भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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१०७० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे तत्र वायोरुपशयमाह- मधुरलवणसाम्लस्निग्धनस्योष्णनिद्रा-गुरुरविकरबस्तिस्वेदसंमर्दनानि । दधिघृततिलतैलाभ्यङ्गसन्तर्पणानि-प्रकुपितपवमानं शान्तमेतानि कुर्य्युः ।।३७।। वायु के उपशय-मधुर, लवण तथा अम्लरसयुक्त पदार्थ, स्निग्ध पदार्थ, नस्य लेना, उष्ण पदार्थ, निद्रा, गुरु (भारी) द्रव्य, सूर्य की किरणें (धूप), बस्तिकर्म, स्वेदन, शरीर का मर्दन, दही, घी, तिल, तेल की मालिश, सन्तर्पण इन सबों का सेवन करने से प्रकुपित वायु का शमन होता है अर्थात् ये सब वायु के उपशय हैं ।।३७।। अथ पित्तस्योपशयमाह- तिक्तस्वादुकषायशीतपवनच्छायानिशावीजनज्योत्स्नाभूगृहयन्त्रवारिजलजं स्त्रीगात्रसंस्पर्शनम् । सर्पिःक्षीरविरेकसेकरुधिरस्रावप्रदेहादिकं-पानाहारविहारभेषजमिदं पित्तप्रशान्तिं नयेत् ।।३८।। पित्त के उपशय-तिक्त, मधुर तथा कषाय रसयुक्त पदार्थ, शीतल पदार्थ, वायु (शीतल वायु), छाया, रात्रि का समय, पंखे की वायु, चाँदनी, पृथ्वी के अन्दर बने हुये गृह (तहखाना), फुहारे का जल, कमल, युवती स्त्रियों के अङ्गों का स्पर्श, घी, दूध, विरेचन लेना, जल के द्वारा सेचन, रुधिर निकलवाना, शीतल पदार्थों का लेप आदि एवं शीतल पान, आहार, विहार तथा औषध का सेवन ये सब यथायोग्य पान, आहार, विहार तथा औषध पित्त को शान्त करने वाले होते हैं ।।३८।। अथ कफस्योपशयमाह- रूक्षक्षारकषायतिक्तकटुकव्यायामनिष्ठीवनं-धूमात्युष्णशिरोविरेकवमनस्वेदोपवासादिकम् ।। तृड्वाताध्वनियुद्धजागरजलक्रीडाऽङ्गनासेवनं-पानाहारविहारभेषजमिदं श्लेष्माणमुग्रं हरेत् ।।३९।। कफ के उपशय-रूक्ष तथा क्षार पदार्थ एवं कषाय, तिक्त तथा कटुरस युक्त पदार्थ, व्यायाम (कसरत), ओषधियों को चबा कर थूकना, धूमपान, अत्यन्त उष्ण, मस्तक का विरेचन कर्म, वमन तथा स्वेदन कर्म, उपवास आदि प्यासे रहना, वायु सेवन, पैदल चलना, मल्लयुद्ध, जागना, जलक्रीडा तथा स्त्रीप्रसङ्ग करना ये सब यथायोग्य पान, आहार, विहार तथा औषध सेवन करने से उग्र कफ को नाश करने वाले होते हैं ।।३९।। ❖ जलक्रीड़ा कफं कथं हरति तदाह-जलक्रीडाजनितशैत्येनावरुद्धोष्मा पङ्कलिप्तोऽभितः पाकाग्निरिवोग्रो भूत्वा कफं शोषयतीति समाधिः ।।३९।। यहाँ 'जलक्रीड़ा' कैसे कफ को दूर करती है इस प्रश्न का उत्तर इस प्रकार कहते हैं कि जलक्रीड़ा करने से उत्पन्न शीतलता से रुकी हुई शरीर के अन्दर की गर्मी चारों तरफ कीचड़ से लिपटे हुये पुटपाक की अग्नि की भाँति उग्र होकर कफ को सुखा डालती है अतः 'जलक्रीड़ा को कफनाशक करना उचित ही है' यह और भी समझ लेना चाहिये ।।३९।। अथ रोगनिदानविवेचनभाह- सर्वेषामेव रोगाणां निदानं कुपिता मलाः । तत्प्रकोपस्य तु प्रोक्तं विविधाहितसेवनम् ।।४०।। रोगों के निदान का विवेचन-सम्पूर्ण रोगों का कारण दोषों का कुपित होना है और दोषों के कुपित होने के कारण तो अनेक प्रकार के जो अहितकारक आहार-विहारादि हैं उनका सेवन करना ही कहा हुआ है ।।४०।। ❖ सर्वेषां रोगाणां निदानं सन्निकृष्टं कारणं, कुपिताः=स्वहेतुदुष्टा मला वातपित्तकफा एवेत्यन्वयः । तथा च वाग्भटः-'दोषा एव हि सर्वेषां रोगाणामेककारणम्' इति । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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