भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०७८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे का अत्यन्त स्राव होना, आर्तव में दुर्गन्धता तथा अङ्गों का टूटना ये सब लक्षण होते हैं। स्तनों में दूध की अधिक वृद्धि-स्तनों का अत्यन्त मोटा हो जाना, दूध का बारम्बार स्राव होना एवं स्तनों में सुई चुभोने की सी पीड़ा होना ये सब लक्षण होते हैं और गर्भिणी स्त्रियों के गर्भ की वृद्धि होने पर-उदर आदि अङ्गों का अत्यन्त बढ़ जाना, स्वेद अधिक निकलना तथा प्रसव के समय अधिक पीड़ा होना ये सब लक्षण प्रकट होते हैं ॥६६-७३॥ अथातिवृद्धानां दोषधातुमलानां ह्रासनमाह- तत्तद्ध्रासकराहारविहारपरिषेवणात्। दोषाधातुमलानां हि ह्रासो निगदितो नृणाम् ॥७४॥ पूर्वः पूर्वोऽतिवृद्धत्वाद् वर्द्धयेद्धि परस्परम्। तस्मादतिप्रवृद्धानां धातूनां ह्रासनं हितम् ॥७५॥ अत्यन्त बढ़े हुये दोष, धातु तथा मलों के कम करने का प्रकार-मनुष्यों के दोष, धातु तथा मल इनमें से जो बढ़े हुए हों उन सब को करने वाले जो आहार तथा विहार हों उनके सेवन करने से दोषादि का कम करना कहा हुआ है। क्योंकि दोष, धातु तथा मल इनमें से पूर्व-पूर्व के अत्यन्त बढ़ने से परस्पर एक दूसरे को बढ़ाते रहते हैं। अतएव अत्यन्त बढ़े हुये धातुओं का ह्रास (कम) करना हितकर होता है ॥७४-७५॥ अथ दोषधातुमलानां क्षयस्य निदानान्याह- असात्म्यान्नसदाक्रोधशोकचिन्ताभयश्रमैः । अतिव्यवायानाशनात्यर्थसंशोधनैरपि ॥७६॥ वेगानां धारणाच्चापि साहसादभिघाततः। दोषाणामय धातूनां मलानाञ्च भवेत्क्षयः ॥७७॥ दोष-धातु तथा मलों के क्षय होने के कारण-असात्म्य (अहितकारक) अन्न का सेवन, सर्वदा क्रोध, शोक, चिन्ता, भय तथा श्रम का करना, अत्यन्त मैथुन तथा उपवास, अत्यन्त संशोधन कर्म (वमन, विरेचनादि) करना, मल- मूत्रादि के वेगों का रोकना, अत्यन्त साहसकर्म तथा दण्डप्रहार आदि अभिघात से दोष, धातु तथा मलों का क्षय होता है ॥७६-७७॥ अथ क्षीणानां तेषां लक्षणान्याह- वातक्षयेऽल्पचेष्टत्वं मन्दवाक्यं विसंज्ञता । पित्तक्षयेऽधिकः श्लेष्मा वह्निमान्द्यं प्रभाक्षयः ॥७८॥ सन्धयः शिथिला मूर्च्छा रौक्ष्यं दाहः कफक्षये । हृत्पीडाकण्ठशोषौत्वक्शून्या तृट् च रसक्षये ॥७९॥ सिराः श्लथा हिमाम्लेच्छा त्वक्पारुष्यं क्षयेऽसृजः। गण्डौष्ठकन्धरास्कन्धवक्षोजठरसन्धिषु ॥८०॥ उपस्थशोथपिण्डीषु शुष्कता गात्ररूक्षता । तोदो धमन्यः शिथिला भवेयुर्माससंज्ञये ॥८१॥ प्लीहाभिवृद्धिः सन्धीनां शून्यता तनुरूक्षता । प्रार्थना स्निग्धमांसस्य लिङ्गं स्यान्मेदसः क्षये ॥८२॥ अस्थिशूलं तनौ रौक्ष्यं नखदन्तत्रुटिस्तथा। अस्थिक्षये लिङ्गमेतद्वैद्यैः सर्वैरुदाहृतम् ॥८३॥ शुक्रालपत्वं पर्वभेदस्तोदः शून्यत्वमस्थिनि। लिङ्गान्येतानि जायन्ते नराणां मज्जसंज्ञये ॥८४॥ शुक्रक्षये रतेऽशक्तिर्व्यथा शेफसि मुष्कयोः । चिरेण शुक्रसेकः स्यात्सेके रक्ताल्पशुक्रता ॥८५॥ क्षीण हुये दोषादि के लक्षण-वायु का क्षय होने पर-शरीर में अल्प चेष्टा होना, थोड़ा बोल सकना तथा संज्ञाहीन होना ये सब लक्षण होते हैं। पित्त का क्षय होने पर-अधिक कफ निकलना, अग्नि की मन्दता तथा शरीर की कान्ति का क्षय होना ये सब लक्षण प्रकट होते हैं। कफ का क्षय होने पर-सन्धियों की शिथिलता, मूर्च्छा, शरीर में रूक्षता तथा दाह होना ये सब लक्षण होते हैं। रस का क्षय होने पर-हृदय में पीड़ा, कण्ठ सूखना, त्वचा का शून्य होना तथा प्यास अधिक लगना ये सब लक्षण प्रकट होते हैं। रक्त का क्षय होने पर-सिराओं का शिथिल हो जाना, शीतल तथा अम्ल पदार्थ खाने की इच्छा होना तथा त्वचा का कठोर होना ये सब लक्षण होते हैं। मांस का क्षय होने पर-गण्डस्थल, ओष्ठ, गर्दन, कन्धे, छाती, पेट, सन्धियाँ, लिङ्ग का शोथ (चैतन्य होने पर मोटापन) और पिंडरी का सूख जाना, शरीर में रूक्षता तथा सूई चुभोने के समान पीड़ा होना, धमनियों का शिथिल हो जाना ये सब लक्षण CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA