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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 1137, कुल 1167 में से

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१०८६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे दाँत रुचकास्थियों से निर्मित हैं। नासिका, कर्ण, ग्रीवा तथा अक्षिकोष में तरुणास्थियाँ हैं। पार्श्व, पृष्ठ तथा वक्ष में वलयास्थियाँ हैं। इनके अतिरिक्त अन्य (हाथ-पैर आदि) भागों में नलक (Long bones) हैं। भोज ने भी लिखा है 'हस्तपादाङ्गुलितले कूर्चेषु मणिबन्धयोः । बाहुजङ्घाद्वये चापि जानीयान्नलकानि तु' ।। हाथ-पैर की अंगुलियों और पादतल तथा पाणितल, कूर्च, मणिबन्ध तथा जंघाओं में नलक अस्थियाँ होती हैं। अस्थियों के कार्य अस्थियाँ शरीर के सुदृढ़ होने में कारणभूत हैं। इनके कारण ही शरीर अपनी एक आकृति विशेष में स्थित रहता है। अन्यथा दबाव आदि के कारण इनका भी आकार परिवर्तित होना संभव था। तथा शरीर के बोझ को सँभालने के लिये भी किसी दृढ़ वस्तु की आवश्यकता थी। इसके अतिरिक्त हाथ, पैर आदि अंगों में जो गति होती है उसका कारण मांसपेशियाँ हैं तथा ये मांसपेशियाँ अस्थियों पर ही लगी हुई हैं। कोमल अङ्गों की रक्षा करना भी अस्थियों का एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। वक्ष के भीतर के हृदय तथा फुफ्फुस और उदरगुहा के यकृत् तथा प्लीहा प्रभृति कोमल अंग पसलियों द्वारा पूर्णतः सुरक्षित हैं। मस्तिष्क जैसे सुकोमल अंग के लिये प्रकृति के सिर की अस्थियों की जो सुन्दर मञ्जूषा (सन्दूक) बनाई है वैसा कौन कारीगर बना सकता है ? ये ही सब अस्थियों के साधारणतः कार्य हैं। कार्य के विषय में सुश्रुत लिखते हैं— 'अभ्यन्तरगतैः सारैर्यथा तिष्ठन्ति भूरुहाः । अस्थिसारैस्तथा देहा ध्रियन्ते देहिनां ध्रुवम् ।। तस्माच्चिरविनष्टे, त्वङ्मांसेपुशरीरिणाम् । अस्थीनि न विनश्यन्ति साराण्येतानि देहिनाम् ।। मांसान्यत्र निबद्धानि सिराभिः स्नायुभिस्तथा । अस्थीन्यालम्बनं कृत्वा न शीर्यन्ते पतन्ति वा ।। जिस प्रकार अन्तःस्थित सार के द्वारा वृक्ष स्थिर रहते हैं, उसी भाँति यह मानव शरीर अस्थियों द्वारा धारण किया जाता है। ये अस्थियाँ शरीर की सारभूत हैं। ये कठिन होने के कारण त्वचा तथा मांसादि के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होतीं। इन्हीं अस्थियों के साथ मांसपेशियाँ सिरा तथा स्नायुओं के द्वारा बँधी हुई हैं। अस्थि पर आश्रित होने ही के कारण वे कभी नष्ट तथा स्थान से भ्रष्ट नहीं होती हैं। अस्थियों को भी सजीव अङ्ग होने के कारण पोषण की आवश्यकता होती है। उनके भीतर सूक्ष्म धमनियों द्वारा रक्तप्रवाह होता रहता है। अस्थियाँ वास्तव में घन तथा सुषिर पर्तों द्वारा बनी हुई हैं। बाहर की तरफ घन भाग तथा भीतर की तरफ अस्थि का कुछ सुषिर भाग होता है। अस्थि के बीच में अस्थिमज्जा पाई जाती है। बड़ी अस्थियों की लाल मज्जा में रक्त के लाल कणों की उत्पत्ति होती है। मांस धातु शरीर में ७ धातुयें ऋषियों ने मानी हैं यथा— रसासृङ्मांसमेदोऽस्थिमज्जशुक्राणि धातवः । रक्त, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा तथा शुक्र ये सात धातुयें हैं। जो आहार प्रतिदिन किया जाता है उसका प्रथम

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