भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ सप्तमं रोगिपरीक्षाप्रकरणम् १०७९ होते हैं। मेदा का क्षय होने पर—प्लीहा की वृद्धि, सन्धियों का शून्य हो जाना, शरीर में रूक्षता तथा स्निग्ध (स्नेहयुक्त) मांस खाने की इच्छा होना ये सब लक्षण होते हैं। अस्थि का क्षय होने पर—अस्थियों में शूल (अत्यन्त पीड़ा), शरीर में रूक्षता, नख तथा दाँतों का टूटना ये सब लक्षण होते हैं। मज्जा का क्षय होने पर—शुक्र की अल्पता, पर्वभेद (पोरों में टूटने की सी पीड़ा, सूई चुभोने की सी पीड़ा तथा अस्थियों में शून्यता ये सब लक्षण होते हैं और शुक्र का क्षय होने पर—स्त्री के साथ रति (मैथुन) करने में शक्ति न रहना, लिङ्ग तथा अण्डकोश में पीड़ा होना, बहुत देर में शुक्र का निकलना तथा शुक्र निकलने पर उसकी मात्रा थोड़ी होना तथा रक्त भी मिला रहना ये सब लक्षण प्रकट होते हैं ॥७८-८५॥ अथौजःक्षयस्य निदानमाह— ओजः संक्षीयते कोपाच्चिन्ताशोकश्रमादिभिः। रूक्षतीक्ष्णकटुकैः कर्षणैरपरैरपि ॥८६॥ ओज के क्षय होने का कारण—अधिक कोप, चिन्ता, शोक तथा श्रम आदि करने से एवं रूक्ष, तीक्ष्ण, उष्ण तथा कटुरसयुक्त पदार्थों का विशेष सेवन करने से तथा अन्यान्य कर्षणकारक (उपवासादि) व्यापारों से भी ओज का क्षय होता है ॥८६॥ अथ क्षीणौजसो लक्षणमाह— बिभेति दुर्बलोऽभीक्ष्णं चिन्तयेद्व्यथितेन्द्रियः। अभ्युत्थायोन्मना रूक्षः स्यादोजसः क्षये ॥८७॥ ओज के क्षय होने के लक्षण—ओज का क्षय होने पर मनुष्य सर्वत्र भय करता है, सदा दुर्बल रहता है तथा चिन्ता करने से उसकी इन्द्रियाँ व्यथित रहती हैं, उत्साह करके फिर हतोत्साह हो जाता है और रूक्ष तथा क्षीण शरीर वाला हो जाता है ॥८७॥ पुरीषस्य क्षये पार्श्वे हृदये च व्यथा भवेत्। सशब्दस्यानिलस्योर्ध्वगमनं कुक्षिसंवृतिः ॥८८॥ मल के क्षय होने के लक्षण—मल (विष्ठा) के क्षय होने पर मनुष्य की पंसुली तथा हृदय में पीड़ा होती है और पेट में शब्द करता हुआ वायु ऊपर को चढ़ता है तथा उदर संकुचित हो जाता है ॥ ❖ कुक्षिसंवृतिः=उदरसङ्कोचः ॥८८॥ यहाँ 'कुक्षिसंवृतिः' पद का 'उदरसङ्कोच' अर्थ समझना चाहिये ॥८८॥ अथ मूत्रादीनां क्षयस्य लक्षणमाह— मूत्रक्षयेऽल्पमूत्रत्वं वस्तौ तोदश्च जायते। स्वेदनाशस्त्वचो रौक्ष्यं चक्षुषोरपि रूक्षता ॥८९॥ स्तब्धाश्च रोमकूपाः स्युर्लिङ्गं स्वेदक्षये भवेत्। आर्त्तवस्य स्वकाले चाभावस्तस्याल्पताऽथ वा ॥ जायते वेदना योनौलिङ्गं स्यादात्तर्वक्षये। अभावः स्वल्पता वा स्यात्स्तन्यस्य भवतस्तथा ॥ म्लानौ पयोधरावेतल्लक्षणं स्तन्यसंक्षये। अनुन्नतो भवेत्कुक्षिर्गर्भस्यास्पन्दनं तथा ॥ इति गर्भक्षये प्राज्ञैर्लक्षणं समुदाहृतम् ॥९२॥ मूत्रादि के क्षय होने के लक्षण—मूत्र का क्षय होने पर—थोड़ा मूत्र होना तथा वस्ति में सूई चुभने की सी पीड़ा होना ये सब लक्षण होते हैं। स्वेद का क्षय होने पर—स्वेद (पसीना) का न निकलना, त्वचा तथा नेत्रों में रूक्षता, रोमकूपों में स्तब्धता ये सब लक्षण उत्पन्न होते हैं। आर्तव (रज) का क्षय होने पर—स्त्रियों को ऋतुकाल का समय होने पर भी आर्तव का स्राव एक दम से न होना अथवा थोड़ी मात्रा में स्राव होना एवं योनि में पीड़ा होना ये सब लक्षण होते हैं। स्तनों में दूध का क्षय होने पर—स्तनों में दूध का अत्यन्ताभाव या बहुत कम निकलना तथा स्तनों का म्लान हो जाना ये सब लक्षण होते हैं और गर्भ का क्षय होने पर—'गर्भिणी स्त्रियों के कोख का पचक जाना तथा गर्भ का न फड़कना ये लक्षण होते हैं ॥८९-९२॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA