भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०६८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ❖ नक्तमत्राव्ययं रात्रिवाचकम् । एतेनैतदुक्तं यस्मिन्नक्तादेरंशे यस्य दोषस्य प्रकोपोक्तोऽस्ति सोऽशस्तस्य दोषजस्य व्याधेः काल इत्यर्थः ।। ३१ ।। यहाँ 'नक्तम्' पद 'अव्यय है तथा रात्रिवाचक है' और 'नक्तंदिनर्तु, इत्यादि से यह कहा गया कि—'रात्रि आदि के जिस अंश में जिस दोष का प्रकोप कहा गया है वह अंश उस दोष से उत्पन्न हुये रोग के भी प्रकोप का काल होता है' यह और समझ लेना चाहिये ।। ३१ ।। नक्तादेरंशेषु वातादिप्रकोप उक्तो वाग्भटेन- ते व्यापिनोऽपि हृन्नाभ्योरधोमध्योर्ध्व संश्रयाः । वयोऽहोरात्रभुक्तानामन्तमध्यादिगाः क्रमात् ।। ३२ ।। इति । रात्रि आदि के किस अंश में किस दोष का प्रकोप होता है, इस विषय में 'वाग्भट' ने यह कहा है कि—यद्यपि वात, पित्त तथा कफ ये सब सारे शरीर में व्याप्त होकर रहने वाले हैं तथापि वे क्रम से विशेष करके हृदय तथा नाभि के नीचे, मध्य तथा ऊपर के भाग में रहते हैं अर्थात् नाभि के नीचे भाग में वायु, हृदय तथा नाभि के मध्य में पित्त और हृदय के ऊपर भाग में कफ रहता है । एवं मनुष्यों की अवस्था (बाल्य, यौवन, वृद्धता), दिन, रात्रि, भुक्त (भोजन किये हुये अन्न का परिपाक) इन सबों के अन्त, मध्य तथा आदि के भाग क्रम से वातादि के प्रकोप के काल हैं, अर्थात् अवस्था का अन्तिम भाग (वृद्धावस्था, दिन का अन्तिम भाग (२-६ बजे तक), रात्रि का अन्त्यभाग (२-६ बजे तक), भुक्त (अन्न के पचने) का अन्तिम काल वायु के प्रकोप होने का है । अवस्था का मध्यभाग (युवावस्था), दिन का मध्यभाग (१०- २ बजे तक), रात्रि का मध्य भाग (१०-२ बजे तक), भुक्त (अन्न के पचने) का मध्यकाल पित्त के प्रकोप होने का है, एवं अवस्था का आदि भाग (बाल्यावस्था), दिन का प्रथम भाग (६-१० बजे तक), रात्रि का प्रथम भाग (६-१० बजे तक), भुक्त (अन्न पचने) का आदि काल कफ के प्रकोप का काल है ।। ❖ ते=वातपित्तकफाः ।। ३२ ।। यहाँ 'ते' पद का 'वायु, पित्त तथा कफ' यह अर्थ समझना चाहिये ।। ३२ ।। ऋतुषु वातादिकोपो यथा- वर्षासु शिशिरे वायुः पित्तं शरदि चोष्णके । वसन्ते तु कफः कुप्येदेषा प्रकृतिरातर्वी ।। ३३ ।। वातादि दोषों में कौन दोष किस ऋतु में प्रकुपित होता है उसे कहते हैं—वर्षा (श्रावणभाद्रपद) तथा शिशिर ऋतु (माघ-फाल्गुन) में वायु, शरद् (क्वार-कार्तिक) तथा ग्रीष्म ऋतु (ज्येष्ठ-आषाढ़) में पित्त एवं वसन्त ऋतु (चैत्र- वैशाख) में कफ प्रकुपित होता है, इन समयों में वातादि दोष जो प्रकुपित होता है, इन समयों में वातादि दोष जो प्रकुपित होते हैं वह ऋतु के स्वभाववश होते हैं ।। ३३ ।। अथ पूर्वरूपस्य लक्षणमाह- पूर्वरूपन्तु तद्येन विद्याद्भाविनमामयम् । सामान्यं ञ्च विशिष्टञ्च द्विविधं तदुदाहृतम् ।। सामान्यं तत्र दोषाणां विशेषैरनधिष्ठितम् । विशिष्टमीषद्द्व्यक्तं स्याद् विशेषैश्च समन्वितम् ।। ३४ ।। पूर्वरूप के लक्षण—जिसके द्वारा भविष्य काल में होने वाले रोग का ज्ञान हो उसे 'पूर्वरूप' कहते हैं । वह (पूर्वरूप) दो प्रकार का होता है, (१) सामान्य पूर्वरूप, (२) विशिष्ट पूर्वरूप । उसमें सामान्य पूर्वरूप वह कहलाता है— जिसमें वातादि दोषों के विशेष लक्षण न मिले हुये हों और विशिष्ट पूर्वरूप वह कहलाता है—जिसमें रोगों के सामान्य लक्षणों के साथ-साथ दोषों के भी विशेष लक्षण किंचित् प्रकट रूप से मिले हुये हों ।। ३४ ।। ❖ दोषाणां विशेषाः=जृम्भाऽतिशयनेत्रदाहाग्निमान्द्यादयः । तत्र पूर्वरूपं व्याधीनां ज्ञानाय हेतुः । यथा- श्रमादयो भाविनं ज्वरं बोधयन्ति । अथ च त एव श्रमादयोऽतिशयितजृम्भायुक्ता भाविनं वातज्वरं, नेत्रदाहयुक्ता भाविनं पित्तज्वरं, वह्निमान्द्ययुक्ता भाविनं कफज्वरं बोधयन्ति ।। ३४ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA