भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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परिशिष्ट १ १०११ २. गर्भाशय योनि के ऊपरी भाग से इसका प्रारम्भ होता है। इसके सामने की ओर मूत्राशय (Bladder) तथा पीछे की ओर मलाशय होता है। यह बड़े अमरूद के आकार का किन्तु सामने तथा पीछे की ओर चपटा होता है। सुश्रुत ने रीहित- मत्स्य के मुख से गर्भाशय की उपमा दी है। यथा रोहितमत्स्यस्य मुखं भवति रूपतः। तत्सस्थाना तथारूपां गर्भशय्यां विदुर्बुधाः। गर्भाशय में ही गर्भ का पोषण होता है, यहीं गर्भ अपनी पूर्ण वृद्धि तक पहुँचता है तथा प्रसव के समय बाहर निकलता है। गर्भाशय के तीन भाग हैं— ऊपर का भाग मुण्ड १. (Lundus), मध्य का भाग गात्र (Body) तथा इससे नीचे का भाग ग्रीवा (Cervix) है। गर्भाशय की श्लैष्मिक कला (Endometrium) में नलिकाकार ग्रन्थियाँ (Tubular glands) होती हैं जिनसे क्षारीय स्राव निकलता रहता है। गर्भाशय के दोनों ओर दो विस्तृत स्नायु (Broad ligaments) होते हैं तथा पीछे की तरफ दो बन्धन होते हैं उन्हें गर्भत्रिक स्नायु (Uterosa cialligaments) कहते हैं, वे पीछे की तरफ त्रिकास्थि के उभरे हुये भाग (Promontry) पर लगे हुये हैं। गोलबन्धन (Roundligaments) ये भी संख्या में दो होते हैं। ये इतने ढीले होते हैं कि यह कहना कि गर्भाशय को उसके स्थान से भ्रंश होने से बचाते हैं अधिक उचित नहीं प्रतीत होता। हाँ गर्भाशय-भ्रंश को ठीक करने में अवश्य सहायक होते हैं। साधारण स्थिति में गर्भाशय कुछ मूत्राशय की तरफ को झुका रहता है तथा जिस स्थान पर गात्र ग्रीवा से मिलता है वहाँ पर गर्भाशय अपने ही ऊपर कुछ मुड़ा होता है इस प्रकार गर्भाशय (Slightly anteverted and antifixed) रहता है। उदर की परिविस्तृत कला (Feritoneum) मूत्राशय के ऊपर से होकर गर्भाशय की पूर्व भित्ति पर पहुँचती है। इस प्रकार मूत्राशय की पश्चिम भित्ति (Posterior wall) तथा गर्भाशय की पूर्व भित्ति (anterior wall) के बीच एक खात बनता है इसका नाम (Uterovasical ponch) है। इसके बाद परिविस्तृत कला गर्भाशय के पश्चात् भित्ति से होकर फिर मलाशय पर चली जाती है और मलाशय से आगे आन्त्रनिबन्धन—कला (mesentry) से मिल जाती है। इस प्रकार मंलाशय तथा मूत्राशय के बीच एक खात उत्पन्न होता है उसे (Rectal uterin ponch or Ponch of Douglas) कहते हैं। गर्भाशय की आकृति तथा तौल तथा इसके बन्धन, उदर का दाब (intra abdominal pressure) तथा वस्ति गुहा की नीचे की भित्ति ये वे सब मिलकर गर्भाशय को अपनी स्थिति में रखते हैं। इनके विकार से गर्भाशय की स्थान से विच्युति (displacement) होती है। ३. डिम्ब प्रणाली (Fallopian tube) ये गर्भाशय के पार्श्विक कोणों से प्रारम्भ होती हैं। दोनों तरफ दो डिम्बप्रणालियाँ होती हैं तथा विस्तृत स्नायु (Broad ligaments) के ऊपरी भाग से आच्छादित रहती हैं। इनकी लम्बाई ४ इञ्च है। इस नलिका के चार भाग किये जाते हैं। १. प्रथम—गर्भाशय के अन्दर रहने वाला भाग २. दूसरा—इसके आगे का संकीर्ण भाग

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