहद् तथा क्षुद्र भगोष्ठों के मध्य में छिपा हुआ होता है। यदि अंगुलियों द्वारा भगोष्ठों को पृथक् करें तो भग के निचले भाग में योनिद्वार दिखाई देगा। ६. मूत्रद्वार (Vaginal orifice) यह योनिद्वार (Vrethral orifice) के आधे इञ्च ऊपर होता है। ७. योनिच्छद (Hyman)—यह एक झिल्ली (Menbrane) है जो कि योनिद्वार (Vaginal orifice) को बन्द किये रहती है। इसके बीच में छोटा-सा छिद्र होता है जिससे कि युवावस्था में आर्तव निकला करता है। प्रथम- सम्भोग में यह झिल्ली फट जाती है। कभी-कभी आघात के कारण भी योनिच्छद फट जाता है। योनिच्छद की उपस्थिति स्त्री-सतीत्व की अक्षुण्णता को प्रमाणिक करती है। कभी-कभी मैथुन के समय योनिच्छद नहीं फटता इस अवस्था में पशुवत् अधिक बल प्रयोग न करके शस्त्रकर्म (Peration) द्वारा उसे कटवा देना चाहिये। आभ्यन्तरिक जननेन्द्रियाँ—इसमें निम्नलिखित अङ्ग आते हैं— १. योनि (Vagina) ३. डिम्बप्रणाली (Fallopian tube) २. गर्भाशय (Uterus) ४. डिम्बप्रस्थि (Ovary) इनके संक्षिप्त विवरण नीचे दिये जा रहे हैं— १. योनि यह एक नलिका है जो भग से गर्भाशय के बीच में रहती है। इसकी अग्रिम भित्ति (anterior wall) २ से ३ इंच्छ लम्बी तथा पश्चिम भित्ति ३ से ४ इञ्च लम्बी होती है। इसके सामने की ओर मूत्रप्रणाली (Urethra) और मूत्राशय (Bladder) तथा पीछे की ओर मलाशय (Rectum) रहता है। इसकी पूर्व तथा पश्चिम भित्तियाँ परस्पर मिली रहती हैं। यह नलिका आवश्यकता पड़ने पर (जैसे प्रसव के समय) बढ़ तथा फैल सकती है। गर्भाशय-ग्रीवा (Cervix) का कुछ भाग योनि में आता है। इस प्रकार योनि में चार कोण (Fornix) बन जाते हैं। जो ग्रीवा के सामने होता है वह अग्रकोण (auterio fornix), जो पीछे होता है वह पश्चात् कोण (Posterior fornix) तथा जो पार्श्व में २ कोण बनते हैं उन्हें (Lateralforices) कहते हैं। पश्चात् कोण (Posterior fornix) सबसे अधिक गहरा है। योनि से एक विशिष्ट स्राव निकला करता है इसकी प्रतिक्रिया आम्लिक होती है। योनि में उपस्थित एक विशेष प्रकार के कीटाणु (डोर्डरलीन के जीवाणु) तक्राम्ल (Lactic acid) पैदा करते हैं जो कि प्रायः अन्य जीवाणुओं के लिये घातक होता है। इस प्रकार बाहर से किसी प्रकार विकार उत्पन्न करने वाले जीवाणु वहाँ पहुँच जायें तो भी वे इस तक्राम्ल (Lactic acid) के कारण नष्ट कर दिये जाते हैं।

परिशिष्ट १ १०११ २. गर्भाशय योनि के ऊपरी भाग से इसका प्रारम्भ होता है। इसके सामने की ओर मूत्राशय (Bladder) तथा पीछे की ओर मलाशय होता है। यह बड़े अमरूद के आकार का किन्तु सामने तथा पीछे की ओर चपटा होता है। सुश्रुत ने रीहित- मत्स्य के मुख से गर्भाशय की उपमा दी है। यथा रोहितमत्स्यस्य मुखं भवति रूपतः। तत्सस्थाना तथारूपां गर्भशय्यां विदुर्बुधाः। गर्भाशय में ही गर्भ का पोषण होता है, यहीं गर्भ अपनी पूर्ण वृद्धि तक पहुँचता है तथा प्रसव के समय बाहर निकलता है। गर्भाशय के तीन भाग हैं— ऊपर का भाग मुण्ड १. (Lundus), मध्य का भाग गात्र (Body) तथा इससे नीचे का भाग ग्रीवा (Cervix) है। गर्भाशय की श्लैष्मिक कला (Endometrium) में नलिकाकार ग्रन्थियाँ (Tubular glands) होती हैं जिनसे क्षारीय स्राव निकलता रहता है। गर्भाशय के दोनों ओर दो विस्तृत स्नायु (Broad ligaments) होते हैं तथा पीछे की तरफ दो बन्धन होते हैं उन्हें गर्भत्रिक स्नायु (Uterosa cialligaments) कहते हैं, वे पीछे की तरफ त्रिकास्थि के उभरे हुये भाग (Promontry) पर लगे हुये हैं। गोलबन्धन (Roundligaments) ये भी संख्या में दो होते हैं। ये इतने ढीले होते हैं कि यह कहना कि गर्भाशय को उसके स्थान से भ्रंश होने से बचाते हैं अधिक उचित नहीं प्रतीत होता। हाँ गर्भाशय-भ्रंश को ठीक करने में अवश्य सहायक होते हैं। साधारण स्थिति में गर्भाशय कुछ मूत्राशय की तरफ को झुका रहता है तथा जिस स्थान पर गात्र ग्रीवा से मिलता है वहाँ पर गर्भाशय अपने ही ऊपर कुछ मुड़ा होता है इस प्रकार गर्भाशय (Slightly anteverted and antifixed) रहता है। उदर की परिविस्तृत कला (Feritoneum) मूत्राशय के ऊपर से होकर गर्भाशय की पूर्व भित्ति पर पहुँचती है। इस प्रकार मूत्राशय की पश्चिम भित्ति (Posterior wall) तथा गर्भाशय की पूर्व भित्ति (anterior wall) के बीच एक खात बनता है इसका नाम (Uterovasical ponch) है। इसके बाद परिविस्तृत कला गर्भाशय के पश्चात् भित्ति से होकर फिर मलाशय पर चली जाती है और मलाशय से आगे आन्त्रनिबन्धन—कला (mesentry) से मिल जाती है। इस प्रकार मंलाशय तथा मूत्राशय के बीच एक खात उत्पन्न होता है उसे (Rectal uterin ponch or Ponch of Douglas) कहते हैं। गर्भाशय की आकृति तथा तौल तथा इसके बन्धन, उदर का दाब (intra abdominal pressure) तथा वस्ति गुहा की नीचे की भित्ति ये वे सब मिलकर गर्भाशय को अपनी स्थिति में रखते हैं। इनके विकार से गर्भाशय की स्थान से विच्युति (displacement) होती है। ३. डिम्ब प्रणाली (Fallopian tube) ये गर्भाशय के पार्श्विक कोणों से प्रारम्भ होती हैं। दोनों तरफ दो डिम्बप्रणालियाँ होती हैं तथा विस्तृत स्नायु (Broad ligaments) के ऊपरी भाग से आच्छादित रहती हैं। इनकी लम्बाई ४ इञ्च है। इस नलिका के चार भाग किये जाते हैं। १. प्रथम—गर्भाशय के अन्दर रहने वाला भाग २. दूसरा—इसके आगे का संकीर्ण भाग

१०९२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ३. तीसरा—इसके आगे का अपेक्षा कृत विस्तृत भाग ४. चौथा—इस नलिका के झालरदार सिरे का भाग कहा जाता है। दोनों नलिकाओं (Infundibul pelvic fragments) के द्वारा वस्तिगुहा के पार्श्विक भाग से सम्बन्धित हैं। ४. डिम्बग्रन्थि (Ovary) ये बदाम के आकार की दो ग्रन्थि हैं जो कि विस्तृत स्नायु के पश्चिम भित्ति पर लगी हुई हैं। ये १ १/२ डेढ़ इञ्च लम्बी तथा ३/४ पौन इञ्च चौड़ी तथा १/२ आधी इञ्च मोटी होती हैं। प्रत्येक डिम्बग्रन्थि में अनेक डिम्बकोष (Craffian follicle) होते हैं तथा इन डिम्बकोषों में एक-एक डिम्ब (Ovum) होता है। जिस समय डिम्ब परिपक्व (Ripe) होता है उस समय डिम्बकोष (Graffian follicle) फट जाता है और (Ovum) डिम्बप्रणाली (Fallopian tube) में प्रविष्ट होता है। इस प्रकार डिम्बप्रणाली ही में शुक्र से उसका सम्पर्क होता है तथा वहाँ भ्रूण की वृद्धि ६ दिन तक होती है। इसके उपरान्त भ्रूण गर्भाशय में प्रवेश करता है तथा नवम मास पर्यन्त वहीं बढ़ता रहता है। डिम्बकोष के फटने पर रिक्त डिम्बकोष में रक्त एकत्र होता है जो कुछ समय में एक पीतवर्ण के पिण्ड में परिवर्तित हो जाता है। इसे (Corpus Iuteum) कहते हैं। गर्भाधान हो जाने पर इसमें कुछ और परिवर्तन होते हैं तथा यह बढ़ता है। किन्तु गर्भाधान न हुआ तो यह मुरझा कर श्वेत वर्ण का हो जाता है। डिम्ब—(Ovum) यह एक गोल तन्तु (Cell) है इसका व्यास १/१२० इञ्च है। नारियों के स्तन का विवरण स्तन—इनका जननेन्द्रियों में परिगणन नहीं है किन्तु जननेन्द्रियों से इनका सम्बन्ध अवश्य है। स्तन के स्पर्श से वहाँ की नाड़ी में किसी प्रकार उत्तेजना से गर्भाशय में संकोच प्रारम्भ हो जाता है तथा स्त्री एक विशेष आनन्द का अनुभव करती है। उत्तेजना की अवस्था में स्तन दृढ़ तथा चूचुक कड़े हो जाते हैं। ये स्तन वक्ष में ऊपर की ओर द्वितीय पर्शुका से लेकर नीचे छठीं पर्शुका तक होते हैं। तथा सामने से पीछे की ओर वक्षिका (Slesunm) के किनारे से लेकर मध्यकक्षीयरेखा (Midaxillary line) तक होते हैं। ये अर्द्धवृत्ताकार होते हैं, इनके ऊपरी भाग में एक वर्तुल उभार होता है जिसे चूचुक (Nipple) कहते हैं। इसमें १२ से २० छिद्र होते हैं जिनसे कि दुग्ध-स्रोतों द्वारा दुग्ध निकलता है। चूचुक के चारों ओर एक गहरे रङ्ग का मण्डल होता है इसे स्तनमण्डल (Areola) कहते हैं। स्तन के भीतर अनेक दुग्धग्रन्थियाँ (Lactals) होती हैं तथा वसा भी उपस्थित रहती है। ये दुग्धवाहिनियाँ रथ के चक्र की भाँति स्तन में स्थित हैं। पुरुष-जननेन्द्रियों का संक्षिप्त विवरण इसमें १. अण्ड (sorotum) । २. उपाण्ड । ३. अण्डरज्जु (Spermatic cord) । ४. शुक्राशय । ५. शिश्न ये अङ्ग होते हैं। १. अण्ड ये संख्या में दो होते हैं। यहाँ का चर्म एक प्रकार के थैले की भांति रचना बनाता है। इस प्रकार—दो थैलों में दो अण्ड रहते हैं, इनकी उत्पत्ति उदरगुहा में होती है। भ्रूण के आठवें मास के अन्त में ये उदरगुहा से निकल कर अपने निवासस्थानभूत थैले में पहुँच जाते हैं। उदरगुहा से ये अण्डकोश अण्डरज्जु (Spermatio cord) द्वारा लटकते रहते हैं। इनके ऊपर एक आवरण होता है उसे अण्डवेष्ट (Tunica vaginalis) कहते हैं। इसके स्तरों के बीच में कुछ

परिशिष्ट १ १०९३ द्रव रहता है जब इस द्रव की मात्रा अधिक बढ़ जाती है तो उसे अण्डतरलातिवृद्धि (Hydrocyl) कहते हैं। इन अण्डों के तन्तुओं (सेलों) द्वारा शुक्र (Semen) का निर्माण होता है। २. उपाण्ड ये अण्डों के ऊपर चिपके हुये रहते हैं इनके निचले भाग से अण्डरज्जु प्रारम्भ होते हैं। ३. अण्डरज्जु ये रस्सी की भाँति होते हैं। उनमें एक अत्यन्त सूक्ष्म आलपीन के नोक के समान एक सूक्ष्म छिद्र होता है इसी के द्वारा शुक्र शुक्राशय को जाता है। ये उपाण्ड से प्रारम्भ होकर उदर में (Through the external abdominal ring, ingoinal canal and internal abdominal ring.) प्रवेश करते हैं, वहाँ से जाकर वे नीचे की तरफ घूम कर मलाशय तथा मूत्राशय के बीच में स्थित शुक्राशय में खुलते हैं। ४. शुक्राशय ये अत्यन्त घूमे हुये होते हैं। मलाशय तथा मूत्राशय के बीच में इनकी स्थिति होने के कारण मलाशय तथा मूत्राशय के भरे रहने पर इन पर दाब पड़ता है। इस प्रकार मूत्र तथा मल से तथोक्त आशयों के भरे होने पर स्वप्न में शुक्रमेह की सम्भावना अधिक होती है। जैसा कि नाम से ही प्रकट है। अण्डों द्वारा बना हुआ शुक्र इन्हीं में आता है। ये आगे चलकर पतली नलिका (इजीकुलेटरी डक्ट) में समाप्त होते हैं जो कि (नलिका) मूत्रमार्ग में जाकर खुलती है। ५. अष्ठीलाग्रन्थि (प्रोस्टेट) यह युवावस्था में मूत्रनलिका के प्रारम्भिक १ से १। इन्च भाग को चारों तरफ से आवृत किये रहती है। मैथुन के समय इसका स्राव भी शुक्र में मिल जाता है। ६. शिश्न यह मांसपेशियों के ३ दण्डिकाओं से निर्मित है, दो दण्डिकायें पार्श्व तथा कुछ ऊपर की ओर तथा एक दण्डिका नीचे की तरफ होती है, ऊपर के दण्डिकाओं में केशिकाओं की अत्यन्त अधिकता है तथा इनमें कोई छिद्र नहीं होता है। नीचे का दण्ड पोला होता है। इसमें एक नलिका होती है जिसके द्वारा शुक्र तथा मूत्र निकलते हैं। ऊपर की दोनों दण्डिकायें शिश्नमुण्ड के पास पहुँचने के पूर्व ही समाप्त हो जाती हैं, केवल नीचे की दण्डिका आगे चल कर छत्र की भांति विस्तृत हो जाती है इसे ही शिश्नमुण्ड कहते हैं। इसमें एक छिद्र होता है। जिसके द्वारा शुक्र तथा मूत्र बाहर निकलते हैं। ये तीनों शिश्न दण्डिकायें संयुक्त रहती हैं। इनके ऊपर त्वचाओं का आवरण रहता है। शिश्न अचैतन्यावस्था में ३ से ४ इञ्च लम्बा होता है और मृदु होता है किन्तु चैतन्यावस्था में उपरोक्त शिश्न-दण्डिका ही फूल कर मोटी हो जाती है और शिश्न अपेक्षाकृत अधिक लम्बा (६ से ९ इञ्च तक) तक कठिन हो जाता है। इसका कारण यह है कि पूर्व कही हुई दोनों शिश्न-दण्डिकाओं की रचना ऐसी है कि उसमें बहुत से कोष्ठक हैं और इन कोष्ठकों में सूक्ष्म केशिकाओं का जाल-सा बिछा हुआ है। जब किसी प्रकार उत्तेजना होती है तो ये केशिकायें रक्त से परिपूर्ण हो जाती हैं। अतः यही रक्त-परिपूर्णता शिश्न के काठिन्य में कारण है; कार्य-निवृत्ति के अनन्तर तथोक्त केशिकाओं से रक्त लौटकर पुनः स्वस्थ्हान में (समीपस्थ रक्तवाहिनी धमनियों तथा सिराओं में) पहुँच जाता है अतः शिश्न पुनः शिथिल हो जाता है। जननेन्द्रिय का विषय अत्यन्त विस्तृत है। उसका संक्षेपातिसंक्षेप में यहाँ वर्णन किया गया है। पाठक अधिक विवरण के लिये जननेन्द्रिय-सम्बन्धी पाश्चात्य विद्वानों द्वारा रचित ग्रन्थों का अध्ययन करें।