भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 1123, कुल 1167 में से

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पृष्ठ 1123

१०७२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे 'बहु स्तोकमकाले वा भुक्तं तद्विषमाशनम्' तरोः प्रपतनम्, तरोरित्यपलक्षणम्। अतियानं=पदाभ्यामतिचलनम्। जागरो रात्रौ। वातादि- वेगाहतिः=आदिशब्देन विण्मूत्रहिक्कोद्गारच्छर्दिशुक्रक्षुत्तृषोच्छ्वासनिद्राः संगृह्यन्ते। दिनस्य त्रिधा विभक्तस्य। एवं रजनेश्च। यस्य यस्य पुनरुक्तिस्तेन वातस्यातिदुष्टिर्बोद्ध्या ।।४१-४३।। यहाँ 'नीवार' पद का 'लोकप्रसिद्ध 'तीनी'। 'त्रिपुट' का लोकप्रसिद्ध 'खेसारी'। 'सतीन' का 'गोल मटर'। 'निष्पाव' का 'सूअरा सेम के समान फल वाली राजशिम्बी का बीज (यह एक प्रकार का अन्न ही है)' 'वरटी' का लोक प्रसिद्ध बर्रे (कसुम का बीज)'। 'मङ्गल्यक' का 'मसूर' यह अर्थ समझना चाहिये। तथा 'विषमाशन (विषम भोजन)' पद से अधिक भोजन करने वाले पुरुष का थोड़ा भोजन करना, स्वल्प भोजन करने वाले का अधिक भोजन करना तथा असमय में भोजन करना जो 'विषमाशन' नाम से शास्त्रों में प्रसिद्ध है उसका ग्रहण करना चाहिये। और 'पेड़ से गिर पड़ना' यहाँ 'पेड़' यह उपलक्षण है, अतः 'पेड़ से या ऊँचे स्थान से गिर पड़ना' यह भाव समझना चाहिये। 'अतियानम्' पद का 'पैरों से अत्यन्त चलना'। 'जागर' पद का 'रात्रि में जागना'। 'वातादिवेगाहतिः' पद में पठित 'आदि' पद से 'मल, मूत्र, हिचकी, डकार, वमन, वीर्य, भूख, प्यास तथा नींद इन सबों का भी ग्रहण किया जाता है अतः इन सबों के वेग को रोकना भी वायु के प्रकुपित होने का कारण है' यह समझना चाहिये। दिन का तीन भाग कर उसके अन्तिम भाग को वायु के प्रकोप का कारण समझना चाहिये। इसी प्रकार रात्रि के विषय में भी समझना चाहिये। यहाँ 'जिसकी पुनरुक्ति हो उससे वायु अत्यन्त दूषित होती है' यह समझना चाहिये ।।४१-४३।। अथ पित्तस्य प्रकोपकारणान्याह- कट्वम्लोष्णविदाहितीक्ष्णलवणक्रोधोपवासातपस्त्रीसम्भोगतृषाक्षुधाऽभिहननव्यायाममद्यादिभिः । भुक्ते जीर्यति भोजने च शरदि ग्रीष्मे तथा प्राणिनां मध्याह्ने च तथाऽर्द्धरात्रिसमये पित्तप्रकोपो भवेत् ।।४४।। पित्त के प्रकुपित होने के कारण-कटु, अम्ल तथा लवण रसयुक्त पदार्थ एवं उष्ण, विदाही तथा तीक्ष्ण पदार्थ, क्रोध, उपवास, धूप, स्त्रीसंभोग, प्यास तथा भूख का रोकना, व्यायाम (कसरत) तथा मद्य आदि के सेवन करने से पित्त प्रकुपित होता है। एवं भोजन किये हुये अन्न के पचने के समय में, शरद् तथा ग्रीष्म ऋतु में, मध्याह्न में (१०-२ बजे दिन तक) तथा अर्द्धरात्रि (१०-२ बजे रात्रि तक) प्राणियों का पित्त प्रकुपित होता है ।।४४।। अथ विदाहिलक्षणमाह- विदाहिद्रव्यमुद्गारमम्लं कुर्यात्तथा तृषाम्। हृदि दाहञ्च जनयेत्पाकं गच्छति तञ्चिरात् ।।४५।। विदाही के लक्षण-जिसके सेवन से अम्ल उद्गार (डकार) आवे, प्यास लगे, हृदय में दाह तथा परिपाक देर में हो उसे विदाही द्रव्य कहते हैं ।।४५।। अन्यच्च- भाषैस्तिलैः कुलत्थैश्च मत्स्यैर्मेषामिषेण च। गव्येन दधितक्रेण नृणां पित्तं प्रकुप्यति ।।४६।। पित्तप्रकोप के कारणान्तर-उड़द, तिल, कुलथी, मछली तथा भेड़ का मांस, गाय की दही या मट्ठा के सेवन से भी मनुष्यों का पित्त प्रकुपित हो जाता है ।।४६।। अथ कफप्रकोपस्य कारणान्याह- गुरुपटुमधुराम्लस्निग्धमाषैस्तिलैश्च-द्रवदधिदिननिद्राशीतसर्पिःप्रपूरैः। प्रथमदिवसभागे रात्रिभागेऽपि चाद्ये- भवति हि कफकोपो भुक्तमात्रे वसन्ते ।।४७।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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