भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ सप्तमं रोगिपरीक्षाप्रकरणम् १०६९ यहाँ यह और भी समझ लेना चाहिये कि-दोषों के विशेषलक्षण-अत्यन्त जँभाई होना, नेत्रों में दाह (जलन) होना, जठराग्नि का मन्द होना ये सब क्रम से वायु, पित्त तथा कफ के हैं तथा पूर्वोक्त हेत्वादि में पूर्वरूप भी रोगों को जानने के लिये कारण हैं, जैसे कि-श्रम आदि लक्षणों का प्रकट होना होने वाले ज्वर का बोधक होता है, किन्तु यदि उन्हीं श्रमादि के साथ-साथ अत्यन्त जँभाई होना यह लक्षण भी मिला हो तो होने वाले वातज्वर का बोधक होता है और यदि नेत्रों में दाह होना यह लक्षण मिला हो तो होने वाले पित्तज्वर का बोधक होता है, इसी भाँति अग्नि का मन्द होना यह लक्षण मिला हो तो होने वाले कफज्वर का बोधक होता है ॥३४॥ अथ लक्षणस्य लक्षणमाह- पूर्वरूपं विशिष्टं यद्व्यक्तं तल्लक्षणं स्मृतम्। संस्थानं लिङ्गं चिह्नञ्च व्यञ्जन रूपमाकृतिः ।। लक्षण के लक्षण-उपर्युक्त विशिष्ट पूर्वरूप में यदि वातादि दोषों के विशेष लक्षण (अत्यन्त जृम्भादि) पूर्णरूप से प्रकट हो जायँ तो वे ही लक्षण कहलाते हैं। इसके पर्यायवाची शब्द-संस्थान, लिङ्ग, चिह्न, व्यञ्जन, रूप तथा आकृति ये सब हैं ॥३५॥ ❖ विशिष्टं पूर्वरूपम् ईषद्व्यक्तरूपं, तदेव सम्यग्व्यक्तं लक्षणं स्मृतम्। तस्य शास्त्रे व्यवहाराय पर्यायानाह- संस्थानमित्यादि। लक्षणं व्याधेर्ज्ञानाय हेतुर्यथा- स्वेदावरोधः सन्तापः सर्वाङ्गग्रहणं तथा। युगपद्यत्र रोगे तु स ज्वरः परिकीर्त्तिः (१) यहाँ यह समझना चाहिये कि-विशिष्ट पूर्वरूप में जो दोषों के विशेष लक्षण किञ्चित् प्रकट हुये हैं वे ही यदि पूर्णरूप से प्रकट हो जायँ तो विशिष्ट पूर्व रूप न कहे जाकर 'लक्षण' नाम से व्यवहृत होते हैं। शास्त्रों में व्यवहार के लिये लक्षण के पर्यायवाची शब्दों को 'संस्थान' इत्यादि से कहते हैं। रोगों को जानने के लिये लक्षण भी कारण हैं। जैसे कि-पसीना न निकलना, शरीर सन्तप्त (गर्म) होना, सर्वाङ्ग जकड़ जाना, ये सब लक्षण एक साथ ही जिस रोग में प्रकट हों उसे 'ज्वर' कहते हैं ॥१॥ ❖ युगपदेतल्लक्षणं ज्वरं बोधयति (१) ।।३५।। यहाँ 'युगपद्' पद का 'पसीना न निकलना आदि ये सब लक्षण एक साथ ही न कि अलग-अलग ज्वर के बोधक होते हैं' यह अर्थ समझना चाहिये (१) ।।३५।। अथोपशयस्य लक्षणमाह- औषधान्नविहाराणामुपयोगं सुखावहम्। नृणामुपशयं विद्यात्स हि सात्म्यमिति स्मृतः ।।३६।। उपशय के लक्षण-रोगी को औषध, अन्न तथा विहार (रहन-सहन) का उपयोग यदि सुखकारक हो तो उसे 'उपशय' समझना चाहिये। इसी को 'सात्म्य' भी कहते हैं ॥३६॥ ❖ उपशयो व्याधेर्ज्ञानाय हेतुर्यत उक्तं चरकेण- 'गूढलिङ्गं सङ्कीर्णलक्षणं च व्याधिमुपशयानुपशयाभ्यां परीक्षेत' इति। तथा च सुश्रुते- 'अभ्यङ्गस्वेदनस्नेहैर्विकारो वातिकस्तु यः । न शाम्येत् तत्र विज्ञेयं रक्तमत्रास्ति दूषितम्' इति ।। ३६ ।। यहाँ यह और समझना चाहिये कि- 'उपशय' भी रोग-ज्ञान में हेतु है क्योंकि चरकाचार्य ने कहा है कि-'जिस रोग के लक्षण छिपे हों या जहाँ अन्य रोगों के भी लक्षण मिले हुये हों वहाँ उपशय तथा अनुपशय के द्वारा रोग की परीक्षा करनी चाहिये'। ऐसे सुश्रुत में भी कहा है कि- अभ्यङ्ग (तेल की मालिश), स्वेदन (पसीना निकलना) तथा स्नेह के द्वारा भी यदि वातसम्बन्धी विकार नष्ट नहीं होता है तो वहाँ 'रक्त दूषित हुआ है' यह समझना चाहिये। अर्थात् वातसम्बन्धी विकार नहीं है किन्तु रक्तसम्बन्धी विकार है ऐसा समझना चाहिये। इति ॥३६॥