भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ सप्तमं रोगिपरीक्षाप्रकरणम् १०७३ कफ के प्रकुपित होने के कारण—गुरु पदार्थ, लवण, मधुर तथा अम्ल रस युक्त पदार्थ, स्निग्धपदार्थ, उड़द, तिल, द्रवपदार्थ, दही, दिन में सोना, शीत (सर्दी) और घी का प्रचुर भोजन (पाठान्तर में निश्चेष्टता) करने से तथा दिन और रात्रि का पहला भाग (६-१० बजे तक), भोजन करने के उपरान्त का समय एवं वसन्त ऋतु में कफ का प्रकोप होता है ॥४७॥ ❖ प्रथमदिवसभागे त्रिधा विभक्तस्य दिवसस्य प्रथमभागे, एवं रात्रेश्चाद्यभागे ।।४७।। यहाँ 'दिन तथा रात्रि का पहला भाग' कहने से 'दिन तथा रात्रि के तीन भाग करके उनमें से दोनों का पहला भाग' समझना चाहिये ॥४७॥ अथैको रोगोऽन्यरोगनिमित्तीत्याह— ननु सर्वेषां रोगाणां निदानं दुष्टा दोषा एव किमन्यदप्यस्तीति संशये चरक आह— निदानार्थकरो रोगो रोगस्याप्युपलक्ष्यते ।।४८।। 'दुष्ट हुये वातादि दोष ही संपूर्ण रोगों के उत्पन्न होने के कारण हैं ? अथवा उनसे अन्य भी कोई कारण है ? इस संशय के उत्तर में चरक ने कहा है कि—रोग के उत्पन्न करने में निदान (कारण) का कार्य करने वाला वातादि दोषों की भाँति रोग भी देखा जाता है ॥४८॥ ❖ रोगस्य निदानार्थकरो रोगोऽप्युपलक्ष्यते=दृश्यते । अत्र दृष्टान्तमाह— तद्यथा ज्वरसन्तापाद्रक्तपित्तमुदीर्यते । रक्तपित्ताज्ज्वरस्ताभ्यां श्वासश्चाप्युपजायते । प्लीहाभिवृद्ध्या जठरं जठराच्छोफ एव च ।।३।। अर्शोभ्यो जाठरं दुःखं गुल्मश्चाप्युपजायते । प्रतिश्यायादयो कासः कासात्सञ्जायते क्षयः ।। अन्ये त्वाहुमधुकोशे—रोगस्य रोगश्चेन्निदानं तथा निदानमित्येवोच्येत, तद्विहाय 'निदानार्थकर' इति वचनमेतद्द्द्योतयति । रोगस्य रोगो निदानार्थकरः=निदानकार्यकरणे सहायः । निदानन्तु रक्तपित्तादीन्कति- चिद्रोगान्प्रति ज्वरादिरेव हेतुरिति सिद्धान्तः । अत एवाग्रे स्पष्टमेवाह चरकः—'कश्चिद्धि रोगो रोगस्य हेतुर्भूत्वे'ति । प्रथमस्य रोगस्य ज्वरादेर्यो दुष्टो दोषो हेतुः स एव पश्चाद्भाविनो रक्तपित्तादेरपि रोगस्य हेतुः । 'सर्वेषामव रोगाणां निदानं कुपिता मलाः' इति नियमात् । तन्न । तदा रक्तपित्तादेरुपद्रवलक्षण एव योगेन रोगत्वविघातः स्यात्ततः सर्वेषामिति वचनं सामान्यम् । 'निदानार्थ-कर' इति विशेषवचनात् ।।४८।। यहाँ 'उपलक्ष्यते' पद का 'देखा जाता है' यह अर्थ समझना चाहिये । 'रोग भी रोग के उत्पन्न करने में कारण होता है' इस विषय में दृष्टान्त कहते हैं कि—ज्वर के सन्ताप (गर्मी) से भी रक्तपित्त और रक्तपित्त से भी ज्वर होता है तथा इन दोनों (रक्तपित्त तथा ज्वर) से भी श्वास रोग उत्पन्न होता है । एवं प्लीहा के अत्यन्त बढ़ने से भी जठर रोग तथा जठर रोग से शोथ रोग होता है और अर्श रोग (बवासीर) से भी दुःखप्रद जठर गुल्म रोग होता है एवं जुखाम से खाँसी तथा खाँसी से क्षयरोग होता है । इस विषय में अन्य लोगों का कथन 'मधुकोष' में इस प्रकार कहा हुआ है कि—यदि रोग भी रोग का निदान (कारण) होता तो चरकाचार्य अपने उपर्युक्त वचन में केवल 'निदान' पद का ही प्रयोग करते, किन्तु ऐसा न करके उन्होंने 'निदानार्थकर' इसी पद का प्रयोग किया है, जिससे यह समझा जाता है कि—रोग का रोग निदानार्थकर है अर्थात् निदान के कार्य करने में सहायक है वस्तुतः स्वयं निदान नहीं है । हां यदि (निदान) होता है तो केवल कतिपय रोगों के प्रति, क्योंकि 'रक्तपित्तादि कतिपय रोगों के प्रति ज्वरादि ही हेतु (निदान) है ऐसा सिद्धान्त है अत एव आगे स्पष्ट रूप से ही ७१ भाव.I