भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 1097

१०४६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ४ अङ्गुल), तिहाई अङ्गुल ऊँचा (१/३ अङ्गुल) और आधा अङ्गुल ऊँचा (१/२ अङ्गुल) इस प्रकार लेप की ऊँचाई के भेद से लेप का प्रमाण तीन प्रकार का होता है। गीला लेप रोगनाशक तथा सूखा लेप कान्ति को नष्ट करने वाला होता है ॥९२-९३॥ ❖ चतुर्भागत्रिभागादर्द्धाङ्गुलोन्नतः, एवं त्रिप्रमाणः ॥९३॥ यहाँ 'लेप का प्रमाण तीन प्रकार का होता है' यह जो कहा है वह इस प्रकार से समझना चाहिये कि-'(१) चौथाई अङ्गुल का, (२) तिहाई अङ्गुल का, (३) आधा अङ्गुल का ऊँचा लेप' ॥९२-९३॥ दोषघ्नो लेपो यथा- शोथघ्नीदारुसिद्धार्थशुण्ठीशोभाञ्जनत्वचाम्। आरनालेन पिष्टानां प्रलेपः सर्वशोथहा ॥९४॥ दोषघ्न लेप-गदहपुरना, देवदारु, सरसों, सोंठ और सहजन की छाल इन पाँच ओषधियों को कांजी में पीस कर लेप करने से सभी प्रकार की सूजन नष्ट हो जाती है। यह दोषघ्न लेप है ॥९४॥ ❖ शोथघ्नी=पुनर्नवा ॥९४॥ यहाँ पर 'शोथघ्नी' से 'गदहपुर्ना' समझना चाहिये ॥९४॥ शिरीषं मधुयष्टी च तगरं रक्तचन्दनम्। एला मांसी निशायुग्मं कुष्ठं बालकमेव च ॥९५॥ इति सञ्चूर्ण्य लेपोऽयं पञ्चमांशघृतप्लुतः। जलेन क्रियते सुज्ञैर्दशाङ्ग इति संज्ञितः ॥९६॥ वीसर्पघ्न विस्फोटाञ्छोथदुष्टव्रणाञ्जयेत् ॥९७॥ दशाङ्गलेप-शिरीष की छाल, मुलहठी, तगर, लाल चन्दन, इलायची, जटामांसी, हल्दी, दारुहल्दी, कूठ और नेत्रबाला इन पदार्थों का चूर्ण बना कर उसमें १/५ भाग घी डाल कर पानी से लेप करे। इससे विसर्प, विस्फोटक, सूजन और दुष्ट व्रणों का क्षय होता है। विद्वान् लोग इसको दशाङ्ग लेप कहते हैं ॥९५-९७॥ विषहा लेपो यथा- अजादुग्धतिलैर्लेपो नवनीतेन संयुतः। शोथमारुष्करं हन्ति लेपो वा कृष्णमार्त्तिकः ॥९८॥ विषहा लेप-बकरी के दूध में तिल पीस कर और उसमें भैंस का मक्खन मिला कर लेप करने से अथवा काली मिट्टी का लेप करने से मिलावे इत्यादि से हुई सूजन नष्ट होती है। इस लेप को वैद्य लोग विषहा लेप कहते हैं ॥९८॥ ❖ नवनीतेनात्र माहिषेणार्दिकेन। कृष्णमार्त्तिकः=कृष्णमृत्तिकाकृतः ॥९८॥ यहाँ 'नवनीत' पद से 'भैंस का मक्खन कल्क के आधे भाग बराबर' यह अर्थ समझना चाहिये तथा 'कृष्णमार्त्तिक' का 'काली मिट्टी का' यह अर्थ समझना चाहिये ॥९८॥ अपरः कृमिविषापहलेपो यथा- लाङ्गल्यतिविषाऽलावूक्षालिनीबीजमूलकैः। लेपो धान्याम्बुसम्पिष्टः कीटबिस्फोटनाशनः ॥९९॥ दूसरा कृमिसम्बन्धी विष को नष्ट करने वाला लेप-कलिहारी, अतीस, कड़वी तोंबी, घियातरोई के बीज और मूली को कांजी में पीस कर लेप करने से विषैले कीड़ों से उत्पन्न हुआ विस्फोट नष्ट होता है ॥९९॥ मुखकान्तिदो लेपो यथा- रक्तचन्दनमञ्जिष्ठालोध्रकुष्ठप्रियङ्गवः। वटाङ्कुरा मसूराश्च व्यङ्गघ्ना मुखकान्तिदाः ॥१००॥ मुखकान्तिदायक लेप-लाल चन्दन, मजीठ, लोध, कूठ, प्रियङ्गु, वट के अंकुर और मसूर का लेप करने से मुख के ऊपर की झांई नष्ट होती है और मुख की कान्ति उत्तम होती है ॥१००॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA