भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 1095, कुल 1167 में से

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पृष्ठ 1095

१०४४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे सिरामुखैर्लोमकूपैर्धमनीभिश्च तर्पयेत्। शरीरं बलमाधत्ते युक्तः स्नेहोऽवगाहने ॥७४॥ जलसिक्तस्य वर्द्धन्ते यथा मूलेऽङ्कुरादयः। तथैव धातुवृद्धिर्हि स्नेहसिक्तस्य जायते ॥७५॥ नातः परतरः कश्चिदुपायो वातनाशनः। शीतशूलव्युपरमे स्तम्भगौरवनिग्रहे ॥७६॥ दीप्तेऽग्नौ मार्दवे जाते स्वेदनाद्विरतिर्मता ।।॥७७॥ उक्त रीति से स्नान करने में स्नेह (घी वा तेल) का उपयोग करने से वह सिराओं के मुख, रोमकूप तथा धमनियों के द्वारा अन्दर प्रविष्ट होकर शरीर को तर्पित करता है तथा शरीर में बल उत्पन्न करता है। जिस तरह वृक्ष के मूलभाग में जल सींचने से अंकुर आदि बढ़ते हैं उसी तरह स्नेह से सींचे हुये (स्नान किये हुये) रोगी के धातुओं की वृद्धि होती है इससे बढ़ कर और दूसरा कोई उपाय वातसम्बन्धी पीड़ा दूर करने के लिये नहीं है। शीत तथा शूल के नष्ट हो जाने पर तथा शरीर की स्तब्धता (जकड़ जाना) और गुरुता (भारी हो जाने) के दूर हो जाने पर एवं अग्नि के प्रदीप्त तथा शरीर के कोमल हो जाने पर ही स्वेद देने से विरत होना उचित होता है ॥७४-७७॥ अथ मूर्द्धतैलविधिमाह- अभ्यङ्गः परिषेकश्च पिचुर्बस्तिरिति क्रमात्। मूर्द्धतैलं चतुर्द्धा स्याद्बलवत्तद्यथोत्तरम् ॥७८॥ मूर्द्धतैल (सिर में तेल डालने) की विधि-(१) अभ्यङ्ग, (२) परिषेक, (३) पिचु, (४) बस्ति इस प्रकार मूर्द्धतैल के ४ भेद होते हैं और ये क्रम से एक दूसरे की अपेक्षा उत्तरोत्तर बलवान् होते हैं ॥७८॥ ❖ अभ्यङ्गः=तैलेन शिरसो मर्दनम्। परिषेकः=शिरसि धारापातनम्। पिचुः=तैलाक्तं तूलं 'फोहा' इति लोके। बस्तिर्वक्ष्यमाणः ॥७८।। यहाँ तेल से सिर मालिश करना 'अभ्यङ्ग', सिर के ऊपर तेल की धारा गिराना 'परिषेक', सिर के ऊपर तेल से भीगी हुई रूई अर्थात् लोकप्रसिद्ध 'फोहा' रखना 'पिचु' समझना चाहिये। और 'बस्ति' का विवरण आगे जो दिया जायगा उससे समझ लेना चाहिये ॥७८॥ त्रयोऽभ्यङ्गादयः पूर्वे प्रसिद्धाः सर्वतः स्मृताः। शिरोबस्तिविधिश्चात्र प्रोच्यते सुज्ञसम्मतः ॥७९॥ शिरोबस्तिश्चर्मणः स्याद् द्विमुखो द्वादशाङ्गुलः। शिःप्रमाणस्तं बद्ध्वा मस्तके माषपिष्टकैः ॥८०॥ सन्धिरोधं विधायाशु स्नेहैः कोष्णैः प्रपूरयेत्। तावद्धार्यस्तु यावत्स्यान्नासाकर्णमुखस्रुतिः ॥८१॥ वेदनोपशमो वाऽपि मात्राणां वा सहस्रकम्। स्वजानुनः करावर्त्तं कुर्याच्छोटिकया युतम् ॥८२॥ एषा मात्रा भवेदेका सर्वत्रैवैष निश्चयः। विना भोजनमेवात्र शिरोबस्तिः प्रशस्यते ॥८३॥ प्रयोज्यस्तु शिरोबस्तिः पञ्च सप्त दिनानि वा। विमोच्य शिरसो बस्तिं गृह्णीयाच्च समन्ततः ॥८४॥ ऊर्ध्वकार्यं ततः कोष्णे नीर स्नानं समाचरेत्। अनेन दुर्जया रोगा वातजा यान्ति संक्षयम्। शिरःकम्पादयस्तेन सर्वकालेषु युज्यते ॥८५॥ इनमें से पहले के अभ्यङ्गादि (अभ्यङ्ग, परिषेक, पिचु) तीन सर्वत्र प्रसिद्ध ही हैं अतः उनका व्याख्यान न करके यहाँ केवल शिरोबस्ति (सिर में तेल से बस्ति देने) की विधि कहते हैं, जो विद्वानों को अभिमत है। शिरोबस्ति चमड़े की बनानी चाहिये अर्थात् वह टोपी के आकार की १२ अंगुल ऊँची सिर के नाम की बनानी चाहिये इसके दोनों तरफ मुख होना चाहिये, तत्पश्चात् उसे रोगी के सिर में बाँध कर सन्धियों को उरद के आटा को जल में सान कर उसी से खूब बन्द कर देना चाहिये और तत्काल किंचिद् गर्म स्नेह (तेल) से पूर्वोक्त टोपी को भर देना चाहिये। यही शिरोबस्ति देने की विधि है। तब तक सिर पर उसे रहने देना चाहिये जब तक नाक, कान तथा मुख से पानी न झरने लगे अथवा जब तक पीड़ा की शान्ति न हो, या जब तक १००० (एक हजार) मात्रा का काल पूरा न हो। यहाँ सर्वत्र निश्चित एक मात्रा का काल उसे समझना चाहिये। जो अपने जानु (घुटना) पर एक वार हाथ फिरा कर चुटकी बजाने में काल लगता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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