भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट- १ अस्थियों के विषय में-संक्षिप्त विवरण अस्थियों के विषय में प्राचीन तथा आधुनिक गणना में कुछ मतभेद दिखाई देता है। इसका एक कारण यह है कि प्राचीन महर्षियों ने दाँत तथा तरुणास्थियों को भी अस्थिरूप में गिना है और आजकल के शरीररचना-विज्ञान (Anatomy) के अनुसार उनका परिगणन अस्थियों से पृथक् होता है। तथा कुछ ऐसी भी अस्थियाँ हैं जो बाल्यावस्था में पृथक्-पृथक् रहती हैं पर अवस्था के अधिक होने पर जुड़ जाती हैं। और अस्थियों में स्थालक (अस्थि का वह प्रदेश जहाँ वह दूसरी अस्थिसे मिलती हैं। (Articular facit), अर्बुद (Tubercle अस्थि का वह प्रदेश जो अन्य भाग की अपेक्षा उभरा हुआ हो) आदि के पृथक् परिगणन से भी उनकी संख्या में भेद हो सकता है। और कई स्थानों पर सूक्तियों को भी अस्थिरूप में परिगणन किया है। जैसे चरक पर्श्वेस्थियों की संख्या ७२ मानते हैं। २४ पर्शुकायें, २४ उनके स्थालक तथा २४ अर्बुद कुल ७२ होते हैं। विषय में प्रथम सुश्रुत का मत लिखा जा रहा है जो कि यह है— त्रीणि सषष्टीन्यस्थिशतानि वेदवादिनो भाषन्ते। शल्यतन्त्रे तु त्रीण्येव शतानि। तेषां सविंशमस्थिशतं शाखासु, सप्तदशोत्तरं शतं श्रोणिपार्श्वपृष्ठोरःसु, ग्रीवायां प्रत्यूर्ध्वंत्रिषष्टिः, एवमस्थ्नां त्रीणि शतानि पूर्यन्ते। अर्थात्—अग्निवेश प्रभृति शास्त्रवादी ३६० अस्थियाँ शरीर में मानते हैं किन्तु शल्यतन्त्र में ३०० अस्थियों का ही वर्णन है। उसमें शाखाओं में १२० अस्थियाँ, श्रोणि, पार्श्व, पीठ और वक्षःस्थल में मिलाकर ११७ अस्थियाँ हैं और ग्रीवा तथा इससे ऊपर ६३ अस्थियाँ हैं। इस तरह अस्थियों की संख्या (१२०+११७+६३=३००) पूरी होती हैं। 'एकैकस्यां पादाङ्गुल्यां त्रीणि त्रीणि तानि पञ्चदश, तलकूर्चगुल्फसंश्रितानि दश, पाष्ण्यामेकं जङ्घायां द्वे, जानुन्येकम्, एकमूर्वाविति त्रिंशदेवमेकस्मिन्सक्थि भवन्ति। एतेनेतरसक्थिबाहू च व्याख्यातौ' ।। पैर की एक अंगुलियों में तीन-तीन अस्थियाँ इस तरह अंगुलियों में १५ अस्थियाँ हुई। तल, कूर्च, गुल्फ की १० अस्थियाँ, पाष्णि में एक तथा जंघा में दो, जानु में एक तथा ऊरु में एक, इस प्रकार एक टाँग में ३० अस्थियाँ तथा दूसरी टाँग और दोनों बाहु में मिलाकर कुल १२० अस्थियाँ हुई। 'श्रोण्यां पञ्च तेषां गुदभगनितम्बेषु चत्वारि, त्रिकसंश्रितमेकम्, पार्श्वे षट्त्रिंशदेकस्मिन्। द्वितीयेऽप्येवम्, पृष्ठेत्रिंशदष्टावुरसि, द्वे अंसफलके' । श्रोणि प्रान्त में पाँच अस्थियाँ होती हैं इनमें गुदा, भग तथा दोनों नितम्बों में मिलकर चार तथा त्रिक में एक, पार्श्व में ३६ इतना ही दूसरे पार्श्व में, छाती में आठ तथा अंसफलक (Scapula) में दो अस्थियाँ होती हैं। 'ग्रीवायां, नव, कण्ठनाड्यां चत्वारि, द्वे हन्वोः, दन्ता द्वात्रिंशत्, नासायां, त्रीणि, एकं तालुनि, गण्डकर्णशङ्खेष्वेकेकं, षट् शिरसीति । ग्रीवा में ९, कण्ठनाड़ी में ४, हनु में दो अस्थियाँ, दाँत ३२, नाक में ३, तालु में एक, गण्ड, कर्ण तथा शंख इनमें एक-एक (इस तरह दोनों तरफ के कुल मिला कर ६) तथा ६ अस्थियाँ सिर में होती हैं। अस्थियों का जो आधुनिक परिगणन किया जाता है उसमें दाँत तथा तरुणास्थियों का परिगणन नहीं होता है, किन्तु ४० से ५० वर्ष पूर्व परिगणन किया जाता था, इनकी संख्या निम्नलिखित प्रकार से होती है। सिर या करोटि में अस्थियाँ एक मंजूषा (सन्दूक) की तरह रचना बनाती हैं जिसके भीतर शारीरिक साम्राज्य का अधिपति मस्तिष्क (Brain) सुरक्षित रहता है।