भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ षष्ठं धूमपानादिविधिप्रकरणम् १०५३ पिण्डी की विधि-यथायोग्य ओषधियों का कल्क बनाकर उससे एक ग्रास की मात्रा लेकर टिकिया बना ले । पश्चात् उस टिकिये को एक वस्त्र के टुकड़े से आँखों पर बाँध देने को 'पिण्डी' कहते हैं । यह अभिष्यन्द को दूर करने वाली होती है । वात-सम्बन्धी नेत्र रोग में स्निग्ध तथा उष्ण, पित्त सम्बन्धी रोग में शीतल एवं कफ सम्बन्धी नेत्ररोग में रूक्ष तथा उष्ण पिण्डी (टिकिया) बाँधने की विधि पण्डितों ने बताई है ।।१६४-१६५।। सा यथा- एरण्डपत्रमूलत्वङ्निर्मिता वातनाशिनी । धात्रीविरचिता पित्ते शिग्रुपत्रकृता कफे ।। १६६ ।। पिण्डी बनाने की ओषधिया-वात-सम्बन्धी नेत्ररोग में एरण्ड के पत्ते, मूल तथा छिलकों की पिण्डी, पित्तसम्बन्धी नेत्ररोग में आंवले की एवं कफ सम्बन्धी नेत्ररोग में सहजने के पत्तों की पिण्डी बनानी चाहिये ।।१६५।। अथ विडालकविधिमाह- विडालको बहिर्लेपो नेत्रपक्ष्मविवर्जितः । तस्य मात्रा परिज्ञेया मुखालेपविधानवत् ।। १६७ ।। यष्टीगैरिकसिन्धूत्थदार्वीताक्ष्र्यैः । जलपिष्टैर्बहिर्लेपः सर्वनेत्रामयापहः ।। १६८ ।। विडालकविधि-पलकों को छोड़कर नेत्र के बाहरी भाग पर जो ओषधियों का लेप किया जाता है, उसी को 'विडालक' कहते हैं । इस (विडालक) लेप की मात्रा मुख पर जो लेप किया जाता है, उसके समान ही समझनी चाहिये । मुलहठी, गेरू, सेंधानमक, दारु हलदी, रसवत, इन सबों की समान भाग में लेकर जल के साथ पीस कर नेत्र के बाहरी भाग पर लेप करने से सम्पूर्ण नेत्र सम्बन्धी रोग नष्ट होते हैं ।।१६७-१६८।। अथ तर्पणविधिमाह- वातातपरजोहीने वेश्मन्युत्तानशायिनः । अभितो माषचूर्णेन क्लिन्नेन परिपिण्डितौ ।। १६९ ।। समौ दृढावसम्बाधौ कर्त्तव्यौ नेत्रकोशयोः । पूरयेद् घृतमण्डेन विलीनेन सुखोदकैः ।। १७० ।। सर्पिषा शतधौतेन क्षीरजेन घृतेन वा । निमग्नान्यक्षिपक्ष्माणि यावत्स्युस्तावदेव हि ।। १७१ ।। पूरयेन्मीलिते नेत्रे तत उन्मीलयेच्छनैः । भिषग्भिरेष विख्यातस्तर्पणस्योदितो विधिः ।। १७२ ।। तर्पण विधि-जिसमें हवा का झोंका न लगता हो तथा धूप एवं धूलि न आती हो, ऐसे स्वच्छ गृह में रोगी को उत्तान (चित्त) लिटाकर सने हुये उड़द के आटा की सीधी मजबूत मेड़री (घेरा) दोनों नेत्रों के चारों तरफ बना दे, उसके बाद रोगी के आँखों को बन्द करा कर उष्ण जल से पिघलाये हुये घी, सौ बार के धुले हुये घी अथवा दूध से निकाले हुये घी को पिघलाकर इतनी मात्रा में घेरे के अन्दर छोड़े कि जिसमें आँख की पलकें डूब जायें, उसके बाद धीरे से पलक को खुलवा दे । इसी को वैद्यों ने प्रसिद्ध तर्पण की विधि बतलाई है ।।१६९-१७२।। अथ तर्पणार्हनेत्राणां लक्षणान्याह- यद्रूक्षञ्च परिष्वन्दि नेत्रं कुटिलमाविलम् । शीर्णपक्ष्मसिरोत्पातकृच्छ्रोन्मीलनसंयुतम् ।। १७३ ।। तिमिरार्जुनशुक्लाद्यैरभिष्यन्दाधिमन्थकैः । शुष्काक्षिपाकशोथाभ्यां युतं वातविपर्ययैः ।। तन्नेत्रं तर्पयेत्सम्यङ् नेत्ररोगविशारदः ।। १७४ ।। तर्पण के योग्य नेत्रों के लक्षण-जो नेत्र रूक्ष हो गये हों या जिनसे पानी झरता हो वा कुटिल वा मटमैले हो गये हों तथा जिनके पलकों के रोयें गिर गये हों वा जो सिरा (नस) सम्बन्धी उत्पात से युक्त हों अर्थात् जिनकी नसें लाल होकर अत्यन्त पीड़ा करती हों या जिनकी पलकें बड़ी कठिनता से खुलती हों एवं जिन नेत्रों में तिमिर, अर्जुन, शुक्ल, अभिष्यन्द, अधिमन्थ, शुष्कनेत्र, नेत्रपाक, नेत्रशोथ, वातविपर्यय आदि रोग हो गये हों उन सबों में नेत्ररोग के ज्ञाता वैद्यजन भलीभाँति तर्पण विधि करें ।।१७३-१७४।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA