भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०८२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे बलक्षय के लक्षण—शरीर में गुरुता तथा स्तब्धता (जकड़ाहट) का होना, मुख की मलिनता, शरीर की विवर्णता (वर्ण का बिगड़ जाना), तन्द्रा, निद्रा तथा वातसम्बन्धी शोथ ये सब लक्षण बलक्षय होने पर प्रकट होते हैं ॥११६॥ अथ बलवृद्धेर्निदानमाह— दोषसाम्बकरं यत्तु वह्निसाम्यकरं च यत्। धातुपुष्टिकं द्रव्यं बलं तदभिवर्द्धयेत् ॥११७॥ बलवृद्धि के कारण—जो पदार्थ वातादि दोषों को तथा जठराग्नि को समभाव में रखने वाले हैं, एवं धातुओं को पुष्ट करने वाले हैं वे सब बल के बढ़ाने वाले होते हैं ॥११७॥ अथ बलाबललक्षणमाह— कृशोऽपि बलवान्कश्चित् स्थूलोऽत्यल्पबलो यतः। तस्माच्चेष्टापटुत्वेन बलवन्तं विदुर्बुधाः ॥ इति श्रीमिश्रलटकनतनय-श्रीमन्मिश्रभावविरचिते श्रीभावप्रकाशे पूर्वखण्डे परिभाषादिप्रकरणे सप्तमं रोगिपरीक्षाप्रकरणं समाप्तम् ॥७॥ बलवान् तथा निर्बल के प्रधान लक्षण—कोई मनुष्य कृश शरीर वाला होकर भी बलवान् है और कोई स्थूल शरीर वाला होकर भी स्वल्प बलवाला दिखाई पड़ता है। अतः विद्वानों ने यह निश्चय किया कि—सबल तथा निर्बल होने में शरीर की स्थूलता तथा कृशता कारण नहीं है बल्कि चेष्टा (शारीरिक कार्य) करने में सामर्थ्य होने से मनुष्य को सबल और न होने से निर्बल समझना चाहिये ॥११८॥ इति श्रीमन्मध्वसम्प्रदायाचार्य-गोस्वामिश्रीदामोदरशास्त्रिणामन्तेवासिना मिश्रोपाह्वश्रीब्रह्मशङ्करशर्मणा विरचितायां 'विद्योतिनी' हिन्दीटीकायां पूर्वखण्डे परिभाषादिप्रकरणे सप्तमं रोगिपरीक्षाप्रकरणं समाप्तम् ॥७॥ इति पूर्वखण्डं समाप्तम् CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA