भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ षष्ठं धूमपानादिविधिप्रकरणम् १०५१ रुधिर की रक्षा करने का कारण-शरीर की उत्पत्ति रक्त से ही हुई है तथा रक्त ही शरीर को धारण किये रहता है तथा यही जीवन का आधार भी है, अतः बुद्धिमान पुरुष को इसकी रक्षा अवश्य करनी चाहिये ॥१४६॥ अथ स्रुतरक्तस्य कुपिते वायौ चिकित्सामाह- शीतोपचारैः कुपिते स्रुतरक्तस्य मारुते। कोष्णेन सर्पिषा शोथं सव्यथं परिषेचयेत् ।।१४७।। क्षीणस्यैणशशोरभ्रहरिणच्छागमांसजः। रसः समुचितः पाने क्षीरं षष्टिकया हितम् ।।१४८।। रक्त के अधिक निकल जाने पर वायु के कुपित होने की चिकित्सा-रक्त के अधिक निकलने पर उसे बन्द करने के लिये शीतल उपचार करने से वायु के कुपित होने पर पीड़ा युक्त शोथ के ऊपर किंचिद् गर्म-गर्म घृत का सेचन करना चाहिये। रक्तस्राव होने से क्षीण हुये रोगी को काला हरिन, खरगोश, भेड़, हरिन तथा बकरे का मांसरस (सुरुवा) पिलाना एवं साठी चावल के साथ भोजन में दूध देना हितकर होता है ॥१४७-१४८॥ अथ सम्यङ्निःस्रुतरक्तवतो लक्ष्णमाह- पीडाशान्तिर्लघुत्वं च व्याध्युपद्रवसंक्षयः। मनःस्वास्थ्यं भवेच्चिह्नं सम्यङ्निःसारितेऽसृजि। उत्तम रीति से रक्तस्राव के लक्षण-पीड़ा का शान्त होना, शरीर हल्का होना, रोग के उपद्रवों का नाश तथा मन का स्वस्थ होना, ये सब लक्षण रक्त के उचित रीति से निकालने पर प्रकट होते हैं ॥१४९॥ रक्तस्राविणां वर्ज्यविषयानाह- व्यायाममैथुनक्रोधशीतस्नानप्रवातकान्। एकाशनं दिवानिद्रा क्षाराम्लकटुभोजनम् ।।१५०।। शोकं वादामजीर्णञ्च त्यजेदा बलदर्शनात् ।।१५१।। जिसे रक्तस्राव कराया गया है उसके लिये त्याग करने योग्य कार्य-कसरत, मैथुन, क्रोध, शीतल जल से स्नान, अधिक वायु के झोके का सेवन, एक समय भोजन करना, दिन में सोना, खारा, खट्टा तथा कटु रस युक्त पदार्थों का भोजन, शोक, वाद-विवाद (बहस), अजीर्ण (अपरिपक्व भोजन अथवा अजीर्ण होना) इन सबों को रक्तस्राव कराने पर जब तक भलीभाँति शरीर में बल का संचार न हो जाय तब तक के लिये छोड़ देना चाहिये ॥१५०-१५१॥ अथ नेत्रस्वच्छकारिणीः क्रिया आह- सेक आश्चर्योतनं पिण्डी विडालस्तर्पणं तथा। पुटपाकोऽञ्जनं चैभिः कल्पैर्नेत्रमुपाचरेत् ।।१५२।। नेत्र को 'स्वच्छ करने की क्रियायें'-(१) सेक (नेत्र के ऊपर जल आदि का धारा डालना), (२) आश्च्योतन (ओषधियों के रस की बूँदें डालना), (३) पिण्डी (ओषधियों की लुगदी बाँधना), (४) विडाल (लेप करना), (५) तर्पण (तृप्त करने के लिये नेत्रों में घी आदि भरना), (६) पुटपाक (पुटपाक की रीति से परिपक्व ओषधियों का रस नेत्र में डालना), (७) अञ्जन (सुरमे आदि का आँजन देना) इन सब विधानों से नेत्र की चिकित्सा करनी चाहिये ॥१५२॥ तत्रादौ सेकविधिमाह- सेकस्तु सूक्ष्मधाराभिः सर्वस्मिन्नयने हितः। भीलिताक्ष्यस्य भर्त्यस्य प्रदेयश्चतुरङ्गुलः ।।१५३।। स सस्नेहो भवेद्वाते पित्ते रक्ते च रोपणः। लेखनस्तु कफे कार्यस्तस्य मात्राऽभिधीयते ।।१५४।। षड्भिर्वाचां शतैः स्नेह चतुर्भिश्चैव रोपणे। तैस्त्रिभिर्लेखने कार्यः सेको नेत्रप्रसादने ।।१५५।। निमेषोन्मेषणं पुंसामङ्गुल्या छोटिकाऽथ वा। गुवक्षरोच्चारणं वा वाङ्मात्रेयं स्मृता बुधैः ।। सेकस्तु दिवसे कार्यो रात्रौ चात्यन्तिके गदे। एरण्डस्य दलैः पिष्टैः पक्वमाजं पया हितम् ।। सुखोष्णं नेत्रयोः सिक्तं वाताभिष्यन्दनाशनम् ।।१५७।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA