भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 1141, कुल 1167 में से

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१०९० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे २. बृहद् भगोष्ठ (Labia majora)—ये दो होते हैं। १. वाम बृहद् भगोष्ठ तथा दक्षिण बृहद् भगोष्ठ। ये योनिद्वार (Vaginal orifice) के दोनों ओर होते हैं। इनके नीचे वसा (fat) होती है। युवावस्था में इन पर लोम उगते हैं। बाल्यावस्था में ये दोनों बृहद्भगोष्ठ परस्पर मिले रहते हैं। मैथुन वा प्रसव होने के बाद ये दोनों पृथक् हो जाते हैं। ३. क्षुद्रभगोष्ठ—ये भी संख्या में दो होते हैं और बृहद्भगोष्ठो (Labia majora) के भीतर तथा योनिद्वारों के आस पास होते हैं। इनमें बसा कम होती है अतः ये पतले होते हैं। ये जिस समय भगांकुर के पास पहुँचते हैं उस समय दो भागों में विभाजित हो जाते हैं। ४. भगांकुर (Clitoris)—ऊपर की तरफ, जहाँ पर दोनों बृहद्भगोष्ठ मिलते हैं, उसके प्रायः आधा इंच के नीचे होता है। यह लचकीला होता है। मैथुन के समय यह उत्तेजित हो जाता है और शिश्न की भाँति स्पर्श में कठिन प्रतीत होता है। ५. योनिद्वार (Vaginal orifice)—यह बृहद् तथा क्षुद्र भगोष्ठों के मध्य में छिपा हुआ होता है। यदि अंगुलियों द्वारा भगोष्ठों को पृथक् करें तो भग के निचले भाग में योनिद्वार दिखाई देगा। ६. मूत्रद्वार (Vaginal orifice) यह योनिद्वार (Vrethral orifice) के आधे इञ्च ऊपर होता है। ७. योनिच्छद (Hyman)—यह एक झिल्ली (Menbrane) है जो कि योनिद्वार (Vaginal orifice) को बन्द किये रहती है। इसके बीच में छोटा-सा छिद्र होता है जिससे कि युवावस्था में आर्तव निकला करता है। प्रथम- सम्भोग में यह झिल्ली फट जाती है। कभी-कभी आघात के कारण भी योनिच्छद फट जाता है। योनिच्छद की उपस्थिति स्त्री-सतीत्व की अक्षुण्णता को प्रमाणिक करती है। कभी-कभी मैथुन के समय योनिच्छद नहीं फटता इस अवस्था में पशुवत् अधिक बल प्रयोग न करके शस्त्रकर्म (Peration) द्वारा उसे कटवा देना चाहिये। आभ्यन्तरिक जननेन्द्रियाँ—इसमें निम्नलिखित अङ्ग आते हैं— १. योनि (Vagina) ३. डिम्बप्रणाली (Fallopian tube) २. गर्भाशय (Uterus) ४. डिम्बप्रस्थि (Ovary) इनके संक्षिप्त विवरण नीचे दिये जा रहे हैं— १. योनि यह एक नलिका है जो भग से गर्भाशय के बीच में रहती है। इसकी अग्रिम भित्ति (anterior wall) २ से ३ इंच्छ लम्बी तथा पश्चिम भित्ति ३ से ४ इञ्च लम्बी होती है। इसके सामने की ओर मूत्रप्रणाली (Urethra) और मूत्राशय (Bladder) तथा पीछे की ओर मलाशय (Rectum) रहता है। इसकी पूर्व तथा पश्चिम भित्तियाँ परस्पर मिली रहती हैं। यह नलिका आवश्यकता पड़ने पर (जैसे प्रसव के समय) बढ़ तथा फैल सकती है। गर्भाशय-ग्रीवा (Cervix) का कुछ भाग योनि में आता है। इस प्रकार योनि में चार कोण (Fornix) बन जाते हैं। जो ग्रीवा के सामने होता है वह अग्रकोण (auterio fornix), जो पीछे होता है वह पश्चात् कोण (Posterior fornix) तथा जो पार्श्व में २ कोण बनते हैं उन्हें (Lateralforices) कहते हैं। पश्चात् कोण (Posterior fornix) सबसे अधिक गहरा है। योनि से एक विशिष्ट स्राव निकला करता है इसकी प्रतिक्रिया आम्लिक होती है। योनि में उपस्थित एक विशेष प्रकार के कीटाणु (डोर्डरलीन के जीवाणु) तक्राम्ल (Lactic acid) पैदा करते हैं जो कि प्रायः अन्य जीवाणुओं के लिये घातक होता है। इस प्रकार बाहर से किसी प्रकार विकार उत्पन्न करने वाले जीवाणु वहाँ पहुँच जायें तो भी वे इस तक्राम्ल (Lactic acid) के कारण नष्ट कर दिये जाते हैं।

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