भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ सप्तमं रोगपरीक्षाप्रकरणम् १०७७ वमन, मूर्च्छा, शरीर में ग्लानि, भ्रम तथा कफ निकलना ये सब लक्षण होते हैं और रक्त की वृद्धि होने पर-शरीर तथा नेत्र का रक्तवर्ण होना तथा सिराओं का रक्त से पूर्ण होना ये सब लक्षण प्रकट होते हैं ॥५७-६०॥ अन्यच्च- रक्तन्तु कुरुते वृद्धं विसर्पप्लीहविद्रधीन् । कुष्ठं वातस्रकं गुल्मं सिरापूर्णत्वकामले ।।६१।। गात्राणां गौरवं निद्रा मदो दाहश्च जायते । व्यङ्गाग्निस्राद संमोहरक्तत्वङ्नेत्रमूत्रताः ।।६२।। गुदमेढ्रास्यपाकार्शःपिटकामशकास्तथा । इन्द्रलुप्ताङ्गमर्दासृग्धरांस्तापं कराङ्घ्रिषु ।।६३।। शमयेद्रक्तवृद्ध्यात्यान् रक्तस्रुतिविरेचनैः । मांसं वृद्धन्तु गण्डौष्ठस्फिगुपस्थोरुबाहुषु । जङ्घयोः कुरुते वृद्धिं तथा गात्रस्य गौरवम् ।।६४।। उदरे पार्श्वयोर्वृद्धिः कासश्वासादयस्तथा। दौर्गन्ध्यं स्निग्धता गात्रे मेदोवृद्धौ भवेदिति ।।६५।। रक्तवृद्धि के अन्य लक्षण-रक्त की वृद्धि होने पर-विसर्प, प्लीहा, विद्रधि, कुष्ठ, वातरक्त, गुल्म, सिराओं का रक्त से परिपूर्ण होना, कामला, अङ्गों की गुरुता, निद्रा, मद, दाह, व्यङ्ग (झाईं), अग्नि की मन्दता, संमोह, त्वचा, नेत्र तथा मूत्र का रक्तवर्ण होना, गुदा, लिङ्ग या योनि तथा मुख का पकना, अर्श (खूनी बवासीर), फुन्सी, मसा, इन्द्रलुप्त रोग, अङ्गों का टूटना, रक्तप्रदर, हाथ तथा पैर में ताप होना ये सब लक्षण रक्त की वृद्धि होने पर प्रकट होते हैं। रक्त की वृद्धि होने से उत्पन्न हुये रोगों को रक्तस्राव तथा विरेचन द्वारा शान्त करना चाहिये। मांस की वृद्धि होने पर- गण्डस्थल, ओष्ठ, कूल्हा, लिङ्ग, जङ्घा, बाहु और पिण्डरी इन सबों में मांस की वृद्धि तथा शरीर में गुरुता ये सब लक्षण होते हैं ओर मेदा की वृद्धि होने पर-उदर तथा पार्श्व की वृद्धि, कास तथा श्वास आदि रोग, शरीर में दुर्गन्धता तथा स्निग्धता ये सब लक्षण होते हैं॥ अन्यच्च- प्रवृद्धं कुरुते मेदः श्रममल्पेऽपि चेष्टिते । तृट्स्वेदगलगण्डौष्ठरोगमेहादिजन्म च ।।६६।। श्वासं स्फिग्जठरग्रीवास्तनानां लम्बनं तथा। वृद्धान्यस्थीनि कुर्वन्ति अस्थीन्यन्यानि चास्थिषु ।। आचरन्ति तथा दन्तान्विक्तानन्महतस्तथा। मज्जा वृद्धः समस्ताङ्गेनेत्रगौरवमाचरेत् ।।६८।। शुक्राश्मरी शुक्रवृद्धौ शुक्रस्यातिप्रवर्त्तनम् । मलप्रवृद्धावाटोपी जायते जठरे व्यथा ।।६९।। मूत्रे वृद्धे मुहुर्मूत्रमाध्मानं बस्तिवेदना । स्वेदे वृद्धे तु दौर्गन्ध्यं त्वचि कण्डूश्च जायते ।।७०।। आर्त्तवातिप्रवृत्तिः स्याद्दौर्गन्ध्यं चार्त्तवे भवेत् । अङ्गमर्दश्च जायेत लिङ्गं स्यादात्तर्वेऽधिके ।।७१।। स्तनयोरतिपीनत्वं क्षीरस्रवो मुहुर्मुहुः । तोदश्च तत्र भवति स्तन्यधिक्यस्य लक्षणम् ।।७२।। उदरादिप्रवृद्धिस्तु वृद्धे गर्भेऽभिजायते । स्वेदश्च गर्भवत्याः स्यात्प्रसवे व्यसनं महत् ।।७३।। मेदा वृद्धि के अन्य लक्षण-भेदा की वृद्धि होने पर-थोड़े से भी परिश्रम करने में अधिक थकावट तथा अधिक प्यास मालूम पड़ना, पसीना अधिक निकलना, गला, गण्डस्थल तथा ओष्ठसम्बन्धी रोग तथा प्रमेहादि रोगों का होना, श्वास रोग एवं कूल्हा, उदर, गर्दन तथा स्तनों का लटक पड़ना, ये सब लक्षण होते हैं। अस्थि की वृद्धि होने पर- अस्थियों के ऊपर दूसरी अस्थियों का उत्पन्न होना एवं दाँतों का विकट तथा बड़ा हो जाना ये सब लक्षण होते हैं। मज्जा की वृद्धि होने पर-सम्पूर्ण अङ्गों तथा नेत्रों में गुरुता होना यह लक्षण होता है। शुक्र की वृद्धि होने पर-शुक्राश्मरी नामक पथरी रोग तथा शुक्र की अत्यन्त प्रवृत्ति (स्राव) होना ये सब लक्षण होते हैं। मल की वृद्धि होने पर-आटोप (पेट में पीड़ा के साथ गुड़गुड़ शब्द होना) तथा उदर में व्यथा ये सब लक्षण होते हैं। मूत्र की वृद्धि होने पर-बारम्बार मूत्र होना, आध्मान (अफारा) तथा बस्तिस्थान में पीड़ा होना ये सब लक्षण होते हैं। स्वेद (पसीना) की वृद्धि होने पर- शरीर में दुर्गन्ध होना तथा त्वचा में खुजली होना ये सब लक्षण होते हैं। आर्त्तव (रज) की वृद्धि होने पर-आर्त्तव