भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट १ १०९५ 'पीनप्रसन्नवदनां प्रक्लिन्नात्ममुखद्विजाम् । नरकामां प्रियकथां त्रस्तकुक्ष्यक्षिमूर्द्धजाम् ।। स्फुरद्भुजकुचश्रोणिनाभ्यूरुजघनस्फिचम् । हर्षोत्सुक्यपराञ्चापि पिद्यादृत्तुमतीमपि ।। इस प्रकार आर्त्तवचक्र प्रवर्त्तित होता रहता है । इस चक्र की चार अवस्थायें होती हैं— प्रथम अवस्था (Premenstrual congestion) यह आर्त्तव निकलने के चार या पाँच दिन पूर्व प्रारम्भ होती है, गर्भाशय की कला में रक्ताधिक्य होता है अतः वह पहले से मोटी और मुलायम हो जाती है । द्वितीय अवस्था—यह चार-पाँच दिन तक रहती है । इस अवस्था में केशिकाओं में और भी अधिक रक्त आता है तथा केशिकाओं से निकल कर गर्भाशय की श्लैष्मिक कला के नीचे इकट्ठा होता है । इसके उपरान्त श्लैष्मिक कला फटती है तथा उसके नीचे जो रक्त इकट्ठा हो रहा था वह अब गर्भाशय में जाता है तथा योनि से बाहर निकलने लगता है । इस रक्त में साधारण रक्त से कुछ भिन्नता होती है । इसमें श्लेष्मा मिला रहता है तथा खटिक लवणों की साधारण रक्त की अपेक्षा अधिकता होती है किन्तु रक्त को जमाने वाले विशेष द्रव्य फाइब्रिन (Fibrin) के अभाव के कारण रक्त जमता नहीं । साधारण रक्त ज्योंही बाह्य धातु के सम्पर्क में आता है त्योंही जम जाता है । उसके जमाने में फाइब्रिन का मुख्य भाग रहता है । आर्त्तव के रक्त में एक विशेष प्रकार का गन्ध होता है तथा इसकी प्रतिक्रिया क्षारीय होती है । तृतीय अवस्था (Postmenstrual evolution)—यह भी सात दिन तक रहती है । इसमें गर्भाशय की केशिकायें, श्लैष्मिककला आदि अपनी पूर्व अवस्था को प्राप्त होती हैं । चतुर्थ अवस्था (Interval)—यह आर्त्तव की तृतीया अवस्था है इसको गर्भाशय के विश्राम की अवस्था कह सकते हैं । जिन चार अवस्थाओं का वर्णन ऊपर किया गया है, वे परिवर्त्तन गर्भाशय (Uterus) के गात्र (Body) में होते हैं । इसके अतिरिक्त गर्भाशय, ग्रीवा (Cervix) तथा डिम्ब-प्रणाली (Fallopian tube) में रक्ताधिक्य होता है । गर्भाशय, ग्रीवा, योनि (Vagina) तथा भग (Vulba) से एक प्रकार का रस निकलता है, इसे (Meustrual molimina) कहते हैं । आर्त्तव जब प्रारम्भ होने को होता है उस समय स्त्री आलस्य, अरुचि एवं कटि तथा उदर के निचले भाग (पेड़ू) में पीड़ा, भारीपन तथा स्वभाव में कुछ चिड़चिड़ापन इनका अनुभव करती है । आर्त्तव और डिम्ब परिपक्व होना— आर्त्तव होने के ५-१४ दिन के अनन्तर डिम्ब (Ovum) डिम्बग्रन्थि (Ovary) से निकलता है, वहाँ से डिम्बप्रणाली से होता हुआ गर्भाशय की ओर चल पड़ता है । शुक्रकीट इस डिम्ब का डिम्बप्रणाली में ही पहुँच कर गर्भित (Fertilize) करता है । अतः गर्भाधान के ख्याल से आर्त्तव के बाद के १०-१५ दिन उपयुक्त हैं । इतने समय में यदि डिम्ब से शुक्रकीट का संसर्ग नहीं होता तो डिम्ब मृत हो जाता है । डिम्बग्रन्थि Overy तथा डिम्ब का परिपक्व होना (Ovulation)— गर्भाशय के दोनों ओर दो ग्रन्थियाँ बादाम के आकार की होती है । इसके भीतर अनेक डिम्ब होते हैं । इस ग्रन्थि का नाम Overy है । युवावस्था प्रारम्भ होने पर ये डिम्ब बढ़ते हैं, इनके पूर्ण वृद्धि प्राप्त करने पर डिम्बप्रणाली का इनके निकटं का प्रदेश फट जाता है और वहाँ से डिम्ब बाहर निकलता है । डिम्ब के पक कर बाहर निकलने की इस क्रिया