भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०९२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ३. तीसरा—इसके आगे का अपेक्षा कृत विस्तृत भाग ४. चौथा—इस नलिका के झालरदार सिरे का भाग कहा जाता है। दोनों नलिकाओं (Infundibul pelvic fragments) के द्वारा वस्तिगुहा के पार्श्विक भाग से सम्बन्धित हैं। ४. डिम्बग्रन्थि (Ovary) ये बदाम के आकार की दो ग्रन्थि हैं जो कि विस्तृत स्नायु के पश्चिम भित्ति पर लगी हुई हैं। ये १ १/२ डेढ़ इञ्च लम्बी तथा ३/४ पौन इञ्च चौड़ी तथा १/२ आधी इञ्च मोटी होती हैं। प्रत्येक डिम्बग्रन्थि में अनेक डिम्बकोष (Craffian follicle) होते हैं तथा इन डिम्बकोषों में एक-एक डिम्ब (Ovum) होता है। जिस समय डिम्ब परिपक्व (Ripe) होता है उस समय डिम्बकोष (Graffian follicle) फट जाता है और (Ovum) डिम्बप्रणाली (Fallopian tube) में प्रविष्ट होता है। इस प्रकार डिम्बप्रणाली ही में शुक्र से उसका सम्पर्क होता है तथा वहाँ भ्रूण की वृद्धि ६ दिन तक होती है। इसके उपरान्त भ्रूण गर्भाशय में प्रवेश करता है तथा नवम मास पर्यन्त वहीं बढ़ता रहता है। डिम्बकोष के फटने पर रिक्त डिम्बकोष में रक्त एकत्र होता है जो कुछ समय में एक पीतवर्ण के पिण्ड में परिवर्तित हो जाता है। इसे (Corpus Iuteum) कहते हैं। गर्भाधान हो जाने पर इसमें कुछ और परिवर्तन होते हैं तथा यह बढ़ता है। किन्तु गर्भाधान न हुआ तो यह मुरझा कर श्वेत वर्ण का हो जाता है। डिम्ब—(Ovum) यह एक गोल तन्तु (Cell) है इसका व्यास १/१२० इञ्च है। नारियों के स्तन का विवरण स्तन—इनका जननेन्द्रियों में परिगणन नहीं है किन्तु जननेन्द्रियों से इनका सम्बन्ध अवश्य है। स्तन के स्पर्श से वहाँ की नाड़ी में किसी प्रकार उत्तेजना से गर्भाशय में संकोच प्रारम्भ हो जाता है तथा स्त्री एक विशेष आनन्द का अनुभव करती है। उत्तेजना की अवस्था में स्तन दृढ़ तथा चूचुक कड़े हो जाते हैं। ये स्तन वक्ष में ऊपर की ओर द्वितीय पर्शुका से लेकर नीचे छठीं पर्शुका तक होते हैं। तथा सामने से पीछे की ओर वक्षिका (Slesunm) के किनारे से लेकर मध्यकक्षीयरेखा (Midaxillary line) तक होते हैं। ये अर्द्धवृत्ताकार होते हैं, इनके ऊपरी भाग में एक वर्तुल उभार होता है जिसे चूचुक (Nipple) कहते हैं। इसमें १२ से २० छिद्र होते हैं जिनसे कि दुग्ध-स्रोतों द्वारा दुग्ध निकलता है। चूचुक के चारों ओर एक गहरे रङ्ग का मण्डल होता है इसे स्तनमण्डल (Areola) कहते हैं। स्तन के भीतर अनेक दुग्धग्रन्थियाँ (Lactals) होती हैं तथा वसा भी उपस्थित रहती है। ये दुग्धवाहिनियाँ रथ के चक्र की भाँति स्तन में स्थित हैं। पुरुष-जननेन्द्रियों का संक्षिप्त विवरण इसमें १. अण्ड (sorotum) । २. उपाण्ड । ३. अण्डरज्जु (Spermatic cord) । ४. शुक्राशय । ५. शिश्न ये अङ्ग होते हैं। १. अण्ड ये संख्या में दो होते हैं। यहाँ का चर्म एक प्रकार के थैले की भांति रचना बनाता है। इस प्रकार—दो थैलों में दो अण्ड रहते हैं, इनकी उत्पत्ति उदरगुहा में होती है। भ्रूण के आठवें मास के अन्त में ये उदरगुहा से निकल कर अपने निवासस्थानभूत थैले में पहुँच जाते हैं। उदरगुहा से ये अण्डकोश अण्डरज्जु (Spermatio cord) द्वारा लटकते रहते हैं। इनके ऊपर एक आवरण होता है उसे अण्डवेष्ट (Tunica vaginalis) कहते हैं। इसके स्तरों के बीच में कुछ