भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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१०९४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे आर्त्तव-गर्भाधान तथा बन्ध्यात्व का संक्षिप्त विवरण Menstruation is the periodicflow of blood and mucusgrom the Uterus commences at puberty (Ten Teachers.) योनि से प्रतिमास रक्तयुक्त श्लेष्मा का स्राव होता है, इसी का नाम आर्त्तव है। यह भारत में प्रायः १२ से १४ वर्ष की आयु में प्रारम्भ होता है तथा ४०-५० वर्ष की आयु में समाप्त होता है। इस अवस्था को रजोनिवृत्ति वा (Menopause) कहते हैं। यह रक्तस्राव गर्भाशय से आता है। जिस समय सर्वप्रथम आर्त्तव होता है उसे रजोदर्शन कहते हैं। आर्त्तव प्रारम्भ होने के दिन से १६ दिन पर्यन्त ऋतुकाल कहा जाता है। आर्त्तव का होना यह सूचित करता है कि कन्या अब युवती हो गई तथा गर्भाधान के सर्वथा योग्य हो गई है। इसके प्रारम्भ होने का समय १२ से १९ वर्ष तक हो सकता है। आर्त्तव पर निम्नलिखित बातों का प्रभाव पड़ता है जलवायु—शीत प्रधान देशों की अपेक्षा उष्ण प्रधान देशों में रजोदर्शन शीघ्र होता है। जाति—भिन्न-भिन्न जातियों के रजोदर्शन के समय में कुछ भिन्नता होती है। सामाजिक आहार-विहार—पौष्टिक तथा उत्तेजना उत्पन्न करने वाले आहार, परिश्रम न करना, उपन्यास आदि अधिक पढ़ना तथा विलासितापूर्ण जीवन ये सब कारण आर्त्तव को शीघ्र पैदा करते हैं। आर्त्तव प्रारम्भ होने के समय स्त्री में शारीरिक तथा मानसिक परिवर्तन होते हैं। स्तनों की वृद्धि होती है। स्त्री इस समय अपूर्व लावण्य से सुशोभित हो जाती है, उसका वर्ण पहले की अपेक्षा अधिक निखर आता है तथा उसे जननेन्द्रिय-सम्बन्धी उत्तेजनाओं का अनुभव होने लगता है। आर्त्तव के लिये दो शब्दों का प्रयोग होता है। आर्त्तवकालान्तर (Menstrula type)—दो आर्त्तवों के अन्तर का समय आर्त्तव काल कहा जाता है। साधारणतः यह २८ दिन का होता है। किसी-किसी स्त्रियों में यह २१ से ३० दिन के अन्तर पर भी होता है किन्तु यदि नियत समय पर आर्त्तवस्राव होता रहे तो उसे साधारण समझना चाहिये किन्तु यदि आर्त्तव होने के समय में अनियमितता (Irregularity) हो तो यह किसी विकृति का निदर्शक है। आर्त्तवस्रवकाल —यह प्रायः ४ से ५ दिन तक होता रहता है। कभी-कभी यह कुछ घण्टे से ८-१० दिन तक भी जारी रहता है। आर्त्तव के विषय में सुश्रुत ने लिखा है— तद्वर्षाद् द्वादशादूर्ध्वं वर्त्तमानमसृक् पुनः। जरापक्वशरीराणां याति पञ्चाशतः क्षयम् ।। पूर्व में कहा जा चुका है कि आर्त्तव के प्रथम दिन से १६ दिन पर्यन्त ऋतुकाल होता है यही ऋतुकाल गर्भाधान के योग्य कहा जाता है। जैसा कि सुश्रुत लिखते हैं 'आर्त्तवस्रावदिवसाद्ऋतुः षोडश रात्रयः। गर्भग्रहणयोग्यस्तु स एव समयः स्मृतः।। किन्तु कभी-कभी आर्त्तवस्राव के बिना भी ऋतुकाल होता है जैसे कि दुग्धकाल में, किन्तु गर्भाधान उस समय भी हो सकता है। बिना आर्त्तव के ऋतुकाल का ज्ञान करने के लिये लक्षण दिये जा रहे हैं— CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA