भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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अथ सप्तमं रोगिपरीक्षाप्रकरणम् १०८१ यहाँ 'षाडव' पद से 'षाडव' संज्ञक मधुर तथा अम्ल आदि रसों के संयोग से पकाये हुये, 'गुडाव' आदि पदार्थों का ग्रहण करना चाहिये ॥१०४॥ मेदःसिद्धानि मांसानि ग्राम्यानूपौदकानि च । सक्षाराणि विशेषेण मेदःक्षीणेऽभिकाङ्क्षति ॥१०५॥ अस्थिक्षीणस्तथा मांसं मज्जास्थिस्नेहसंयुतम् । स्वाद्वम्लसंयुतं द्रव्यं मज्जाक्षीणेऽभिकाङ्क्षति ॥१०६॥ शिखिनः कुक्कटस्याण्डं हंससारसयोस्तथा । ग्राम्यानूपौदकानाञ्च शुक्रक्षीणेऽभिकाङ्क्षति ॥१०७॥ यवान्नं यवकान्नञ्च शाकानि विविधानि च । मसूरमाषयूषञ्च मलक्षीणेऽभिकाङ्क्षति ॥१०८॥ पेयभिक्षुरसं क्षीरं सगुडं बदरोदकम् । मूत्रक्षीणेऽभिलषति त्रपुसैर्वारुकाणि च ॥१०९॥ अभ्यङ्गोद्वर्त्तने मद्यं निवातशयनासने । गुरु प्रावरणं चैव स्वेदक्षीणेऽभिकाङ्क्षति ॥११०॥ कट्वम्ललवणोष्णानि विदाहीनि गुरूणि च । फलशाकानि पानानि स्त्री काङ्क्षत्यार्त्तवक्षये॑ ॥१११॥ सुराशाल्यन्नमांसानि गोक्षीरं शर्करां तथा । आसवं दधि हृद्यानि स्तन्यक्षीणाऽभिवाञ्छति ॥११२॥ मृगाजाविवराहाणां गर्भान्वाञ्छति संस्कृतान् । वसाशूल्यप्रकारादीन्भोक्तुं गर्भपरिक्षये ॥११३॥ भेद से क्षीण हुआ मनुष्य-मेद के साथ पकाये हुये मांस तथा ग्राम और आनूप प्रदेश में रहने वाले एवं जलचर जीवों का मांस और विशेषतः क्षारयुक्त मांस की इच्छा करता है। अस्थि से क्षीण हुआ मनुष्य-मज्जा, अस्थि तथा स्नेह से युक्त मांस खाने की इच्छा करता है। मज्जा से क्षीण हुआ मनुष्य-मधुर तथा अम्लरसयुक्त पदार्थों की इच्छा करता है। शुक्र से क्षीण हुआ मनुष्य-मोर, मुर्गा, हंस, सारस एवं ग्राम, आनूप प्रदेश तथा जल में रहने वाले पक्षी के अण्डों की इच्छा करता है। मल से क्षीण हुआ मनुष्य-जौ, जई (छूद्रयव), अनेक प्रकार के शाक एवं मसूर तथा उड़द के जूस की इच्छा करता है। मूत्र से क्षीण हुआ मनुष्य-पेय (पीने योग्य) पदार्थ, ईख का रस, दूध, गुड़ के सहित बेर का जल, खीरा और ककड़ी की इच्छा करता है। स्वेद से क्षीण हुआ मनुष्य-मालिश करना, उबटन लगवाना, मद्य, वायुरहित प्रदेश में सोना-बैठना एवं मोटे भारी वस्त्र (रजाई आदि) ओढ़ने की इच्छा करता है। आर्तव (रज) से क्षीण हुई स्त्री-कटु, अम्ल तथा लवण रस युक्त पदार्थ फलों (लौकी, कोहड़ा आदि) का शाक तथा पान (शर्बत) की इच्छा करती है। स्तनों में दूध से क्षीण हुई स्त्री-मदिरा, शालि (अगहनी) धान्य का चावल, मांस, गौ का दूध, शक्कर, आसव, दही तथा हृदय के लिये हितकारक पदार्थ की इच्छा करती है और गर्भ से क्षीण हुई स्त्री- हरिण, बकरी, भेड़ तथा सूअर के गर्भो (गर्भस्थित बच्चों) को सविधि पका कर खाने की इच्छा करती है एवं वसा तथा मांस के अनेक प्रकार से बने हुए कबाव आदि पदार्थों को खाने की इच्छा करती है ॥१०५-११३॥ अथ सुश्रुतोक्तबललक्षणमाह- रसादिशुक्रपर्य्यन्तं धातुपुष्टिनिमित्तकम् । चेष्टासु पाटवं यत्तु बलं तदभिधीयते ॥११४॥ सुश्रुतोक्त बल लक्षण-रस से लेकर शुक्र पर्यन्त जो ७ धातुयें हैं उन सबों की पुष्टता के कारण उत्पन्न हुई जो चेष्टा करने में शरीर का सामर्थ्य है उसी को 'बल' कहते हैं ॥११४॥ अथ बलक्षयस्य निदानमाह- अभिघाताद्भयात्क्रोधाच्चिन्तया च परिश्रमात् । धातूनां संक्षयाच्छोकाद् बलं संक्षीयते नृणाम् ॥११५॥ बल का क्षय होने में कारण-अभिघात (चोट), भय, क्रोध, चिन्ता, परिश्रम, रस-रक्तादि ७ धातुओं का क्षय तथा शोक इन सबों के होने से मनुष्यों का बल क्षीण हो जाता है ॥११५॥ अथ बलक्षयस्य लक्षणमाह- गौरवं स्तब्धता गात्रे मुखम्लानिर्विवर्णता । तन्द्रा निद्रा वातशोथो बलव्यापत्तिलक्षणम् ॥११६॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA