भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट १ १०९३ द्रव रहता है जब इस द्रव की मात्रा अधिक बढ़ जाती है तो उसे अण्डतरलातिवृद्धि (Hydrocyl) कहते हैं। इन अण्डों के तन्तुओं (सेलों) द्वारा शुक्र (Semen) का निर्माण होता है। २. उपाण्ड ये अण्डों के ऊपर चिपके हुये रहते हैं इनके निचले भाग से अण्डरज्जु प्रारम्भ होते हैं। ३. अण्डरज्जु ये रस्सी की भाँति होते हैं। उनमें एक अत्यन्त सूक्ष्म आलपीन के नोक के समान एक सूक्ष्म छिद्र होता है इसी के द्वारा शुक्र शुक्राशय को जाता है। ये उपाण्ड से प्रारम्भ होकर उदर में (Through the external abdominal ring, ingoinal canal and internal abdominal ring.) प्रवेश करते हैं, वहाँ से जाकर वे नीचे की तरफ घूम कर मलाशय तथा मूत्राशय के बीच में स्थित शुक्राशय में खुलते हैं। ४. शुक्राशय ये अत्यन्त घूमे हुये होते हैं। मलाशय तथा मूत्राशय के बीच में इनकी स्थिति होने के कारण मलाशय तथा मूत्राशय के भरे रहने पर इन पर दाब पड़ता है। इस प्रकार मूत्र तथा मल से तथोक्त आशयों के भरे होने पर स्वप्न में शुक्रमेह की सम्भावना अधिक होती है। जैसा कि नाम से ही प्रकट है। अण्डों द्वारा बना हुआ शुक्र इन्हीं में आता है। ये आगे चलकर पतली नलिका (इजीकुलेटरी डक्ट) में समाप्त होते हैं जो कि (नलिका) मूत्रमार्ग में जाकर खुलती है। ५. अष्ठीलाग्रन्थि (प्रोस्टेट) यह युवावस्था में मूत्रनलिका के प्रारम्भिक १ से १। इन्च भाग को चारों तरफ से आवृत किये रहती है। मैथुन के समय इसका स्राव भी शुक्र में मिल जाता है। ६. शिश्न यह मांसपेशियों के ३ दण्डिकाओं से निर्मित है, दो दण्डिकायें पार्श्व तथा कुछ ऊपर की ओर तथा एक दण्डिका नीचे की तरफ होती है, ऊपर के दण्डिकाओं में केशिकाओं की अत्यन्त अधिकता है तथा इनमें कोई छिद्र नहीं होता है। नीचे का दण्ड पोला होता है। इसमें एक नलिका होती है जिसके द्वारा शुक्र तथा मूत्र निकलते हैं। ऊपर की दोनों दण्डिकायें शिश्नमुण्ड के पास पहुँचने के पूर्व ही समाप्त हो जाती हैं, केवल नीचे की दण्डिका आगे चल कर छत्र की भांति विस्तृत हो जाती है इसे ही शिश्नमुण्ड कहते हैं। इसमें एक छिद्र होता है। जिसके द्वारा शुक्र तथा मूत्र बाहर निकलते हैं। ये तीनों शिश्न दण्डिकायें संयुक्त रहती हैं। इनके ऊपर त्वचाओं का आवरण रहता है। शिश्न अचैतन्यावस्था में ३ से ४ इञ्च लम्बा होता है और मृदु होता है किन्तु चैतन्यावस्था में उपरोक्त शिश्न-दण्डिका ही फूल कर मोटी हो जाती है और शिश्न अपेक्षाकृत अधिक लम्बा (६ से ९ इञ्च तक) तक कठिन हो जाता है। इसका कारण यह है कि पूर्व कही हुई दोनों शिश्न-दण्डिकाओं की रचना ऐसी है कि उसमें बहुत से कोष्ठक हैं और इन कोष्ठकों में सूक्ष्म केशिकाओं का जाल-सा बिछा हुआ है। जब किसी प्रकार उत्तेजना होती है तो ये केशिकायें रक्त से परिपूर्ण हो जाती हैं। अतः यही रक्त-परिपूर्णता शिश्न के काठिन्य में कारण है; कार्य-निवृत्ति के अनन्तर तथोक्त केशिकाओं से रक्त लौटकर पुनः स्वस्थ्हान में (समीपस्थ रक्तवाहिनी धमनियों तथा सिराओं में) पहुँच जाता है अतः शिश्न पुनः शिथिल हो जाता है। जननेन्द्रिय का विषय अत्यन्त विस्तृत है। उसका संक्षेपातिसंक्षेप में यहाँ वर्णन किया गया है। पाठक अधिक विवरण के लिये जननेन्द्रिय-सम्बन्धी पाश्चात्य विद्वानों द्वारा रचित ग्रन्थों का अध्ययन करें।