भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 112, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंHere is the exact transcription of the page, maintaining the original spelling, punctuation, line breaks, and footnote markers:
अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ५९ रहता है तथा ओज से ही उत्साह, प्रतिभा, धैर्य्य, लावण्य और सुकुमारता इत्यादि देह के आश्रित रहने वाले अनेक प्रकार के भाव उत्पन्न होते हैं ।।१८४-१८६।। ततः स्थूलो भागो रसो मासेन पुंसां शुक्रं स्त्रीणान्त्वार्त्तवं शुक्रञ्च भवति। उक्तञ्च सुश्रुते-'एवं मासेन रसः शुक्लो भवति । ३स्त्रीणामात्तर्वञ्चे'ति । चकारात् स्त्रीणामपि शुक्रं भवति । अत एवोक्तं सुश्रुते- योषितोऽपि स्रवत्येव शुक्रं पुंसः समागमे । तत्र गर्भस्य किञ्चित् न करोतीति न चिन्त्यते ।।१८७।। उसके बाद पूर्वोक्त प्रकार से आहार रस का स्थूल भाग एक मास में पुरुषों का शुक्र और स्त्रियों का आर्तव तथा शुक्र हो जाता है और 'सुश्रुत' में भी कहा है कि इस प्रकार से एक मास में रस पुरुषों का शुक्र हो जाता है तथा स्त्रियों का आर्तव भी हो जाता है, यहाँ पर मूल में 'च' का पाठ है अतएव उसका 'भी' अर्थ होने