भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 1098, कुल 1167 में से

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अथ षष्ठं धूमपानादिविधिप्रकरणम् १०४७ अथ लेपविधिश्चैव प्रोच्यते सुज्ञसम्मतः । आलेपश्च प्रदेहश्च द्वौ भेदौ तस्य भाषितौ ।।१०१।। चर्माद्रं माहिषं यद्वत्तन्नोन्नतं सा मितिस्तयोः । शौतस्तनुविशोषी च प्रलेपः पित्तहन्मतः ।।१०२।। आर्द्रो घनस्तथोष्णः स्यत्प्रदेहः श्लेष्मवातहा। न रात्रौ लेपनं कुर्याच्छुष्यमाणं न धारयेत् ।। शुष्यमाणमुपेक्षेत प्रदेहं पीडनं प्रति ।।१०३।। लेप के दो भेद-आलेप और प्रदेह कहे गये हैं। इन दोनों की मुटाई भैंस के गीले चमड़े के बराबर रखनी चाहिये। जो लेप शीतल, पतला और जल्द सूख जाने वाला होता है वह 'प्रलेप' कहलाता है। प्रलेप से पित्त नष्ट होता है। जो लेप तुरन्त नहीं सूखता एवं गाढ़ा और गरम रहता है वह 'प्रदेह' कहलाता है। प्रदेह से वात और कफ नष्ट होता है। रात्रि में लेप नहीं करना चाहिये और न सूखे हुप लेप को शरीर पर धारण करना चाहिये। किन्तु पीडन-संज्ञक प्रदेह अर्थात् फोड़ा इत्यादि को बैठाने के लिये जो लेप किया जाता है उसे रहने देना चाहिये ।।१०३।। तमसा पिहितो ह्युष्मा लोमकूपमुखे स्थितः । विना लेपेन निर्याति रात्रौ नालेपयेदतः ।। रोमकूपों के मुख में रहने वाली गरमी रात्रि के अन्धकार से ढक जाती है इस लिये रात्रि में प्रलेप नहीं करना चाहिये। यदि लेप किया होता है तो वह गर्मी रोमों के अन्दर रह जाती है जिससे रोग उत्पन्न हो जाने की आशङ्का रहती है ।।१०४।। ❖ तमसा=रात्र्यन्धकारेण ।।१०४।। यहाँ 'तमसा' पद का 'रात्रि के अन्धकार से' यह अर्थ समझना चाहिये ।।१०४।। रात्रावपि प्रलेपादिव्रणे देयो विचक्षणैः । अपाकिन्यतिगम्भीरे रक्तश्लेष्मसमुद्भवे ।।१०५।। जो व्रण न पकता हो, अत्यन्त गम्भीर हो तथा रुधिर और कफ से उत्पन्न हुआ हो उस पर विद्वान् वैद्य को रात्रि में भी लेपादि करना चाहिये ।।१०५।। प्रलेपो यथा- मधुकं चन्दनं मूर्वा नलमूलञ्च पर्पटम् । उशीरं बालकं पद्मं प्रलेपः पित्तशोथहृत् ।।१०६।। प्रलेप—मुलहठी, चन्दन, मूर्वा, खस की जड़, पित्तपापड़ा, खश, सुगन्धवाला और कमल इनका प्रलेप पित्तजन्य सूजन को नष्ट करता है ।।१०६।। प्रदेहो यथा- बीजपूरजटा हिंस्रा देवदारु महौषधम् । रास्नाऽरणिः प्रदेहोऽयं वातशोथविनाशनः ।।१०७।। प्रदेह—बिजौरे की जड़, जटामांसी, देवदारु, सोंठ, रासन और अरनी इनका प्रदेह वातजन्य शोथ को नष्ट करता है ।।१०७।। ❖ अरणिः=अग्निमन्थः ।।१०७।। यहाँ 'अरणि' पद का 'अग्निमन्थ अर्थात् अरनी' अर्थ समझना चाहिये ।।१०७।। कृष्णापुराणपिण्याकशिग्रुत्वक्सिकताशिवाः । गोमूत्रपिष्टः कोष्णोऽयं प्रदेहः श्लेष्मशोथहा ।। पीपल, पुरानी खली, सहजन की छाँड़, खांड और हरड़ की गोमूत्र में पीसकर किञ्चित् उष्ण प्रदेह करने से कफसम्बन्धी शोथ नष्ट हो जाता है ।।१०८।। अथ शोणितस्रावण (फस्त) विधिमाह- शोणितं स्रावयेज्जन्तोरामयं प्रसमीक्ष्य च । प्रस्थं प्रस्थार्द्धमेव वा प्रस्थार्द्धार्द्धमथापि वा ।।१०९।। शरत्काले स्वभावेन शोणित स्रावयेन्नरः । त्वग्दोषग्रन्थिशोथाद्या नश्यन्ति रुधिरोद्भवाः ।।११०।।

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