भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ सप्तमं रोगपरीक्षाप्रकरणम् १०७१ ननु आगन्तुजव्याधिषु व्यभिचारःस्यात्। तन्न, तत्राप्युत्पत्त्यनन्तरं दोषप्रकोपस्यावश्यम्भावित्वाद्, उत्पन्नद्रव्येषु गुणयोगस्येव। उक्तञ्च चरके- 'आगन्तुर्हि व्यथापूर्वो जायते पश्चान्निजैर्दोषैरनुबध्यत' इति। तत्रप्रकोपस्य तु=दोषप्रकोपस्य तु निदानम्, विविधाहितसेवनम्=विविधानि नानाविधानि यान्यहि- तान्यसात्म्यान्याहारादीनि तेषां सेवनम् ।।४०।। यहाँ 'सम्पूर्ण रोगों का निदान अर्थात् सन्निकृष्ट (नजदीक) कारण-कुपित अर्थात् अपने-अपने कारणों से दुष्ट हुये मल (वात, पित्त तथा कफ ये तीनों दोष) ही है' ऐसा अन्वय समझना चाहिये। रोगों के उत्पन्न होने में कारण दोष ही हैं इस विषय में 'वाग्भट' ने भी कहा है कि—'सम्पूर्ण रोगों के एक मात्र कारण वातादि दोष ही होते हैं'। अब यहाँ यह शङ्का होती है कि-आगन्तुक रोगों में वाग्भट के इस वचन का व्यभिचार होता है तो उसका उत्तर