भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०५२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे सेंक करने की विधि-पलक बन्द किये हुये रोगी के नेत्रों के ऊपर चार अङ्गुल के ऊपर से पतली धार छोड़ते रहने को 'सेंक' कहते हैं, यह सर्वत्र नेत्रों के लिये हितकर होता है। यह सेंक वातजनित नेत्रविकारों में स्नेह (घृतादि) से करना चाहिये और पित्त तथा रक्तजन्य विकारों का रोपणकारक पदार्थों के रस से एवं कफजन्य विकारों में लेखनकारक पदार्थों के रस से सेंक करना चाहिये। स्नेह पदार्थों से यदि सेंक करना हो तो छः सौ वाङ्मात्रा तक, रोपण सेंक में चार सौ वाङ्मात्रा तक एवं लेखन सेंक में तीन सौ वाङ्मात्रा तक सेंक करना चाहिये। उस समय तक सेंक करने से नेत्र स्वच्छ हो जाता है। पण्डितों ने वाङ्मात्रा का काल इस प्रकार कहा है कि पुरुष जितने समय में पलक बन्द कर पुनः खोलता है या चुटकी बजाता है अथवा एक गुरु (आ आदि) अक्षर का उच्चारण करता है, उतने समय को 'वाङ्मात्रा' समझनी चाहिये अर्थात् पलक बन्द आदि करने में जितना समय लगता है, उतने ही समय की एक वाङ्मात्रा होती है। सेंक सर्वदा दिन में ही करना चाहिये, किन्तु यदि प्राण को सङ्कट में डालने वाला रोग हो तो रात्रि में भी कर लेना चाहिये। एरण्ड के पत्तों का कल्क बनाकर उसके साथ बकरी का दूध पकाये, पश्चात् किंचित्-किंचित गर्म रहते ही उक्त दूध से दोनों नेत्रों में सेक (सेवन) करने से वातसम्बन्धी अभिष्यन्द (नेत्र रोग) दूर होता है, अत एव उक्त दूध का सेंक अत्यन्त हितकर होता है ॥१५३-१५७॥ अथाश्च्योतनविधिमाह- क्वाथक्षौद्रासवस्नेहबिन्दूनां यत्तु पातनम्। द्व्यङ्गुलोन्मीलिते नेत्रे प्रोक्तमाश्च्योतनं हितम् ।।१५८।। बिन्दुवोऽष्टौ लेखनेषु रोपणे दश बिन्दवः । स्नेहने द्वादश प्रोक्तास्ते शीते कोष्णरूपिणः ।।१५९।। उष्णे तु शीतरूपाः स्युः सर्वत्रैवैष निश्चयः। वाते तिक्तं तथा स्निग्धं पित्ते मधुरशीतलम् ।।१६०।। कफे तिक्तोष्णरूक्षं च क्रमादाश्च्योतनं हितम् । आश्च्योतनानां सर्वेषां मात्रा स्याद्वाक्छतोन्मिता ।।१६१।। ततः परं लोचनाभ्यां भेषजानामयोगतः । आश्च्योतनं न कर्तव्यं निशायां केनचित्क्वचित् ।।१६२।। आश्च्योतन की विधि-रोगी के नेत्रों को दो अंगुल चौड़ा खोल कर उसमें क्वाथ, शहद, आसव वा स्नेह (घृत) को बूँद-बूँद कर जो डाला जाता है, उसी को 'आश्च्योतन' कहते हैं। यह नेत्ररोग में हितकर होता है। यदि लेखन क्रिया करनी हो तो आश्च्योतन की मात्रा आठ बूँद की है। रोपण किया में दश बूँद की एवं स्नेहन क्रिया में बारह बूँद की आश्च्योतन की मात्रा है। शीत के कारण से यदि नेत्ररोग हुआ तो किञ्चित् किञ्चित् गर्म क्वाथ आदि की बूँदें' डालनी चाहिये और यदि गर्मी के कारण से हुआ हो तो शीतल क्वाथ की बूँदें' डालनी चाहिये। यह नियम सर्वत्र के लिये निश्चित है। वात सम्बन्धी नेत्ररोग में तिक्त रसयुक्त तथा स्नेह पदार्थों का आश्च्योतन हितकर होता है। पित्तसम्बन्धी नेत्ररोग में मधुर रसयुक्त तथा शीतल पदार्थों का आश्च्योतन एवं कफसम्बन्धी नेत्ररोग में तिक्त रसयुक्त, उष्ण तथा रूक्ष पदार्थों का आश्च्योतन हितकर है। प्रत्येक आश्च्योतन की मात्रा जितने समय में १०० गुरु अक्षरों का उच्चारण होता है, उतने समय की जाननी चाहिये। इसके बाद अर्थात् १०० मात्रा का समय बीत जाने पर आश्च्योतन करना नेत्रों के लिये अयोग्य होता है। किसी भी वैद्य को यह उचित नहीं है कि वह रात्रि में कभी भी आश्च्योतन करे ।।१५८-१६२।। तद्यथा- बिल्वादिपञ्चमूलेन बृहत्येरण्डशिग्रुभिः । क्वाथ आश्च्योतने कोष्णो वाताभिष्यन्दनाशनः ।।१६३।। आश्च्योतन की ओषधियाँ जैसे कि बेल आदि पञ्चमूल, कटेरी, एरण्ड तथा सहिजन का क्वाथ बना कर किञ्चित् गर्म रहते ही उसका आश्च्योतन में प्रयोग करना वातसम्बन्धी अभिष्यन्द (नेत्ररोगविशेष) को दूर करने वाला होता है ।।१६३।। अथ पिण्डिकाविधिमाह- युक्तभेषजकल्कस्य पिण्डी कवलमात्रया । वस्त्रखण्डेन सम्बद्धा नेत्रेऽभिष्यन्दनाशिनी ।।१६४।। स्निग्धोष्णा पिण्डिका वाते पित्ते सा शीतला मता । रूक्षोष्णा श्लेष्मणि प्रोक्ता विधिरुक्तो बुधैरयम् ।।१६५।।