भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०५४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ रोगभेदेन तर्पणधारणकालभेदमाह- तर्पणं धारयेद्वर्त्मरोगे वाचां शतं बुधः। स्वस्थे कफे सन्धिरोगे वाचां पञ्च शतानि च।। षट्शतानि कफे कृष्णरोगे सप्त शतानि हि। दृष्टिरोगे शतान्यष्टावधिमन्थे सहस्त्रकम् ।।१७६।। सहस्रे वातरोगेषु धार्यमेव हि तर्पणम् ।।१७७।। रोगभेद से तर्पण धारण करने के काल का भेद-वर्त्म (बरौनी) गत रोग में जब तक १०० गुरु अक्षरों का उच्चारण हो तब तक, स्वस्थ कफ तथा सन्धि रोग में ५०० गुरु अक्षरों के उच्चारण तक, कफ में ६०० तक, कृष्ण (काली पुतली) गत रोग में ७०० तक, दृष्टिरोग में ८०० तक, अधिमन्थ तथा वातसम्बन्धी नेत्ररोग में १००० गुरु अक्षरों के उच्चारण तक तर्पण धारण कराना चाहिये ।।१७५-१७७।। पूर्णे चापाङ्गमार्गेण स्रावयित्वाऽक्षि शोधयेत्। स्विन्नेन यवपिष्टेन स्नेहवीर्येरितं ततः ।।१७८।। यथास्वं धूमपानेन कफमस्य विरेचयेत्। एकाहं वा त्र्यहं वापि पञ्चाहं तर्पणं चरेत् ।।१७९।। जब तर्पणधारण करने का काल पूर्ण हो जाय तब नेत्र के प्रान्त (कोर) मार्ग से भरे हुये घृतादि को गिरा दे, उसके बाद गूँदकर गर्म किये हुए जौ के आटे की पिण्डी से नेत्रों को पोंछ कर साफ कर डाले। तत्पश्चात् स्नेह के प्रयोग करने के प्रभाव से बढ़े हुये कफ का यथायोग्य ओषधियों के धूमपान द्वारा विरेचन करे। अर्थात् उसे निकाल देवे। इस भाँति एक दिन, तीन दिन या पाँच दिन तक तर्पण क्रिया करे ।।१७८-१७९।। अथ यथार्थतर्पणचिह्नमाह- तर्पणे तृप्तिलिङ्गानि नेत्रस्यैतानि लक्षयेत्। सुखस्वप्नावबोधत्वं वैशद्यं नेत्रपाटवम् ।। निर्वृतिर्व्याधिशान्तिश्च क्रियालाघवमेव च ।।१८०।। यथार्थ तर्पण के चिह्न-उचित रीति से तर्पण क्रिया होने पर सुखपूर्वक नींद आना तथा सुखपूर्वक जग जाना, नेत्रों में स्वच्छता तथा सामर्थ्य का होना एवं सुख मिलना, नेत्ररोग-शान्ति तथा नेत्रों की क्रिया में लघुता होना; ये सब नेत्रों के तृप्तिबोधक लक्षण प्रकट होते हैं ।।१८०।। ❖ निर्वृतिः=सुखम्। क्रियालाघवं=नेत्रस्य क्रियायां निमेषोन्मेषादौ लघुता ।।१८०।। यहाँ ‘निर्वृति’ पद का ‘सुख मिलना’ तथा ‘क्रियालाघव’ पद का ‘नेत्रों की क्रिया में अर्थात् पलक बन्द करने तथा खोलने में लघुता होना’ यह अर्थ समझना चाहिये ।।१८०।। अथातितर्पितहीनतर्पितयोर्लक्षणं प्रतीकारमयोग्यसमयं चाह- गुर्वाविलमतिस्निग्धमश्रुकण्डूपदेहवत्। घर्षतोदयुतं नेत्रमतितर्पितमादिशेत् ।।१८१।। शास्रावशोषरोगाढ्यमुपदेहसमाकुलम्। रूक्षमस्त्रावमरुणं नेत्रस्याद्धीनतर्पितम् ।।१८२।। अतितर्पित नेत्र के लक्षण-यदि तर्पण क्रिया करने पर नेत्रों में भारीपन, मैलापन तथा अत्यन्त स्निग्धता हो और आँसू बहना, खुजली होना तथा कफ से लिपटा हुआ मालूम पड़ना एवं घिसने के समान या सुई चुभने के समान पीड़ा होना; ये सब लक्षण प्रकट हों तो नेत्रों का अधिक मात्रा में तर्पण हुआ समझना चाहिये। हीनतर्पित नेत्र के लक्षण- यदि तर्पण क्रिया करने पर नेत्रों से पानी झरना, शोथ तथा पीड़ा अधिक होना, कफ से अधिक लिपटा हुआ मालूम पड़ना, रूक्षता, गीलापन न रहना तथा अधिक लाल रहना, ये सब लक्षण प्रकट हों तो तर्पणक्रिया हीनमात्रा में हुई है, यह समझना चाहिये ।।१८१-१८२।। अनयोर्दोषबाहुल्यात्प्रयतेत चिकित्सिते। रूक्षस्निग्धोपचाराभ्यामनयोः स्यात्प्रतिक्रिया ।।१८३।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA