भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०८० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ क्षीणधातुदोषमलानां वर्द्धनविधिमाह- तत्तत्संवर्द्धनाहारविहारातिनिषेवणात्। तत्तत्प्राप्य नरः शीघ्रं तत्तत्क्षयमपोहति ॥९३॥ ओजस्तु वर्द्धते नृणां सुस्निग्धैः स्वादुभिस्तथा। बृंह्यैरन्यैर्विशेषात्तु क्षीरमांसरसादिभिः ॥९४॥ क्षीण हुये दोष, धातु तथा मलों को बढ़ाने की विधि-दोष, धातु तथा मल इनमें से जो-जो क्षीण हुये हों उन-उन सबों की वृद्धि करने वाले आहार-विहार का अत्यन्त सेवन के द्वारा उन सबों को पुनः प्राप्त करके मनुष्य दोषादि की क्षीणता को शीघ्र दूर करता है। जिनके ओज क्षीण हो गये हों ऐसे मनुष्यों का ओज अत्यन्त स्निग्ध तथा मधुर रसयुक्त एवं अन्यान्य (वीर्यवर्धक) तथा विशेषतः दूध और मांसरस आदि पदार्थों के खाने से पुनः बढ़ने लगता है ॥९३-९४॥ अन्यच्च- दोषधातुमलक्षीणे बलक्षीणेऽपि मानवः। तत्तत्संवर्द्धनं यत्तदन्नपानं प्रकाङ्क्षति ॥९५॥ यद्यदाहारजातन्तु क्षीणः प्रार्थयते नरः। तस्य तस्य स लाभेन तत्तत्क्षयमपोहति ॥९६॥ और भी कहा है-दोष, धातु, मल तथा बल से क्षीण हुआ मनुष्य दोषादि में से जो-जो क्षीण होते हैं। उन सबों के बढ़ाने वाले जो-जो अन्न-पान (खान-पान) हैं उन्हीं सबों की इच्छा करता है और क्षीण पुरुष जिन-जिन दोषों के आहारों को पाने के लिये प्रार्थना करता है उन्हीं-उन्हीं आहारों के पाने से उन्हीं दोषादि की क्षीणता को दूर करता है ॥९५-९६॥ तत्र केन क्षीणः किं काङ्क्षतीत्याकाङ्क्षायामाह- कषायकटुतिक्तानि रूक्षशीतलघूनि च। यवमुद्गप्रियङ्गूश्च वातक्षीणोऽभिकाङ्क्षति ॥९७॥ तिलमाषकुलत्थादिपिष्टान्नविकृतिं तथा। मस्तुशुक्ताम्लतक्राणि काञ्जिकञ्च तथा दधि ॥९८॥ कट्वम्ललवणोष्णानि तीक्ष्णं क्रोधं विदाहि च। समयं देशमुष्णाञ्च पित्तक्षीणोऽभिकाङ्क्षति ॥९९॥ मधुरस्निग्धशीतानि लवणाम्लगुरूणि च। दधि क्षीरं दिवास्वप्नं कफक्षीणोऽभिकाङ्क्षति ॥१००॥ रसक्षीणो नरः काङ्क्ष यम्भोऽतिशिशिरं मुहुः। रात्रिनिद्रां हिमं चन्द्रं भोक्तुञ्च मधुरं रसम् ॥१०१॥ इक्षुं मांसरसं मन्थं मधु सर्पिर्गुदोदकम् ॥१०२॥ द्राक्षादाडिमशुक्तानि सस्नेहलवणानि च। रक्तसिद्धानि मांसानि रक्तक्षीणोऽभिकाङ्क्षति ।। वात से क्षीण हुआ मनुष्य-कषाय, कटु तथा तिक्तरस युक्त, रूक्ष, शीतल तथा लघु पदार्थ, जौ, मूँग एवं कंगुनी की इच्छा करता है। पित्त से क्षीण हुआ मनुष्य-तिल, उड़द तथा कुलथी, आदि तथा पिसे हुए अन्न के बने पदार्थ, दही की मलाई, शुक्त (कांजी विशेष), खट्टा तक्र (छाछ), कांजी, दही एवं कटु, अम्ल तथा लवण रसयुक्त, गर्म, तीक्ष्ण तथा विदाही पदार्थ, क्रोध करना, गर्म स्थान तथा गर्मी की इच्छा करता है। कफ से क्षीण हुआ मनुष्य-मधुर, लवण तथा अम्ल रसयुक्त पदार्थ एवं स्निग्ध (स्नेहयुक्त), शीतल तथा गुरु पदार्थ, दही, दूध तथा दिन में सोने की इच्छा करता है। रस से क्षीण हुआ मनुष्य-पीने के लिये बारम्बार अत्यन्त शीतल जल, रात्रि में सोना, हिम (अत्यन्त शीतल पदार्थ बर्फ आदि), चन्द्रमा और खाने के लिये मधुर रसयुक्त पदार्थ, ईख, मांसरस (सुरुवा), मन्थ (तक्रविशेष), शहद, घी तथा गुड़ मिला जल की इच्छा करता है और रक्त से क्षीण हुआ मनुष्य-दाख, अनार, शुक्त (कांजी विशेष), स्नेहयुक्त तथा लवणरसयुक्त पदार्थ एवं रक्त के साथ पकाया हुआ मांस की इच्छा करता है ॥९७-१०३॥ अन्नानि दधिसिद्धानि षाडवांश्च बहूनपि। स्थूलक्रव्यादमांसानि मांसक्षीणोऽभिकाङ्क्षति ॥१०४॥ मांस से क्षीण हुआ मनुष्य-दही के साथ पकाये हुये अन्न तथा बहुत से 'षाडव' संज्ञक पदार्थ एवं मोटे मांसभक्षी जीवों के मांस की इच्छा करता है ॥१०४॥ ❖ षाडवाः=मधुराम्लादिरससंयोगपाचिता गुडावप्रभृतयः ॥१०४॥